राजनीतिक मिशन 2027: सितारगंज में सौरभ बहुगुणा बनाम बलवंत सिंह बोहरा?कांग्रेस के सामने टिकट का सवाल, पुराने धुरंधर पर दांव से बदल सकता है सितारगंज का चुनावी समीकरण

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राजनीतिक मिशन 2027: सितारगंज में सौरभ बहुगुणा बनाम बलवंत सिंह बोहरा?
कांग्रेस के सामने टिकट का सवाल, पुराने धुरंधर पर दांव से बदल सकता है सितारगंज का चुनावी समीकरण
रुद्रपुर। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ऊधम सिंह नगर की सितारगंज विधानसभा सीट पर राजनीतिक चर्चाएं तेज होने लगी हैं। भाजपा के सौरभ बहुगुणा लगातार दो बार इस सीट से चुनाव जीत चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2027 में बहुगुणा के सामने किस चेहरे को उतारा जाए, जो भाजपा को मजबूत चुनौती दे सके।
इसी क्रम में कांग्रेस के वरिष्ठ और पुराने नेता बलवंत सिंह बोहरा का नाम राजनीतिक चर्चा में तेजी से सामने आ रहा है। यदि कांग्रेस बोहरा पर भरोसा जताती है तो सितारगंज में मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच नहीं रहेगा, बल्कि इसे स्थापित राजनीतिक जनाधार बनाम दशकों के राजनीतिक अनुभव की लड़ाई के रूप में भी देखा जा सकता है।
सौरभ बहुगुणा के सामने तीसरी जीत की चुनौती

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


सौरभ बहुगुणा ने 2017 और 2022 में सितारगंज से जीत दर्ज की। 2022 में उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी नवतेज पाल सिंह को 10,938 मतों के अंतर से हराया। बहुगुणा को 43,354 और नवतेज पाल सिंह को 32,416 वोट मिले।
इसके अलावा आम आदमी पार्टी के अजय जायसवाल को 10,135 तथा बसपा के नारायण पाल को 9,258 वोट मिले थे।
इन आंकड़ों से साफ है कि भाजपा ने पिछले चुनाव में मजबूत बढ़त बनाई थी। लेकिन 2027 में राजनीतिक परिस्थितियां क्या रहेंगी, यह प्रत्याशियों के चयन और चुनावी मुद्दों पर काफी निर्भर करेगा।
बोहरा पर दांव क्यों?
बलवंत सिंह बोहरा की राजनीति नई नहीं है। उनके समर्थकों के अनुसार उन्होंने 1980 और 1990 के दशक से कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई और कुमाऊं के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ लंबे समय तक काम किया।
हल्द्वानी और नैनीताल क्षेत्र से लेकर सितारगंज तक उनके राजनीतिक संपर्कों की चर्चा होती रही है। यशपाल आर्य, हरीश रावत और नारायण दत्त तिवारी जैसे कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के दौर में पार्टी संगठन और सत्ता के गलियारों में उनकी सक्रियता रही है।
बोहरा की सबसे बड़ी ताकत उनके समर्थक उनका लंबा राजनीतिक अनुभव और जमीनी संपर्क मानते हैं। टिकट की दौड़ में कई बार पीछे रहने के बावजूद उनका पार्टी से जुड़ाव और क्षेत्र में सक्रियता बनी रही।
अब सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अपने पुराने राजनीतिक कार्यकर्ता को 2027 में सितारगंज से मौका देकर नया राजनीतिक प्रयोग करेगी?
पर्वतीय मतदाता बन सकते हैं अहम कड़ी
सितारगंज की राजनीति में पर्वतीय मूल के मतदाताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। बोहरा समर्थकों का दावा है कि क्षेत्र में लगभग 22 से 23 हजार पर्वतीय मतदाता हैं।
उनका तर्क है कि यदि कांग्रेस ऐसा प्रत्याशी उतारती है जिसकी स्वीकार्यता पर्वतीय समाज के साथ-साथ मैदानी और स्थानीय मतदाताओं में भी हो, तो भाजपा के सामने मुकाबला कठिन किया जा सकता है।
हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि चुनाव में किसी एक सामाजिक समूह का समर्थन अपने आप जीत की गारंटी नहीं होता। बूथ स्तर का संगठन, स्थानीय मुद्दे, प्रत्याशी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और चुनावी माहौल भी परिणाम तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
नारायण पाल की वापसी ने बढ़ाई राजनीतिक चर्चा
सितारगंज की राजनीति का इतिहास भी काफी दिलचस्प रहा है। नारायण पाल 2002 और 2007 में बसपा के टिकट पर लगातार दो बार विधायक बने। 2002 में उनकी जीत बेहद बड़ी रही और वे विधानसभा में बसपा विधायक दल के नेता भी बने।
2007 में भी उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी कांता प्रसाद सागर को 8,437 मतों से पराजित किया। बाद में 2012 में भाजपा के किरण चंद मंडल ने उन्हें हरा दिया।
2022 में नारायण पाल बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े, लेकिन चौथे स्थान पर रहे। 2026 में उनके कांग्रेस में आने की चर्चा के बाद सितारगंज की कांग्रेस राजनीति में संभावित उम्मीदवारों को लेकर बहस और तेज हुई है।
यहीं से कांग्रेस के सामने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल खड़ा होता है—क्या पार्टी पुराने राजनीतिक चेहरों में से किसी को आगे बढ़ाएगी या व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता वाले नए समीकरण पर दांव लगाएगी?
सामान्य सीट पर टिकट को लेकर सवाल
सितारगंज सामान्य श्रेणी की विधानसभा सीट है। कांग्रेस के भीतर संभावित उम्मीदवारों को लेकर यह तर्क भी सामने आ रहा है कि पार्टी को ऐसा चेहरा मैदान में उतारना चाहिए, जिसकी स्वीकार्यता किसी एक वर्ग तक सीमित न हो।
बलवंत सिंह बोहरा के समर्थक इसी बात को उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बताते हैं। उनका मानना है कि बोहरा को टिकट मिलने पर कांग्रेस के पुराने संगठनात्मक संपर्क सक्रिय हो सकते हैं और कुमाऊं के पर्वतीय तथा मैदानी समाज के बीच राजनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश की जा सकती है।
यह फिलहाल राजनीतिक चर्चा और संभावित चुनावी रणनीति है। कांग्रेस की ओर से 2027 के लिए सितारगंज से प्रत्याशी की कोई आधिकारिक घोषणा अभी नहीं हुई है।
क्या सौरभ बहुगुणा को कुमाऊं में चुनौती देंगे बोहरा?
राजनीतिक गलियारों में सबसे दिलचस्प चर्चा यही है कि अगर भाजपा सौरभ बहुगुणा को मैदान में उतारती है और कांग्रेस बलवंत सिंह बोहरा पर दांव लगाती है तो सितारगंज का मुकाबला किस दिशा में जाएगा?
एक तरफ बहुगुणा के पास लगातार दो विधानसभा चुनाव जीतने का अनुभव, भाजपा का मजबूत संगठन और अपना व्यक्तिगत प्रभाव है। दूसरी तरफ बोहरा के पास कई दशकों का राजनीतिक अनुभव, कांग्रेस के पुराने नेताओं से संपर्क और क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय रहने का दावा है।
यही वजह है कि बोहरा समर्थक इसे “अनुभव बनाम युवा नेतृत्व” का मुकाबला बता रहे हैं।
ऊधम सिंह नगर की राजनीति पर भी पड़ सकता है असर
सितारगंज का चुनाव केवल एक विधानसभा सीट तक सीमित नहीं रहेगा। ऊधम सिंह नगर की कई सीटों पर सामाजिक और राजनीतिक समीकरण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
यदि कांग्रेस सितारगंज में मजबूत प्रत्याशी उतारकर भाजपा को कड़ी टक्कर देती है तो पार्टी के कार्यकर्ताओं में जिले की दूसरी सीटों को लेकर भी उत्साह पैदा हो सकता है। बोहरा समर्थकों का मानना है कि उनके जैसे अनुभवी नेता को आगे करने से कांग्रेस पूरे ऊधम सिंह नगर में पुराने संगठनात्मक नेटवर्क को सक्रिय कर सकती है।
लेकिन दूसरी ओर भाजपा भी अपने संगठन और मौजूदा विधायक की लोकप्रियता के आधार पर जवाबी रणनीति तैयार करेगी।
2027 में किसकी होगी बाजी?
सितारगंज की चुनावी पटकथा अभी लिखी जानी बाकी है। सौरभ बहुगुणा लगातार दो जीत के बाद तीसरी बार मैदान में उतरते हैं तो उनके सामने अपनी राजनीतिक पकड़ साबित करने की चुनौती होगी।
वहीं कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल प्रत्याशी चयन का है। यदि पार्टी बलवंत सिंह बोहरा पर दांव लगाती है तो एक अनुभवी राजनीतिक चेहरे को भाजपा के मजबूत उम्मीदवार के सामने उतारा जाएगा।
सितारगंज में फिलहाल मुकाबला घोषित नहीं हुआ है, लेकिन राजनीतिक चर्चा ने एक संभावित मुकाबले की तस्वीर जरूर खींच दी है—सौरभ बहुगुणा बनाम बलवंत सिंह बोहरा।
अगर यह मुकाबला वास्तविकता बनता है तो 2027 में सितारगंज की लड़ाई ऊधम सिंह नगर की सबसे चर्चित विधानसभा जंग में शामिल हो सकती है।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | राजनीतिक मिशन 2027

सितारगंज में बदलते चुनावी समीकरण
2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सितारगंज में संभावित प्रत्याशियों की चर्चा तेज है। बलवंत सिंह बोहरा की संभावित उम्मीदवारी को उनके समर्थक लंबे राजनीतिक अनुभव, संगठनात्मक संपर्क और विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच संवाद की क्षमता से जोड़कर देख रहे हैं। उनका तर्क है कि यदि कांग्रेस ऐसा चेहरा उतारती है जिसकी स्वीकार्यता पर्वतीय और मैदानी दोनों क्षेत्रों में हो, तो चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। हालांकि जीत किसी एक सामाजिक समीकरण से तय नहीं होती। स्थानीय मुद्दे, संगठन, प्रत्याशी की लोकप्रियता और मतदान के समय का राजनीतिक माहौल निर्णायक भूमिका निभाएगा। सितारगंज में 2027 का मुकाबला इसलिए दिलचस्प हो सकता है।


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