15 अगस्त तक गैस की ई-केवाईसी, फिर एक और कतार!ऑनलाइन व्यवस्था के दौर में उत्तराखंड की जनता कब तक खड़ी रहेगी लाइन में?

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रुद्रपुर। डिजिटल इंडिया और ऑनलाइन सेवाओं के दौर में सरकारी और आवश्यक सेवाओं को आसान बनाने की बात लगातार होती रही है। मोबाइल से काम करने, घर बैठे सत्यापन कराने और कागजी प्रक्रिया कम करने के दावे भी सामने आते रहे हैं। जमीन पर स्थिति कई बार अलग तस्वीर दिखाती है। किसी काम के लिए आधार चाहिए, किसी के लिए मोबाइल नंबर लिंक होना जरूरी है, कहीं ओटीपी, कहीं बायोमेट्रिक, कहीं ई-केवाईसी और कहीं दस्तावेजों के साथ संबंधित कार्यालय या एजेंसी तक पहुंचना पड़ता है।
अब गैस उपभोक्ताओं के सामने ई-केवाईसी की नई प्रक्रिया आ गई है। 15 अगस्त तक ई-केवाईसी पूरी कराने की अपील के बाद उत्तराखंड के लाखों उपभोक्ताओं के सामने एक बार फिर कतार में खड़े होने का सवाल खड़ा हो गया है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


उधम सिंह नगर जिले से सामने आए आंकड़ों के अनुसार विभिन्न तेल कंपनियों की करीब 70 गैस एजेंसियों से 7,73,356 उपभोक्ता जुड़े हैं। इनमें 5,64,642 उपभोक्ताओं की ई-केवाईसी पूरी हो चुकी है, जबकि 2,08,714 उपभोक्ताओं की ई-केवाईसी अभी बाकी बताई गई है।
जिला आपूर्ति अधिकारी केके अग्रवाल ने शनिवार को जिले की विभिन्न गैस एजेंसियों का निरीक्षण कर ई-केवाईसी और आधार से जुड़े गैस कनेक्शनों की जानकारी ली। उपभोक्ताओं से निर्धारित समय सीमा के भीतर प्रक्रिया पूरी कराने की अपील की गई है।
15 अगस्त की तारीख और 2 लाख से ज्यादा उपभोक्ताओं की चिंता
विभागीय जानकारी के मुताबिक जिन उपभोक्ताओं की ई-केवाईसी पूरी नहीं हुई है, उन्हें भविष्य में गैस सिलिंडर की आपूर्ति से जुड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। गैस कंपनियों की प्रक्रिया के अनुसार सत्यापन अधूरा रहने पर कनेक्शन को निष्क्रिय श्रेणी में डालने अथवा बंद करने जैसी कार्रवाई की स्थिति बन सकती है।
इसका सीधा असर घरेलू गैस सुविधा पर पड़ सकता है। उपभोक्ता को घरेलू श्रेणी की सुविधा के स्थान पर महंगी दर वाले कमर्शियल सिलिंडर की जरूरत पड़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
विभाग का तर्क है कि आधार आधारित सत्यापन से फर्जी और डुप्लीकेट कनेक्शनों की पहचान, गैस की कालाबाजारी पर नियंत्रण तथा वास्तविक उपभोक्ताओं का सही रिकॉर्ड तैयार करने में मदद मिलेगी। पीएनजी और एलपीजी दोनों कनेक्शन रखने वाले उपभोक्ताओं का डाटा भी इस प्रक्रिया से चिह्नित किया जा सकता है।
सवाल यह है कि व्यवस्था को पारदर्शी बनाने की जिम्मेदारी पूरी तरह उपभोक्ता की कतार से ही क्यों पूरी हो?
ऑनलाइन के नाम पर जनता को कितनी बार लाइन में लगना पड़ा?
उत्तराखंड के गांव से लेकर शहर तक आम आदमी पिछले कई वर्षों में अलग-अलग सेवाओं के लिए सत्यापन की प्रक्रियाओं से गुजरता आया है।
आधार कार्ड बनवाने के लिए लाइन।
आधार में मोबाइल नंबर जोड़ने के लिए लाइन।
आधार में नाम, जन्मतिथि या पता सुधारने के लिए लाइन।
बैंक खाते में आधार लिंक कराने के लिए लाइन।
बैंक खाते की केवाईसी और री-केवाईसी के लिए लाइन।
पैन कार्ड और आधार लिंक कराने के लिए प्रक्रिया।
राशन कार्ड की ई-केवाईसी के लिए राशन की दुकान पर लाइन।
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की ई-केवाईसी के लिए जनसेवा केंद्रों पर पहुंच।
पेंशन के सत्यापन और जीवन प्रमाण से जुड़ी प्रक्रियाओं के लिए लाइन।
बिजली कनेक्शन और उपभोक्ता रिकॉर्ड में आधार या मोबाइल अपडेट कराने के लिए कार्यालयों के चक्कर।
सिम कार्ड और मोबाइल सेवाओं में पहचान सत्यापन।
और अब गैस कनेक्शन की ई-केवाईसी के लिए गैस एजेंसी पर कतार।
कई सेवाओं में डिजिटल सुविधा उपलब्ध होने के बावजूद बड़ी संख्या में बुजुर्ग, ग्रामीण, तकनीकी रूप से कम परिचित और स्मार्टफोन की सीमित सुविधा वाले उपभोक्ता आज भी संबंधित केंद्रों पर निर्भर हैं।
आज गैस, कल किस सेवा की बारी?
गैस ई-केवाईसी को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि उपभोक्ता अपनी पहचान कितनी बार साबित करेगा?
आधार पहले से बना हुआ है। बैंक में आधार दर्ज है। मोबाइल नंबर आधार से जुड़ा है। राशन कार्ड में आधार का विवरण है। सरकारी योजनाओं में आधार आधारित पहचान मौजूद है। इसके बाद भी अलग-अलग विभागों और सेवाओं में समय-समय पर पुनः सत्यापन की जरूरत सामने आती है।
डिजिटल व्यवस्था का मूल उद्देश्य नागरिक का समय बचाना है। यदि हर डिजिटल प्रक्रिया के बाद नागरिक को संबंधित कार्यालय, एजेंसी, बैंक, राशन दुकान या सेवा केंद्र पर पहुंचकर बायोमेट्रिक देना पड़े, दस्तावेज दिखाने पड़ें और घंटों कतार में खड़ा रहना पड़े तो व्यवस्था के उद्देश्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
रुद्रपुर से देहरादून तक यही सवाल
उधम सिंह नगर के रुद्रपुर, काशीपुर, जसपुर, बाजपुर, गदरपुर, किच्छा, सितारगंज और खटीमा से लेकर नैनीताल, हल्द्वानी, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत, चमोली, रुद्रप्रयाग, पौड़ी, टिहरी, उत्तरकाशी, देहरादून और हरिद्वार तक बड़ी संख्या में उपभोक्ता गैस कनेक्शन का इस्तेमाल करते हैं।
मैदानी जिलों में एजेंसियों तक पहुंच अपेक्षाकृत आसान है। पर्वतीय जिलों में कई उपभोक्ताओं के लिए गैस एजेंसी तक पहुंचना अपने आप में समय और धन से जुड़ा विषय है। दूरस्थ गांवों के बुजुर्ग उपभोक्ताओं के लिए डिजिटल सत्यापन की प्रक्रिया और कठिन हो सकती है।
ऐसे में सरकार और तेल कंपनियों के सामने सवाल है कि क्या प्रत्येक गैस एजेंसी पर पर्याप्त काउंटर, अतिरिक्त कर्मचारी और विशेष ई-केवाईसी शिविर लगाए जाएंगे?
क्या बुजुर्गों, दिव्यांगों और दूरस्थ ग्रामीण उपभोक्ताओं के लिए अलग व्यवस्था होगी?
क्या मोबाइल एप से ई-केवाईसी की सुविधा वास्तव में हर उपभोक्ता के लिए सरल है?
क्या उपभोक्ता अपने कनेक्शन का ई-केवाईसी स्टेटस घर बैठे स्पष्ट रूप से देख पाएगा?
लाइन खत्म होगी या बढ़ती जाएगी?
आज गैस ई-केवाईसी की कतार है। कल किसी दूसरी सरकारी योजना के सत्यापन की बारी हो सकती है। फिर बैंक री-केवाईसी, राशन कार्ड अपडेट, पेंशन सत्यापन, बिजली रिकॉर्ड, मोबाइल नंबर, संपत्ति या किसी अन्य सरकारी सुविधा से जुड़ी प्रक्रिया सामने आ सकती है।
जनता का सवाल सीधा है—जब आधार और डिजिटल पहचान की व्यवस्था इतनी व्यापक है तो हर सेवा में बार-बार सत्यापन का बोझ आम नागरिक पर कितना उचित है?
सरकार का उद्देश्य फर्जी कनेक्शन समाप्त करना, योजनाओं का लाभ वास्तविक व्यक्ति तक पहुंचाना और व्यवस्था में पारदर्शिता लाना है। यह उद्देश्य महत्वपूर्ण है। साथ ही प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसमें वास्तविक उपभोक्ता को सुविधा मिले और सत्यापन के नाम पर उसे बार-बार कार्यालयों की कतार में खड़ा होने की मजबूरी कम हो।
15 अगस्त से पहले उपभोक्ता क्या करें?
उधम सिंह नगर के जिला आपूर्ति अधिकारी के अनुसार उपभोक्ता अपनी संबंधित गैस एजेंसी पर जाकर बायोमेट्रिक सत्यापन के माध्यम से ई-केवाईसी करा सकते हैं। कुछ गैस कंपनियां मोबाइल एप और अधिकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से भी यह सुविधा उपलब्ध करा रही हैं। डिलीवरी कर्मियों के माध्यम से भी ई-केवाईसी की सुविधा उपलब्ध होने की जानकारी दी गई है।
उपभोक्ताओं के लिए बेहतर होगा कि वे अंतिम दिनों की भीड़ से बचने के लिए समय रहते अपनी गैस एजेंसी अथवा संबंधित गैस कंपनी के अधिकृत माध्यम से ई-केवाईसी की स्थिति जांच लें।
क्योंकि सवाल केवल एक गैस कनेक्शन की ई-केवाईसी का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें नागरिक को हर नई डिजिटल सुविधा के साथ एक नई कतार भी मिलती जा रही है।
उत्तराखंड की जनता अब पूछ रही है—ऑनलाइन व्यवस्था कब ऐसी बनेगी कि सुविधा सच में घर तक पहुंचे और कतार इतिहास का हिस्सा बने?


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