केंद्र सरकार भारतीय लोकतांत्रिक ढांचे में बड़े बदलाव की दिशा में आगे बढ़ती दिख रही है। संविधान (एक सौ इकतीसवां संशोधन) विधेयक, 2026 के जरिए लोकसभा और विधानसभाओं में सीटों के पुनर्समायोजन, निर्वाचन क्षेत्रों के नए परिसीमन और महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण को जल्द लागू करने का रास्ता साफ करने की कोशिश की गई है।

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इसके तहत लोकसभा की सीटें 850 तक करने का प्रस्ताव है। इसके लिए लोकसभा में गुरुवार को बिल पेश होने वाला है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)

प्रस्ताव में परिसीमन पर लगी पुरानी रोक हटाने का प्रावधान
यह प्रस्ताव सिर्फ सीटों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि जनसंख्या की संवैधानिक परिभाषा बदलने, परिसीमन पर लगी पुरानी रोक हटाने और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी नए ढांचे को लागू करने का व्यापक प्रयास है। सरकार के मुताबिक, 1971 की जनगणना के आधार पर लंबे समय से जमी हुई सीट व्यवस्था अब देश की मौजूदा जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को नहीं दर्शाती।

पिछले दशकों में शहरीकरण, आंतरिक माइग्रेशन, आबादी का असमान विस्तार और नए सामाजिक-राजनीतिक संतुलन ने प्रतिनिधित्व के सवाल को और अहम बना दिया है। ऐसे में यह विधेयक लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को अधिक संतुलित और समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

लोकसभा सीटें 850 करने की तैयारी
विधेयक का सबसे बड़ा और राजनीतिक रूप से सबसे असरदार प्रावधान लोकसभा की सदस्य संख्या में वृद्धि से जुड़ा है। संविधान के अनुच्छेद 81 में संशोधन का प्रस्ताव रखते हुए यह व्यवस्था की जा रही है कि राज्यों के क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों से सीधे चुने जाने वाले सदस्यों की संख्या 815 से अधिक नहीं होगी। इसके अलावा केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करने के लिए अधिकतम 35 सदस्य हो सकेंगे।

इस बदलाव का मतलब यह है कि भविष्य में लोकसभा की कुल क्षमता मौजूदा संख्या से काफी अधिक हो सकती है और वह 850 तक हो सकती है। सरकार का तर्क है कि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का आधार जनसंख्या और क्षेत्रीय संतुलन होना चाहिए।

यदि किसी राज्य या क्षेत्र की आबादी में भारी वृद्धि हुई है, तो वहां के मतदाताओं को उसी अनुपात में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। यही वजह है कि लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव सिर्फ तकनीकी संशोधन नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व के पुनर्गठन का संकेत माना जा रहा है। इस प्रस्ताव का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ेगा।

परिसीमन बिल
विधेयक का दूसरा अहम हिस्सा परिसीमन की प्रक्रिया को फिर से सक्रिय करना है। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 में मौजूद उस प्रावधान को हटाने का प्रस्ताव है, जिसके कारण 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़े प्रकाशित होने तक सीटों का नया पुनर्समायोजन नहीं किया जा सकता था। इस रोक को हटाकर सरकार नवीनतम प्रकाशित जनगणना के आधार पर परिसीमन का रास्ता खोलना चाहती है।

परिसीमन विधेयक, 2026 के तहत केंद्र सरकार एक नए परिसीमन आयोग का गठन करेगी। इस आयोग की संरचना भी स्पष्ट की गई है। आयोग के अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश होंगे। मुख्य चुनाव आयुक्त या उनके द्वारा नामित चुनाव आयुक्त पदेन सदस्य होंगे। आयोग का मुख्य काम नवीनतम जनगणना के आधार पर लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या तय करना, उनका पुनर्समायोजन करना और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं निर्धारित करना होगा।

प्रक्रिया के तहत आयोग अपने प्रारूप प्रस्ताव राजपत्र में प्रकाशित करेगा। इसके बाद सार्वजनिक आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए जाएंगे। एक बार अंतिम आदेश आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित हो जाने के बाद उन्हें कानून का दर्जा मिल जाएगा और उन्हें अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी।

परिसीमन के दौरान यह भी ध्यान रखा जाएगा कि निर्वाचन क्षेत्र भौगोलिक रूप से सुगठित हों, प्रशासनिक इकाइयों की सीमाओं का सम्मान हो और जनसुविधाओं तथा स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाए। इसका उद्देश्य सिर्फ जनसंख्या के आधार पर गणितीय विभाजन करना नहीं, बल्कि व्यावहारिक और प्रशासनिक रूप से सक्षम निर्वाचन क्षेत्र बनाना है।

विधेयक में जनसंंख्या की परिभाषा बदली
विधेयक में जनसंख्या की परिभाषा भी बदली जा रही है। अनुच्छेद 55, 81, 170, 330 और 332 में “जनसंख्या” का अर्थ अब उस जनगणना से होगा जिसे संसद कानून द्वारा निर्धारित करे और जिसके प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित हो चुके हों। इससे भविष्य में परिसीमन और सीट आवंटन के लिए अधिक लचीला और अपडेट आधार उपलब्ध होगा।

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व को लेकर भी विधेयक में विशेष प्रावधान किए गए हैं। अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा जैसे राज्यों में एसटी समुदायों के लिए सीटों के पुनर्समायोजन और आरक्षण अनुपात को लेकर स्पष्टता दी गई है, ताकि परिसीमन के बाद भी उनका प्रतिनिधित्व प्रभावित न हो।

महिला रिजर्वेशन परिसीमन के बाद तुरंत लागू
इस पूरे विधायी पैकेज का सबसे चर्चित पहलू महिलाओं के लिए आरक्षण को जल्द प्रभावी बनाना है। 106वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2023 यानी नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान किया गया था, लेकिन उसके लागू होने को परिसीमन और जनगणना से जोड़ा गया था।

इसी वजह से इसके अमल में समय लगने की आशंका थी। अब नया विधेयक अनुच्छेद 334A को बदलाव का प्रस्ताव करता है, ताकि महिलाओं के लिए आरक्षण “लेटेस्ट प्रकाशित जनगणना” के आधार पर किए जाने वाले परिसीमन के तुरंत बाद लागू किया जा सके।

इसका मतलब यह है कि महिला आरक्षण को लागू करने के लिए 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना का लंबा इंतजार जरूरी नहीं रहेगा, बल्कि उपलब्ध लेटेस्ट प्रकाशित आंकड़ों के आधार पर प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकेगी। यह आरक्षण लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और केंद्र शासित प्रदेशों में दिल्ली, पुडुचेरी तथा जम्मू-कश्मीर की विधानसभाओं पर लागू होगा।

महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें संबंधित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन के आधार पर आवंटित की जाएंगी। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में भी महिलाओं के लिए उप-आरक्षण लागू होगा।

इससे राजनीतिक प्रतिनिधित्व में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ संख्या के स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक विविधता के स्तर पर भी बढ़ेगी। विधेयक के अनुसार यह आरक्षण प्रारंभिक रूप से 15 वर्षों के लिए लागू रहेगा। संसद चाहे तो कानून बनाकर इसकी अवधि आगे भी बढ़ा सकती है।

केंद्र शासित प्रदेशों में क्या बदलेगा
संघ राज्य क्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 के जरिए तीन प्रमुख कानूनों में बदलाव प्रस्तावित हैं-केंद्र शासित प्रदेश सरकार अधिनियम, 1963; राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार अधिनियम, 1991; और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019। पुडुचेरी में विधानसभा की सदस्य संख्या अब परिसीमन आयोग तय करेगा और यह संख्या 30 से कम नहीं होगी।

केंद्र सरकार द्वारा मनोनीत सदस्यों की संख्या बढ़ाकर पांच की जाएगी, जिनमें दो महिलाएं होंगी। दिल्ली के मामले में विधानसभा की सदस्य संख्या परिसीमन आयोग तय करेगा और यह 70 से कम नहीं होगी। नए परिसीमन के लागू होने तक चुनाव मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर कराए जा सकेंगे। जम्मू-कश्मीर में विधानसभा की कुल सदस्य संख्या 114 से कम नहीं होगी।

पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्र के लिए 24 सीटें रिक्त रखी जाएंगी और उन्हें कुल सदस्य संख्या की गणना में शामिल नहीं किया जाएगा। उपराज्यपाल द्वारा महिलाओं और कश्मीरी प्रवासियों के प्रतिनिधित्व के लिए मनोनीत सदस्यों की संख्या परिसीमन के बाद बढ़ाकर तीन की जा सकेगी।

क्यों अहम है यह विधेयक
सरकार का कहना है कि 1971 की जनगणना पर आधारित सीट फ्रीज अब अपने उद्देश्य से आगे निकल चुका है। उस समय परिवार नियोजन को बढ़ावा देने और राज्यों के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए यह व्यवस्था की गई थी। लेकिन अब देश की आबादी, बसावट, शहरी विस्तार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की जरूरतें बदल चुकी हैं। महिला रिजर्वेशन प्रावधान को महिला राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है, क्योंकि इससे संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी संरचनात्मक रूप से बढ़ेगी।

पांच मुख्य बातें

  • लोकसभा की कुल सदस्य संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव, जिसमें राज्यों से चुने जाने वाले सदस्यों की अधिकतम संख्या 815 और केंद्र शासित प्रदेशों से 35 तक हो सकती है।
  • जनसंख्या की नई परिभाषा तय की जाएगी, जो संसद द्वारा निर्धारित और प्रकाशित नवीनतम जनगणना पर आधारित होगी।
  • परिसीमन पर लगी पुरानी संवैधानिक रोक हटेगी जिससे लेटेस्ट जनगणना के आधार पर सीटों और सीमाओं का पुनर्निर्धारण संभव होगा।
  • महिला आरक्षण को जल्द लागू करने का रास्ता ताकि लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और कुछ केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में एक-तिहाई आरक्षण परिसीमन के तुरंत बाद लागू हो सके।
  • दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर के कानूनों में भी संशोधन ताकि नया संवैधानिक ढांचा वहां की विधानसभाओं पर भी लागू किया जा सके।


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