गाजियाबाद में योगी के समर्थन में मुस्लिम समाज की भागीदारी, उत्तराखंड में भाजपा के लिए सबक क्या?


उधम सिंह नगर में भाजपा को जनता से कम, मुख्यमंत्री के नाम पर सत्ता का रौब दिखाने वाले कुछ जनप्रतिनिधियों से ज्यादा चुनौती! आपसी वर्चस्व की लड़ाई में पार्टी की साख दांव पर।

अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर


रुद्रपुर। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में 5 नवंबर 2026 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थन में आयोजित ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ पदयात्रा में मुस्लिम समाज के लोगों की भागीदारी राजनीतिक चर्चा का विषय बनी हुई है। राजनगर एक्सटेंशन और लोनी में आयोजित कार्यक्रमों में बुर्का पहने महिलाओं और टोपी लगाए पुरुषों की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि राजनीति में जनसमर्थन को किसी एक वर्ग या समुदाय तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। कानून व्यवस्था, विकास और नेतृत्व के मुद्दे जनता के बीच अपनी अलग पहचान बना सकते हैं।
लेकिन उत्तराखंड के उधम सिंह नगर की राजनीतिक तस्वीर पर नजर डालें तो भाजपा के सामने चुनौती का स्वरूप कुछ अलग दिखाई देता है। यहां पार्टी को आम जनता की शिकायतों से कहीं अधिक उन जनप्रतिनिधियों और नेताओं के व्यवहार से नुकसान पहुंचने की आशंका है, जो स्वयं को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का बेहद करीबी बताकर राजनीतिक प्रभाव जमाने में लगे रहते हैं।
स्थानीय राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भाजपा के कुछ जनप्रतिनिधियों के बीच एक-दूसरे को नीचा दिखाने, अपना प्रभाव बढ़ाने और आगामी राजनीतिक संभावनाओं को लेकर अंदरूनी खींचतान चल रही है। सवाल यह है कि जब पार्टी के अपने ही नेता एक-दूसरे की राजनीतिक जमीन कमजोर करने में जुटे हों, तब संगठन और सरकार की छवि कैसे मजबूत होगी?
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने भी यह विचारणीय विषय है कि उनके नाम और निकटता का दावा करने वाले कुछ जनप्रतिनिधियों का व्यवहार कहीं उनकी सरकार की लोकप्रियता पर भारी तो नहीं पड़ रहा। जनता मुख्यमंत्री से उम्मीद रखती है, लेकिन स्थानीय स्तर पर उसे जनप्रतिनिधियों के आचरण, कार्यशैली और जवाबदेही से भी संतुष्टि चाहिए।
रावण जैसा अहंकार और सत्ता का मद पार्टी के लिए घातक!
राजनीति में पद और प्रतिष्ठा जनता की सेवा का माध्यम होते हैं, व्यक्तिगत अहंकार का प्रमाणपत्र नहीं। यदि कोई जनप्रतिनिधि अपने पद, प्रभाव और मुख्यमंत्री से निकटता के दावे में इतना चूर हो जाए कि जनता की आवाज सुनना ही बंद कर दे, तो इसका खामियाजा अंततः पार्टी को भुगतना पड़ता है।
उधम सिंह नगर में भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा विपक्ष से पहले पार्टी के भीतर चल रही वर्चस्व की लड़ाई बन सकती है। जनता यह सब देख रही है। मुख्यमंत्री के नाम पर अपनी राजनीति चमकाने वालों को समझना होगा कि जनता का विश्वास किसी की निजी जागीर नहीं है।
हम तो डूबेंगे सनम, तुम्हें भी ले डूबेंगे!
यह कहावत उन राजनीतिक चेहरों पर सटीक बैठती दिखाई देती है, जिनकी आपसी महत्वाकांक्षा और अहंकार कहीं भाजपा की चुनावी संभावनाओं को ही नुकसान न पहुंचा दें।
2027 की राजनीतिक चुनौती से पहले मुख्यमंत्री धामी और भाजपा संगठन को आत्ममंथन करना होगा। केवल मुख्यमंत्री के समर्थन में नारे लगाने से चुनाव नहीं जीते जाते, जनता का विश्वास जीतना पड़ता है। गाजियाबाद की पदयात्रा से मिलने वाला राजनीतिक संदेश यही है कि जनसमर्थन व्यापक हो सकता है, बशर्ते नेतृत्व और कार्यशैली जनता को साथ लेकर चलने वाली हो।
सवाल सीधा है—उधम सिंह नगर में भाजपा को विपक्ष से ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाले अपने ही रावण रूपी अहंकारी जनप्रतिनिधियों पर संगठन कब लगाम लगाएगा?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर

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