खेत बचाओ अभियान या खेतों के अंत का उत्सव?

Spread the love

खेत बचाओ अभियान पर बड़ा सवाल: जब खेत ही नहीं बचे तो बचाएंगे क्या?
पहाड़ बंजर, मैदान कंक्रीट में तब्दील: उत्तराखंड में खेत बचाओ अभियान की हकीकत
भाषणों में खेती, जमीन पर बंजरपन: खेत बचाओ अभियान पर सरकार से तीखे सवाल

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड


उत्तराखंड में इन दिनों “खेत बचाओ अभियान” चल रहा है। मंच सज रहे हैं, भाषण हो रहे हैं, मंत्री किसानों को मिट्टी परीक्षण, जैविक खेती और प्राकृतिक कृषि का पाठ पढ़ा रहे हैं। कृषि मंत्री गणेश जोशी किसानों से खेत बचाने की अपील कर रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर बचाए कौन से खेत जाएं?
उत्तराखंड का किसान आज इस प्रश्न का उत्तर सरकार से मांग रहा है। खेत बचाने की बात तब होती है जब खेत मौजूद हों। लेकिन उत्तराखंड में तो वर्षों से खेत, खलिहान और कृषि भूमि विकास, निवेश, औद्योगीकरण, आवासीय परियोजनाओं और अव्यवस्थित भू-उपयोग परिवर्तन की भेंट चढ़ते रहे हैं। पहाड़ों में खेत बंजर हो चुके हैं और मैदानी क्षेत्रों में खेत कंक्रीट के जंगल में बदलते जा रहे हैं। ऐसे में “खेत बचाओ अभियान” कहीं ऐसा तो नहीं कि घर जलाने के बाद बाल्टी लेकर आग बुझाने का प्रदर्शन किया जा रहा हो?
कृषि मंत्री कहते हैं कि मिट्टी परीक्षण कराइए। किसान पूछ रहा है कि मिट्टी बचेगी तब तो परीक्षण होगा। पहाड़ों के हजारों गांवों में खेती छोड़ चुके लोग शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं। जिन खेतों में कभी धान, झंगोरा, मंडुवा और गेहूं लहलहाते थे, वहां आज झाड़ियां उग रही हैं। खेती लाभ का नहीं, बोझ का सौदा बन चुकी है। सरकारों ने वर्षों तक भाषण दिए, योजनाएं बनाईं, समितियां गठित कीं, लेकिन खेतों में किसान नहीं लौटे।
उत्तराखंड की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि यहां खेती की चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन खेती करने वाले की चिंता कम दिखाई देती है। किसान की लागत बढ़ी, जंगली जानवरों का आतंक बढ़ा, सिंचाई के स्रोत सूखे, बाजार व्यवस्था कमजोर हुई, लेकिन समाधान कागजों में ही घूमता रहा। परिणाम यह हुआ कि खेत वीरान हो गए और गांव खाली।
मैदानी उत्तराखंड की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। रुद्रपुर, काशीपुर, सितारगंज, बाजपुर, किच्छा और आसपास के क्षेत्रों में कभी उपजाऊ कृषि भूमि राज्य की पहचान हुआ करती थी। आज वही भूमि कॉलोनियों, गोदामों, व्यावसायिक परिसरों और कंक्रीट के विस्तार में बदलती जा रही है। विकास जरूरी है, लेकिन सवाल यह है कि विकास और विनाश की रेखा कहां खींची जाएगी?
पंतनगर क्षेत्र इसका बड़ा उदाहरण है। जिस भूमि को कृषि अनुसंधान, शिक्षा और किसानों के भविष्य के लिए संरक्षित किया गया था, वहां लगातार भूमि उपयोग को लेकर सवाल उठते रहे हैं। यदि कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों की भूमि भी धीरे-धीरे गैर-कृषि गतिविधियों में परिवर्तित होती दिखाई दे, तो फिर किसानों को खेत बचाने का संदेश कितना प्रभावी लगेगा?
सरकार जैविक खेती की बात करती है। यह स्वागत योग्य है। लेकिन जैविक खेती के लिए भी किसान चाहिए, खेत चाहिए, बाजार चाहिए और लाभ चाहिए। यदि किसान को अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलेगा, तो वह जैविक क्या, किसी भी प्रकार की खेती क्यों करेगा? उत्तराखंड के किसान की सबसे बड़ी समस्या उत्पादन नहीं, विपणन है। उसके पास फसल है लेकिन खरीदार नहीं। उसके पास मेहनत है लेकिन लाभ नहीं।
खेत बचाओ अभियान के मंचों पर यह प्रश्न क्यों नहीं उठता कि राज्य गठन के बाद कितनी कृषि भूमि गैर-कृषि उपयोग में चली गई? कितने गांव खेतीविहीन हो गए? कितने किसानों ने खेती छोड़ दी? कितनी सिंचाई परियोजनाएं अधूरी पड़ी हैं? कितनी कृषि योजनाएं फाइलों में दम तोड़ चुकी हैं?
राज्य बनने के समय उत्तराखंड का सपना केवल नई राजधानी या नए सचिवालय का नहीं था। सपना था कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम आएगी। लेकिन आज पानी बोतलों में बिक रहा है और जवानी रोजगार की तलाश में महानगरों में भटक रही है। खेत पीछे छूट गए हैं।
विडंबना यह है कि सरकारें बदलती रहीं, नारे बदलते रहे, लेकिन खेतों की पीड़ा नहीं बदली। कांग्रेस के दौर में भी कृषि संकट था, आज भी है। अंतर केवल इतना है कि घोषणाओं की भाषा बदल गई है। किसानों की समस्याएं वहीं खड़ी हैं। यदि खेत लगातार सिकुड़ते जाएं, खेती छोड़ने वालों की संख्या बढ़ती जाए और गांव खाली होते जाएं, तो किसी भी सरकार को आत्ममंथन करना चाहिए।
कृषि विभाग की उपलब्धियों के लंबे-लंबे दावे किए जाते हैं। लेकिन जमीन पर किसान पूछ रहा है कि आखिर कृषि विभाग का अंतिम लक्ष्य क्या है? यदि खेती का रकबा घट रहा है, किसान खेती छोड़ रहा है, कृषि भूमि का स्वरूप बदल रहा है, तो फिर विभाग की सफलता का पैमाना क्या है? केवल योजनाओं की संख्या या प्रेस विज्ञप्तियों की लंबाई?
आज जरूरत खेत बचाओ अभियान से पहले किसान बचाओ अभियान की है। किसान बचेगा तो खेत बचेंगे। गांव बचेंगे तो कृषि बचेगी। अन्यथा मंचों पर भाषण चलते रहेंगे और खेत इतिहास की किताबों में दर्ज होते जाएंगे।
व्यंग्य यह है कि जिस राज्य में खेत तेजी से घट रहे हों, वहां कृषि विभाग को शायद नया नाम देने पर विचार करना पड़े। क्योंकि यदि खेत ही नहीं बचेंगे तो कृषि विभाग क्या करेगा? कहीं ऐसा न हो कि भविष्य में विभाग का नाम “बंजर भूमि प्रबंधन विभाग” रखने की नौबत आ जाए। यह व्यंग्य नहीं, एक गंभीर चेतावनी है।
सरकार को चाहिए कि वह खेत बचाओ अभियान को केवल प्रचार कार्यक्रम न बनाए। कृषि भूमि संरक्षण पर कठोर कानून बने। भू-उपयोग परिवर्तन की समीक्षा हो। बंजर हो चुके खेतों को पुनर्जीवित करने की नीति बने। पलायनग्रस्त गांवों के लिए विशेष कृषि पैकेज तैयार हो। कृषि उत्पादों के विपणन की मजबूत व्यवस्था बनाई जाए। सिंचाई, भंडारण और प्रसंस्करण पर गंभीर निवेश किया जाए।
उत्तराखंड का भविष्य केवल चारधाम यात्रा, होटल, रिसॉर्ट और रियल एस्टेट से सुरक्षित नहीं होगा। राज्य की आत्मा उसके गांवों, खेतों और किसानों में बसती है। यदि खेत समाप्त हो गए तो केवल भूमि नहीं, संस्कृति भी समाप्त होगी।
इसलिए प्रश्न अभी भी वही है—खेत बचाओ अभियान अच्छा है, लेकिन पहले यह बताइए कि खेत बचे कितने हैं? और जो बचे हैं, उन्हें बचाने की जिम्मेदारी केवल किसान की है या उन नीतियों की भी समीक्षा होगी जिनके कारण खेती लगातार हाशिये पर जाती रही?
जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक “खेत बचाओ अभियान” किसानों को प्रेरित करने से अधिक सरकारों को आईना दिखाने वाला अभियान बनकर रहेगा।


Spread the love