उत्तराखंड राज्य आंदोलन का मूल सपना था—एक स्थायी राजधानी गैरसैंण। आंदोलनकारियों ने जिन कठिन संघर्षों और बलिदानों से राज्य का निर्माण कराया, उसमें यह विचार सबसे प्रबल था कि राजधानी पहाड़ के बीच हो, ताकि शासन–प्रशासन का सीधा जुड़ाव जनता और पहाड़ से बने। देहरादून को केवल अस्थायी राजधानी इसीलिए माना गया था, जब तक गैरसैंण में विधानसभा भवन और बुनियादी ढांचा तैयार न हो जाए।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
आज स्थिति यह है कि गैरसैंण में 8000 करोड़ से अधिक रुपये खर्च कर भव्य विधानसभा भवन, सचिवालय और आवश्यक सुविधाएं बन चुकी हैं। इसके बावजूद सरकार गैरसैंण जाने से हिचकिचा रही है। यह सवाल उत्तराखंड की जनता और विशेषकर राज्य आंदोलनकारियों के दिलों को झकझोर रहा है—जब राजधानी का सपना साकार हो चुका है, तो सरकार अब भी देहरादून में क्यों जमी हुई है?
देहरादून कभी भी जनता की मांग नहीं थी। यह तो प्रशासनिक सुविधा और अस्थायी समाधान भर था। लेकिन अब जबकि गैरसैंण में सब कुछ तैयार है, तो दो राजधानियों का बोझ जनता पर क्यों डाला जा रहा है? उत्तराखंड जैसे सीमित संसाधनों वाले राज्य के लिए दोहरी राजधानी आर्थिक रूप से भी घातक है।
गैरसैंण राजधानी बनने का अर्थ केवल सत्ता का भौगोलिक स्थानांतरण नहीं है। इसका मतलब है पहाड़ों में स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, शिक्षा का सुदृढ़ीकरण, रोजगार के अवसरों का सृजन और पलायन पर अंकुश। यदि सरकार गैरसैंण में बैठेगी तो प्रशासन की नज़र सीधे गांवों और दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचेगी। यही वह प्रक्रिया होगी जिससे “रिवर्स पलायन” संभव होगा, और प्रवासी अपने गांव लौटेंगे जैसे हिमाचल में लोग लौटते हैं।
21 सितम्बर 2025 को अपराह्न 2 बजे से 5 बजे तक आयोजित हो रही विरोध रैली इसी असंतोष का प्रतिफल है। इसमें न केवल आंदोलनकारी बल्कि बड़ी संख्या में प्रवासी और आमजन भी शामिल हो रहे हैं। यह रैली केवल एक विरोध नहीं, बल्कि उत्तराखंड के स्वाभिमान और उसके अधूरे सपनों को पूरा करने की निर्णायक पुकार है।
धामी सरकार को समझना चाहिए कि यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि अस्तित्व और पहचान का सवाल है। गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाना ही उत्तराखंड के शहीदों की सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही राज्य आंदोलन की मूल भावना का सम्मान भी।
✍️ अवतार सिंह बिष्ट
(संपादकीय लेख)

