उज्ज्वला योजना में कटौती: गरीबों के हक पर डाका या राहत का दिखावा?पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल की आवाज में प्रतिक्रिया

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रुद्रपुर, उत्तराखंड केंद्र सरकार द्वारा प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत सब्सिडी वाले गैस सिलेंडरों की संख्या को पहले 12 से घटाकर 9 और अब केवल 4 कर देना बेहद चिंताजनक फैसला है। यह निर्णय उन करोड़ों गरीब परिवारों के हितों के खिलाफ है, जिनके नाम पर वर्षों से योजनाओं का प्रचार किया जाता रहा है। सरकार एक ओर गरीब कल्याण की बात करती है, दूसरी ओर उन्हीं गरीब परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ाने वाले फैसले लगातार लिए जा रहे हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की शुरुआत बड़े उद्देश्य के साथ हुई थी। दावा किया गया था कि गरीब महिलाओं को धुएं से मुक्ति मिलेगी, उनका स्वास्थ्य सुधरेगा और रसोई में सम्मानजनक जीवन मिलेगा। लेकिन आज वास्तविकता यह है कि गरीब परिवार गैस सिलेंडर भरवाने में असमर्थ होते जा रहे हैं। गैस कनेक्शन तो दे दिया गया, लेकिन उसे नियमित रूप से भरवाने की क्षमता गरीबों के पास नहीं बची है।
सरकार कह रही है कि उज्ज्वला लाभार्थियों की औसत खपत कम है, इसलिए सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या घटाई जा रही है। मेरा सवाल है कि आखिर खपत कम क्यों है? क्या गरीब परिवारों को खाना पकाने की जरूरत कम हो गई है? क्या उनके घरों में भोजन बनना बंद हो गया है? सच्चाई यह है कि गैस सिलेंडर इतना महंगा हो चुका है कि लोग मजबूरी में फिर से लकड़ी, उपले और कोयले का सहारा लेने लगे हैं। खपत कम होने का कारण गरीबी और महंगाई है, न कि जरूरतों में कमी।
आज दिल्ली में घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत 942 रुपये तक पहुंच गई है। सरकार कहती है कि 300 रुपये की सब्सिडी के बाद लाभार्थी को 642 रुपये देने पड़ते हैं। लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और है। देश के कई हिस्सों में उज्ज्वला लाभार्थियों को सब्सिडी के नाम पर मात्र 10, 15 या 20 रुपये उनके खातों में वापस भेजे जा रहे हैं। कभी 200 रुपये, कभी 300 रुपये और कई बार उससे भी अधिक सब्सिडी मिलने की बात कही जाती थी, लेकिन आज लाभार्थी बैंक खाते की एंट्री देखकर खुद हैरान रह जाता है।
यह कैसी सब्सिडी है? यदि सरकार वास्तव में गरीबों की मदद करना चाहती है तो उसे स्पष्ट बताना चाहिए कि गरीब परिवारों के खाते में आखिर कितनी राशि जा रही है। केवल कागजों और प्रेस कॉन्फ्रेंसों में सब्सिडी की घोषणा कर देने से गरीब का चूल्हा नहीं जलता।
मुझे लगता है कि यदि सरकार गरीबों को 15 रुपये या 20 रुपये जैसी प्रतीकात्मक राशि देकर यह दावा करना चाहती है कि वह सब्सिडी दे रही है, तो इससे अच्छा है कि ऐसी दिखावटी सब्सिडी को बंद ही कर दिया जाए। कम से कम देश की जनता को भ्रम में तो नहीं रखा जाएगा। 15 रुपये की सब्सिडी से न तो किसी गरीब का सिलेंडर भर सकता है और न ही उसके परिवार का बजट सुधर सकता है। यह सहायता नहीं बल्कि गरीबों के साथ मजाक जैसा प्रतीत होता है।
आज स्थिति यह है कि मजदूर, किसान, रिक्शा चालक, रेहड़ी-पटरी लगाने वाले और सीमित आय वाले परिवार महंगाई की मार से जूझ रहे हैं। खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ रहे हैं, बिजली महंगी हो रही है, शिक्षा और स्वास्थ्य का खर्च बढ़ रहा है। ऐसे समय में गैस सिलेंडर जैसी बुनियादी आवश्यकता पर राहत देने के बजाय सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या कम कर देना गरीबों के साथ अन्याय है।
सरकार यह भी कह रही है कि गैस की कीमत में प्रतिदिन एक रुपये के बराबर वृद्धि हुई है और पांच सदस्यीय परिवार पर इसका असर केवल 20 पैसे प्रतिदिन बैठता है। यह तर्क वास्तविक जीवन से बिल्कुल अलग है। गरीब परिवार अपनी रोजमर्रा की जरूरतों का हिसाब मासिक और वार्षिक खर्च के आधार पर करता है। जब सिलेंडर भरवाने के लिए एकमुश्त 900 रुपये या उससे अधिक देने पड़ते हैं, तब यह गणित उसके किसी काम का नहीं रहता। गरीब परिवार के लिए एक साथ इतनी बड़ी राशि निकालना ही सबसे बड़ी चुनौती है।
उज्ज्वला योजना का उद्देश्य गरीबों को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराना था। लेकिन यदि गैस इतनी महंगी हो जाए कि गरीब उसे खरीद ही न सके, तो योजना का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। केवल कनेक्शन देने से समस्या का समाधान नहीं होता। वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब लाभार्थी नियमित रूप से सिलेंडर भरवा सके और उसे आर्थिक बोझ महसूस न हो।
आज गांवों और कस्बों में हजारों ऐसे परिवार हैं जिनके घरों में उज्ज्वला कनेक्शन तो है, लेकिन महीनों तक सिलेंडर खाली पड़ा रहता है। महिलाएं मजबूरी में फिर से लकड़ी और अन्य पारंपरिक ईंधनों का उपयोग कर रही हैं। इससे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है और योजना का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ रहा है।
सरकार को चाहिए कि वह गरीब परिवारों की वास्तविक स्थिति का आकलन करे। यदि उज्ज्वला योजना को सफल बनाना है तो कम से कम पहले की तरह पर्याप्त संख्या में सब्सिडी वाले सिलेंडर उपलब्ध कराए जाएं। साथ ही सब्सिडी की राशि को पारदर्शी बनाया जाए ताकि लाभार्थियों को स्पष्ट रूप से पता चल सके कि उन्हें कितना लाभ मिल रहा है।
मैं केंद्र सरकार से मांग करता हूं कि उज्ज्वला योजना के तहत सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या में की गई कटौती को तत्काल वापस लिया जाए। गैस सिलेंडर की कीमतों पर नियंत्रण के लिए ठोस कदम उठाए जाएं और गरीब परिवारों को वास्तविक राहत प्रदान की जाए। केवल आंकड़ों और दावों से गरीबों का भला नहीं होगा।
देश की अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत आधार आम नागरिक है। यदि गरीब और मध्यम वर्ग लगातार महंगाई के बोझ तले दबता जाएगा तो विकास के दावे खोखले साबित होंगे। सरकार को यह समझना होगा कि रसोई का चूल्हा केवल आंकड़ों से नहीं जलता, उसके लिए वास्तविक आर्थिक सहायता की आवश्यकता होती है।
आज जरूरत इस बात की है कि गरीबों को राहत मिले, न कि उनके हिस्से की सुविधाओं में कटौती की जाए। यदि सब्सिडी के नाम पर केवल 15 रुपये वापस भेजे जा रहे हैं, तो यह गरीबों के सम्मान और अधिकार दोनों के साथ खिलवाड़ है। सरकार को दिखावटी राहत के बजाय वास्तविक सहायता देनी चाहिए, क्योंकि गरीब परिवारों को प्रचार नहीं, बल्कि रसोई चलाने के लिए सस्ती गैस की आवश्यकता है।


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