वीरावती और सात भाइयों की कथा) LIVE: करवा चौथ की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं! यदि आपने भी इस पावन अवसर पर करवा चौथ का व्रत रखा है और इसकी संपूर्ण कथा की तलाश कर रही हैं, तो आप बिल्कुल सही जगह पर आई हैं।

सबसे पहले यह जान लें कि करवा चौथ की कथा हमेशा शाम के समय शुभ मुहूर्त में ही पढ़ी या सुनी जाती है। कथा सुनने से पहले माता करवा और गणेश जी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इसके बाद हाथ में थोड़े से अक्षत लेकर इस पावन कथा को सुना या पढ़ा जाता है। आइए अब जानते हैं करवा चौथ के दिन पढ़ी जाने वाली वीरावती और सात भाइयों की संपूर्ण पौराणिक कथा।

अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर

करवा चौथ की कथा का टाइम 2026

29 अक्टूबर को करवा चौथ की कथा पढ़ने का समय शाम 05:38 से शुरू होकर शाम 06:56 बजे तक रहेगा। इस मुहूर्त में विधि विधान से पूजा करें और साथ ही इस पावन कथा को सुनें।

करवा चौथ कथा फोटो

करवा चौथ व्रत कथा (Karwa Chauth Vrat Katha In Hindi)

करवा चौथ की पावन कथा अनुसार, बहुत समय पहले की बात है। इन्द्रप्रस्थपुर नाम के एक शहर में वेदशर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहा करता था। जिसका विवाह लीलावती नाम की स्त्री से हुआ था। उनके सात पुत्र और एक वीरावती नाम की गुणवान पुत्री थी। वीरावती अपने माता-पिता के साथ-साथ भाइयों की भी लाडली थी। बड़े होने पर उस कन्या की शादी एक उचित ब्राह्मण युवक से करा दी गई। शादी के बाद वीरावती जब अपने माता-पिता के यहां आई तब उसने अपनी भाभियों के साथ करवा चौथ का व्रत रखा। इस व्रत के दौरान वीरावती भूख से व्याकुल हो उठी। उसका मुरझाया चेहरा देख उसके भाई काफी परेशान हो गए।

सबसे पहले यह जान लें कि करवा चौथ की कथा हमेशा शाम के समय शुभ मुहूर्त में ही पढ़ी या सुनी जाती है। कथा सुनने से पहले माता करवा और गणेश जी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इसके बाद हाथ में थोड़े से अक्षत लेकर इस पावन कथा को सुना या पढ़ा जाता है। आइए अब जानते हैं करवा चौथ के दिन पढ़ी जाने वाली वीरावती और सात भाइयों की संपूर्ण पौराणिक कथा।

करवा चौथ की कथा का टाइम 2026

29 अक्टूबर को करवा चौथ की कथा पढ़ने का समय शाम 05:38 से शुरू होकर शाम 06:56 बजे तक रहेगा। इस मुहूर्त में विधि विधान से पूजा करें और साथ ही इस पावन कथा को सुनें।

करवा चौथ कथा फोटो

करवा चौथ व्रत कथा (Karwa Chauth

करवा चौथ की पावन कथा अनुसार, बहुत समय पहले की बात है। इन्द्रप्रस्थपुर नाम के एक शहर में वेदशर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहा करता था। जिसका विवाह लीलावती नाम की स्त्री से हुआ था। उनके सात पुत्र और एक वीरावती नाम की गुणवान पुत्री थी। वीरावती अपने माता-पिता के साथ-साथ भाइयों की भी लाडली थी। बड़े होने पर उस कन्या की शादी एक उचित ब्राह्मण युवक से करा दी गई। शादी के बाद वीरावती जब अपने माता-पिता के यहां आई तब उसने अपनी भाभियों के साथ करवा चौथ का व्रत रखा। इस व्रत के दौरान वीरावती भूख से व्याकुल हो उठी। उसका मुरझाया चेहरा देख उसके भाई काफी परेशान हो गए।

भाईयों ने बहन को चांद निकलने से पहले ही कुछ खाने के लिए कहा लेकिन बहन ने इसके लिए साफ मना कर दिया। बहन ने कहा कि वह चन्द्रमा के दर्शन किये बिना भोजन ग्रहण नहीं करेगी चाहे उसके प्राण ही क्यों ना निकल जायें। फिर सभी भाईयों ने मिलकर एक योजना बनाई जिससे उनकी बहन भोजन ग्रहण कर ले। उनमें से एक भाई घर से कुछ दूरी पर स्थित एक वट के वृक्ष पर हाथ में छलनी और दीपक लेकर चढ़ गया। फिर अन्य भाईयों ने उससे कहा कि देखो चन्द्रोदय हो गया है।

भूख से व्याकुल वीरावती ने तुरंत ही दीपक को चन्द्रमा समझ अर्घ अर्पण कर अपना व्रत को तोड़ा। इसके बाद वीरावती ने जब भोजन करना प्रारम्भ किया तो उसे अशुभ संकेत मिलने लगे। पहला कौर लेते ही उसे उसमें बाल मिला, दूसरें में उसे छींक आई और तीसरे कौर में उसे अपने ससुराल से बुलावा आ गया। जब वो ससुराल पहुंची तो उसने देखा कि उसके पति की मृत्यु हो गई है। ये देख वीरावती जोर-जोर से रोने लगी। उसका विलाप सुनकर देवी इन्द्राणी उसके पास आई और सान्त्वना देने लगीं।

वीरावती ने देवी इन्द्राणी से पूछा कि करवा चौथ के दिन ही उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। वीरावती का दुःख देखकर देवी इन्द्राणी ने उससे कहा कि उसने चन्द्रमा को अर्घ दिये बिना ही अपना व्रत तोड़ा था जिसके कारण उसके पति की मृत्यु हो गई। वीरावती को अपनी भूल का अहसास हुआ और वे अपने पति को जीवित करने की देवी इन्द्राणी से विनती करने लगी। देवी इन्द्राणी ने वीरावती को करवा चौथ के व्रत के साथ-साथ पूरे साल में आने वाली हर माह की चौथ को व्रत करने की सलाह दी। साथ ही देवी ने उसे आश्वासित किया कि ऐसा करने से उसका पति जीवित लौट आएगा। इसके बाद वीरावती ने हर चौथ का विधि विधान से व्रत रखा जिससे वीरावती को उसका पति पुनः प्राप्त हो गया।