उत्तराखंड,ओडिशा में एक सहायक कार्यकारी अभियंता के यहां विजिलेंस की छापेमारी में करोड़ों रुपये की नकदी, बहुमंजिला इमारतें, महंगे प्लॉट, सोना और बैंक जमा मिलने की खबर ने पूरे देश का ध्यान खींचा है। सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड में भ्रष्टाचार नहीं है, या फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की इच्छाशक्ति का अभाव है?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
उत्तराखंड में वर्षों से भू-माफियाओं, नौकरशाहों और राजनीतिक संरक्षण के गठजोड़ की चर्चाएं होती रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तीन से पांच एकड़ की स्वीकृति लेकर दर्जनों एकड़ में कॉलोनियां विकसित कर दी जाती हैं। रेरा, भूमि उपयोग परिवर्तन और निर्माण स्वीकृतियों के नाम पर करोड़ों के खेल की शिकायतें सामने आती हैं, लेकिन बड़े स्तर पर जांच और जवाबदेही शायद ही दिखाई देती है।
जब भी कार्रवाई होती है तो मीडिया के कैमरों के सामने जेसीबी चलती है, सड़कें उखाड़ी जाती हैं और अवैध निर्माणों पर बुलडोजर चलता है। लेकिन कुछ ही समय बाद वही गतिविधियां फिर शुरू हो जाती हैं। आखिर ऐसा कैसे संभव है? क्या यह बिना किसी प्रशासनिक और राजनीतिक संरक्षण के हो सकता है?
यदि सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार मुक्त शासन का दावा करती है तो उत्तराखंड में एक मजबूत और स्वतंत्र लोकायुक्त की स्थापना समय की मांग है। ऐसी संस्था, जो सत्ता, नौकरशाही और प्रभावशाली लोगों की जांच करने का अधिकार रखती हो। यदि निष्पक्ष जांच शुरू हो जाए तो कई ऐसे चेहरे बेनकाब हो सकते हैं जिनकी संपत्तियां उनकी घोषित आय से कहीं अधिक हैं।
लोकतंत्र में जनता सबसे बड़ी निर्णायक होती है। जनता सब कुछ देखती है और समझती है। यदि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग भ्रष्टाचार के आरोपों पर आंखें मूंद लेते हैं तो धीरे-धीरे जनविश्वास कमजोर पड़ता है और यही स्थिति राजनीतिक परिवर्तन की पृष्ठभूमि तैयार करती है।
ओडिशा की कार्रवाई ने यह साबित किया है कि इच्छाशक्ति हो तो भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी से बड़ी जांच संभव है। अब सवाल उत्तराखंड से है—क्या यहां भी लोकायुक्त और स्वतंत्र जांच एजेंसियों को वही शक्ति और स्वतंत्रता मिलेगी, या फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई केवल भाषणों और प्रचार तक सीमित रहेगी?
