2026:पश्चिम बंगाल चुनाव में इस बार सबसे बड़ा मुद्दा एसआईआर बना हुआ है। चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के विवादास्पद एसआईआर में वोट देने का अधिकार दांव पर लगा हुआ है।

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वोट देने का अधिकार देश में लोकतांत्रिक समझौते का मूल और निष्पक्ष व स्वतंत्र चुनाव का वादा है। लेकिन एसआईआर के मामले में भी बंगाल में यह बात आसान नहीं रह जातीं। मौजूदा हालात में आपसी सहानुभूति और एकजुटता की जो संभावनाएं हैं वे अतीत की तनावपूर्ण और उलझी हुई कहानियों में फंसी हुई हैं।

बंगाल में एसआईआर की कहानी अबतक की निराशाजनक कहानी है। इसने बड़े पैमाने पर वोटरों के वोट देने के अधिकार छीनने और जान-बूझकर उन्हें बाहर करने की आशंकाएं पैदा कर दी है। ड्राफ्ट लिस्ट से करीब 58 लाख वोटरों के नाम हटाने के पहले दौर के बाद 60 लाख नामों का दूसरा सेट जांच के दायरे में रखा गया। इस बीच करीब पांच लाख नाम और हटा दिए गए, यह संख्या मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में सबसे अधिक थी। उन्नीस अपीलीय ट्रिब्यूनलों ने बिना किसी वजह के बहुत धीमी और देरी से शुरुआत की और 23 अप्रैल को वोटिंग की पहली तारीख तक सिर्फ 139 लोगों के नाम वोटर लिस्ट में जोड़े।

वोटर के सामने सरकारी पेंच

इस तरह की कवायद ने बंगाल के वोटर को किसी भी राज्य के वोटर के मुकाबले कहीं अधिक सरकारी पेंच का सामना करने को मजबूर कर दिया है। लोकतंत्र के लिहाज से यह बेहद गंभीर चिंता की बात है। जाहिर है इसका असर 4 मई को आने वाले नतीजों में जरूर दिखाई देंगे। लेकिन फिलहाल वोटरों के बीच इसका असर कुछ ऐसे सामने आ रहा है, जो न तो एक जैसा है और न ही एकतरफा है।

कोलकाता के दक्षिणी बाहरी क्षेत्र जोका में, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी राष्ट्रीय जल और स्वच्छता संस्थान के नीले भूरे रंग की इमारत के बाहर लिस्ट से नाम हटाए गए लोगों की भीड़ लगी है। बिल्डिंग के अंदर 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल बैठे हैं, जो दिखाई नहीं देते और इनके कामों में भी कोई पारदर्शिता नहीं है, ऐसे में अपील करने वाले लोग सिर्फ उन पुलिसकर्मियों तक ही पहुंच पाते हैं जो बैरिकेड लगे गेटों के बाहर तैनात हैं। डायमंड हार्बर पुलिस जिले के एसपी तथागत बसु बताते हैं, “रोजाना करीब 30 से 40 लोग आते हैं, लेकिन किसी को भी अंदर जाने की इजाजत नहीं है।”

लोग दिखे परेशान

कड़ी धूप में पूर्बा बर्धमान के निवासी 26 वर्षीय हसन खान जोका आए हैं। उन्होंने कहा, “मैं आज सुबह चार बजे निकला, बस, ट्रेन और फिर बस ली, मेरे घर के छह लोगों के परिवार में से तीन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से गायब हैं। हमें नहीं पता कि उसमें अंडर एडजुडिकेशन क्यों लिखा है। पुलिस कह रही है कि मुझे वापस जाना चाहिए, ऑनलाइन पता करना चाहिए, कॉल का इंतजार करना चाहिए, लेकिन डर लग रहा है कि जो अभी चल रहा है, तो वो बोल देंगे कि बांग्लादेशी है। अगर मेरा नाम लिस्ट में नहीं है तो क्या वे मुझे भारत में रहने देंगे? मैंने चुनाव आयोग से मांगे गए सभी डॉक्यूमेंट्स दे दिए हैं, अब इंतजार करेंगे।”

हसन जैसी चिंताएं कोलकाता के उत्तरी छोर स्थित दमदम निवासी राजमिस्त्री फिरोज खान को भी है। उन्होंने कहा, “मुझे सुनवाई के लिए बुलाया गया था, लेकिन मैं नहीं आ सका क्योंकि मैं उस समय बैंगलोर में काम कर रहा था। अगर मेरा नाम लिस्ट से हटा दिया गया तो मेरे बच्चों की जिंदगी बर्बाद हो जाएगी। हमें राशन और दूसरी सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाएगा। साथ ही डर यह भी है कि वे हमें कैंपों में भेज देंगे,जैसा कि उन्होंने असम में किया है। मैं हैदराबाद, बैंगलोर,चेन्नई जैसे शहरों में काम करता हूं, ऐसे में मैं अपने परिवार को कैसे बचा पाऊंगा?”

एसआईआर ने मजबूत किया दीदी का वोटबैंक?

मुस्लिम बहुल इलाकों में एसआईआर को लेकर नाराजगी और घबराहट की वजह से ममता बनर्जी के लिए अल्पसंख्यक वोट और अभी मजबूत हो सकते हैं। इससे उन नाराजगी पर भी पर्दा पड़ सकता है, जो 15 साल सत्ता में रहने के दौरान भारी बोझ की वजह से या फिर दीदी के वक्फ बिल को रोकने का वादा पूरा न कर पाने की वजह से पैदा हो सकती थी। हावड़ा के हकोला गांव में एसके नजरूल ने कहा, “2014 से ही गरीबों और अल्पसंख्यकों को किसी न किसी वजह से लाइन में खड़ा किया जा रहा है। मोदी जी तो खाली तकलीफ भेज रहे हैं। हम उसी के साथ खड़े होंगे जो हमारे साथ खड़ा होगा। दीदी तो एसआईआर के मामले में कोर्ट तक गईं।”

हालांकि एसआईआर के प्रति नाराजगी भी एक तरीके से उस जरूरत के आगे झुकती हुई दिखती है, जिसे एसआईआर ने अल्पसंख्यक आबादी में जगाया है। अपनेपन की भावना को जाहिर करने की जरूरत, अपने घर पर ऐसा बुनियादी हर, जिसे न तो सरकार छीन सकती है और न ही सरकारी सिस्टम। मुस्लिम मोहल्लों में रहने वाले लोग कहते हैं, “हमें डरने की जरूरत नहीं है, हम इसी देश के हैं। हम यही चाहते हैं कि बाहरी लोगों को यहां से निकाल दिया जाए।”

हिंदू इलाकों में सफाई मुहिम माना

हिंदू बहुल इलाकों में कई लोग एसआईआर को एक जरूरी सफाई मुहिम के तौर पर देखते हैं, इसे ऐसी मुहिम मानते हैं, जिसे घुसपैठियों ने जरूरी बना दिया था। गिरती अर्थव्यवस्था के दौर में, यह स्थिति अनिश्चितता और असुरक्षा की भावना को दिखाती है। बीरामपुर गांव में बनियान बनाने वाले एक छोटी यूनिट के मालिक समर शॉ ने कहा, “अगर मुझे सरकार से एक रुपया मिलता है, तो किसी बाहरी व्यक्ति के आ जाने पर मुझे 70 पैसे ही केवल मिलेगा।” पानीहाट इलाके में नारियल पानी बेचने वाले एक स्टॉल पर एक स्थानीय क्लब में काम करने वाले रजत मुखर्जी ने कहा, “संसाधन सीमित है। अगर बाहर से लोग आते हैं, तो वे हमारे कारोबार में सेंध लगाते हैं, उन्हें वापस जाना चाहिए।”

रजत मुखर्जी ने आगे कहा,”एसआईआर सही तरीके से किया जाना चाहिए और अंदरूनी लोगों और बाहरी लोगों की पहचान साफ तौर पर की जानी चाहिए, लेकिन समस्या यह है कि बीएलओ पक्षपाती हैं, टीएमसी का आदमी है।” यहां यह धारणा है कि चुनाव तंत्र या कम से कम उसका कुछ हिस्सा सत्ताधारी दल के खेमे में है। एक वजह यह भी है कि कई वोटरों के लिए दीदी और बीजेपी/चुनाव आयोग के बीच की विभाजन रेखा साफ नहीं है।

घुसपैठिया शब्द अपमानजनक

कोलकाता के सेंटर फॉर स्टडीज इन सोशल साइंसेज में इतिहासकार तपाती गुहा-ठाकुरता इस चुनाव में घुसपैठिया के साये को एक बड़े सांस्कृतिक बदलाव और समाज में बढ़ती कटुता का नतीजा मानती हैं। उन्होंने कहा, बंगाल का बंटवारा कोई साफ-सुथरी प्रक्रिया नहीं थी, लोगों का आना-जाना लगातार जारी रहा और आबादी भी स्थिर नहीं रही। पश्चिम बंगाल ने बड़ी संख्या में आए शरणार्थियों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए, जो पहले शरणार्थी थे वही बंगाली मुस्लिम प्रवासी मजदूर (इनके बारे में आरोप लगाया जाता है कि ये बांग्लादेशी है)अब अनुप्रवेशकारी की कैटेगरी में आ गए यानी ऐसे लोगों जिन्होंने अवैध रूप से देश में प्रवेश किया। घुसपैठिया शब्द बंगाली भाषा का नहीं है और यह कहीं अधिक अपमानजनक है। आगे कहती हैं, हम बनाम वे वाली भावना तो हमेशा से ही थी, भले ही दोनों धार्मिक समुदाय एक दूसरे के आस-पास रहते थे लेकिन वे साथ रहते हुए भी एक-दूसरे से अलग ही रहे।

बंगाली अस्मिता कर सकेगी काम?

बंगाली अस्मिता ये एक शब्द इस चुनाव में काफी चर्चा में रहा है और इसका इस्तेमाल टीएमसी ने भाजपा पर बंगाल में दखल देने का आरोप लगाने के लिए किया है। गुहा-ठाकुरता ने कहा, “हममें से कई लोग, जो नए-नए बने बांग्लादेश के साथ बड़े हुए इस बात से बेहद प्रभावित थे कि वहां रवींद्र संगीत को कितनी अहमियत दी जाती थी और यह कि उन्होंने बंगाली को अपनी राजभाषा बनाया था।”

इस चुनाव में भाजपा ममता बनर्जी का मुकाबला करने के लिए पूरी तरह से बंगाली अभियान चला रही है। अपने घोषणा पत्र, पोस्टर और प्रचार सामग्री पर लिखी बातों से लेकर मंच पर सिर्फ बंगाली नेताओं को रखने तक और अमित शाह के इस आश्वासन तक कि भाजपा का मुख्यमंत्री कोई ऐसा व्यक्ति होगा,जिसमें बंगाली माध्यम के स्कूल में पढ़ाई की हो।

हालांकि जमीनी स्तर पर बंगाली और गैर बंगाली के बीच की खाई भी धुंधली होती दिख रही है। एक तरफ बंगाल से लगातार हो रहे पलायन की वजह से सांस्कृतिक दीवारें खड़ी रखना मुश्किल हो गया है। नदिया जिले के संतोषपुर गांव में एक चाय की दुकान पर जीवन कृष्ण राय ने कहा, “मेरे बच्चे काम के लिए केरल जाते हैं, तो मैं किसी दूसरी भाषा से नाराजगी कैसे रख सकता हूं? राज्यों के बीच आवाजाही होती रहती है, यह एक ही देश है।”

: पश्चिम बंगाल में सत्ता का फैसला करने में 91 सीटें निभाती हैं अहम भूमिका


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