पहाड़ की बेटी नेहा बोरा की आवाज बनी युवा शक्ति की हुंकार! झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए ।

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रुद्रपुर। शिक्षा, युवाओं के भविष्य, परीक्षा व्यवस्था और लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़े मुद्दों को लेकर जंतर-मंतर पर उठी आवाज में उत्तराखंड की बेटी नेहा बोरा ने अपनी बेबाक अभिव्यक्ति से खास पहचान बनाई। उनके साथ बड़ी संख्या में युवाओं ने शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से अपनी मांगों को सामने रखा।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


नेहा बोरा के संघर्ष को युवा शक्ति और नारी शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। सोशल मीडिया पर उनकी बेबाक बातों और आंदोलन से जुड़े संदेशों को व्यापक समर्थन मिला। कई लोगों ने उनके साहस की सराहना करते हुए कहा कि आज की Gen-Z केवल इंटरनेट की दुनिया तक सीमित पीढ़ी नहीं, देश, संविधान, शिक्षा और अपने भविष्य के सवालों पर सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक आवाज उठाने वाली जागरूक पीढ़ी है।
आंदोलन से जुड़े लोगों ने शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता, रोजगार और युवाओं के भविष्य से जुड़े सवालों को प्रमुखता से उठाया। आंदोलन की सफलता को जनता की एकजुटता और लोकतांत्रिक दबाव की शक्ति के रूप में देखा गया।

विचारों की लड़ाई विचारों से होगी, सवालों का जवाब सवालों से होगा। लोकतंत्र में असहमति का सम्मान ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। किसी नीति, निर्णय या व्यवस्था पर सवाल उठाना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। युवाओं की आवाज को दबाने के बजाय उसे सुनना चाहिए और तर्क के साथ जवाब देना चाहिए। राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं, मगर व्यक्तिगत अपमान, धमकी और हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। भारत का लोकतंत्र संवाद, संविधान, सहमति और असहमति की स्वस्थ परंपरा से मजबूत होता है। युवा शक्ति जब संयम, तथ्य और संवैधानिक मूल्यों के साथ आगे बढ़ती है, तब परिवर्तन की राह मजबूत होती है।

नेहा को घेरने वालों के लिए भी एक सवाल
किसी आंदोलनकारी महिला की बात से असहमति हो सकती है।
उसके तर्कों का विरोध किया जा सकता है।
उसके राजनीतिक विचारों पर बहस की जा सकती है।
मगर किसी महिला की आवाज को केवल इसलिए दबाने का प्रयास किया जाए कि उसने सत्ता से सवाल पूछे, तो यह लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए चिंता का विषय है।
किसी मंच पर मीडिया की भूमिका, किसी वक्ता की भूमिका या किसी आयोजन की व्यवस्था पर मतभेद हो सकते हैं।
इन मतभेदों का जवाब तथ्य और तर्क से दिया जाना चाहिए।
व्यक्तिगत अपमान से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता।


नेहा बोरा के संदर्भ में यह भी कहा गया कि उत्तराखंड की वीरांगना तीलू रौतेली की धरती की बेटियां आज आधुनिक लोकतांत्रिक संघर्ष में अपनी आवाज के साथ आगे आ रही हैं। राजनीति में व्यक्ति पूजा और लोकतांत्रिक नागरिकता के बीच अंतर समझने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।

इसलिए नागरिक का पहला दायित्व किसी व्यक्ति के प्रति अंधसमर्थन से ऊपर संविधान और राष्ट्र के प्रति होना चाहिए।
जो युवा सत्ता से सवाल पूछता है वह लोकतंत्र को कमजोर करने के बजाय उसे मजबूत भी कर सकता है, बशर्ते उसके आंदोलन की दिशा संविधान, तथ्य और शांतिपूर्ण जनभागीदारी पर आधारित हो।


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