उत्तराखंड प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार के 12 वर्ष पूरे होने पर देशभर में उपलब्धियों का बखान किया जा रहा है। सड़कों, रेल, डिजिटल सेवाओं और कई योजनाओं को विकास की मिसाल बताया जा रहा है। लेकिन देवभूमि उत्तराखंड के आम लोगों के मन में कुछ ऐसे सवाल भी हैं जो आज भी जवाब मांग रहे हैं।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
पहाड़ों से लगातार हो रहा पलायन नहीं रुक पाया है। हजारों गांव आबादी खो चुके हैं और रोजगार की तलाश में युवा मैदानों की ओर जा रहे हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण दूरस्थ क्षेत्रों के लोग आज भी बेहतर इलाज के लिए भटकने को मजबूर हैं। शिक्षा, सड़क और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं का संकट कई गांवों में बना हुआ है।
चारधाम यात्रा और पर्यटन के विस्तार के साथ पर्यावरणीय चुनौतियां भी बढ़ी हैं। आपदा प्रभावित क्षेत्रों के लोग स्थायी पुनर्वास और सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। बेरोजगारी, महंगाई और स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों के अधिकार जैसे मुद्दे भी लगातार उठ रहे हैं।
12 वर्षों की उपलब्धियों के बीच उत्तराखंड का जनमानस यह पूछ रहा है कि विकास की चमक आखिर कब पहाड़ के अंतिम गांव तक पहुंचेगी। उत्सव के इस दौर में इन सवालों पर भी गंभीर चर्चा जरूरी है, क्योंकि मजबूत भारत का सपना तभी पूरा होगा जब मजबूत उत्तराखंड का निर्माण होगा।
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12 वर्षों की उपलब्धियों के बीच उत्तराखंड के अनसुलझे सवाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार के 12 वर्ष पूरे होने पर देशभर में विकास कार्यों और उपलब्धियों का उल्लेख किया जा रहा है। उत्तराखंड में भी सड़क, रेल, धार्मिक पर्यटन और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं आगे बढ़ी हैं। लेकिन इन उपलब्धियों के बीच राज्य की जनता आज भी कुछ मूलभूत सवालों के जवाब तलाश रही है।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के समय जिस रोजगार, पलायन रोकने, सशक्त भू-कानून, मूल निवास, बेहतर स्वास्थ्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का सपना दिखाया गया था, वह आज भी पूरी तरह साकार नहीं हो पाया है। पहाड़ों के अनेक गांव खाली हो रहे हैं, युवा रोजगार के लिए राज्य से बाहर जाने को मजबूर हैं और दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं अब भी चुनौती बनी हुई हैं।
राज्य आंदोलनकारी संगठनों का कहना है कि विकास केवल बड़े प्रोजेक्टों और घोषणाओं से नहीं मापा जा सकता, बल्कि यह देखना भी जरूरी है कि उसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा या नहीं। उनका मानना है कि उत्तराखंड को केवल पर्यटन और निवेश का केंद्र नहीं, बल्कि स्थानीय युवाओं, किसानों और पर्वतीय क्षेत्रों की जरूरतों के अनुरूप विकसित किया जाना चाहिए।
12 वर्षों की उपलब्धियों के इस दौर में उत्तराखंड की जनता यही पूछ रही है कि राज्य निर्माण के मूल सपनों को पूरा करने की दिशा में अब अगला कदम कब उठाया जाएगा। :::
