रुद्रपुर। राजनीति भी बड़ी मजेदार चीज है। कभी-कभी नेता नारा कुछ और लगाने निकलते हैं और नारा लगाते-लगाते सवाल अपने ही दरवाजे पर खड़ा कर देते हैं। रुद्रपुर में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला।
एक तरफ युवा कांग्रेस हजारों कार्यकर्ताओं के साथ कलेक्ट्रेट की ओर बढ़ रही थी। दूसरी तरफ मेट्रोपोलिस गेट पर भाजपा कार्यकर्ता कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा संभाले खड़े थे। हाथ में पुतला, मुंह पर नारे और राजनीतिक उत्साह ऐसा कि लगा आज मेट्रोपोलिस का गेट ही विधानसभा का सदन बन गया है।
भाजपा कार्यकर्ताओं की ओर से “दलित विरोधी कांग्रेस पार्टी मुर्दाबाद”, “दलित विरोधी राहुल गांधी मुर्दाबाद” जैसे नारे लगाए गए। कुछ अन्य नारे भी कांग्रेस और उसके नेताओं के खिलाफ लगाए गए।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
अब सवाल यह है कि भाजपा ने कांग्रेस को दलित विरोधी घोषित करने का प्रमाणपत्र आखिर किस आधार पर बांटना शुरू कर दिया?
और इससे भी बड़ा सवाल यह है कि जब भाजपा स्वयं दलित सम्मान की इतनी बड़ी पैरोकार है तो फिर रामलीला मैदान के कथित शुद्धिकरण की घटना को लेकर भाजपा से सवाल क्यों न पूछा जाए?
वीडियो में नारे, राजनीति में पहेली
इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो भी सामने आ रहा है। वीडियो में भाजपा कार्यकर्ताओं की ओर से कांग्रेस और राहुल गांधी के खिलाफ दलित विरोधी होने के नारे सुनाई दे रहे हैं।
अब जरा इस राजनीतिक गणित को समझिए।
एक तरफ कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व सामाजिक न्याय और संविधान की बात करता है। दूसरी तरफ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को लेकर विवाद खड़ा होता है। फिर कांग्रेस के कार्यक्रम के बाद कथित शुद्धिकरण की घटना सामने आती है। और उसके बाद उसी राजनीतिक विवाद के बीच भाजपा कार्यकर्ता कांग्रेस को ही “दलित विरोधी” बताकर नारे लगाने लगते हैं।
यह कुछ ऐसा ही हुआ जैसे किसी के घर में पानी घुस जाए और पड़ोसी उसके खिलाफ नारा लगाने लगे कि “बाढ़ पीड़ित मुर्दाबाद।”
भाई साहब, पीड़ित कौन है?
जिसके कार्यक्रम के बाद शुद्धिकरण हुआ, वह सवाल पूछ रहा है।
जिस नेता को लेकर विवाद खड़ा हुआ, वह सवालों के केंद्र में है।
जिस समुदाय की सामाजिक गरिमा को लेकर बहस हो रही है, वह सवाल पूछ रहा है।
और नारा किसके खिलाफ?
कांग्रेस मुर्दाबाद! राहुल गांधी मुर्दाबाद!
राजनीतिक हास्य का इससे बेहतर उदाहरण शायद चुनावी मौसम में ढूंढना मुश्किल हो।
अगर कांग्रेस दलित विरोधी है तो शुद्धिकरण किसका हुआ?
अब भाजपा से एक सीधा सवाल।
अगर कांग्रेस दलित विरोधी है, तो कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के कार्यक्रम के बाद मैदान के कथित शुद्धिकरण की जरूरत किसे महसूस हुई?
अगर राहुल गांधी दलित विरोधी हैं, तो उनके खिलाफ दलित विरोधी का नारा लगाने से पहले यह भी बताया जाए कि दलित सम्मान का प्रमाणपत्र भाजपा किस संस्था से जारी करवा रही है?
अगर कांग्रेस दलित विरोधी है, तो फिर कांग्रेस के सम्मेलन के बाद कथित शुद्धिकरण करने वालों से भाजपा की राजनीतिक दूरी कितनी है?
सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि शुद्धिकरण की राजनीति अपने आप में सामाजिक बराबरी के विचार पर सवाल खड़े करती है।
किसी व्यक्ति के आने से कोई स्थान अपवित्र हो जाए और उसके जाने के बाद उसे शुद्ध करना पड़े—यह सोच आधुनिक संविधान और बराबरी के लोकतांत्रिक सिद्धांतों से मेल खाती है या मनुवादी सामाजिक सोच से?
यही असली प्रश्न है।
मनुस्मृति का नाम आते ही राजनीति क्यों असहज हो जाती है?
जब जातिगत ऊंच-नीच की पुरानी व्यवस्था की चर्चा होती है तो मनुस्मृति का संदर्भ भी सामने आता है। मनुस्मृति के कुछ हिस्सों में वर्ण के आधार पर असमान दंडों का उल्लेख मिलता है। यही कारण है कि डॉ. भीमराव आंबेडकर जैसे सामाजिक चिंतकों ने जाति व्यवस्था और उससे जुड़े शास्त्रीय औचित्य की तीखी आलोचना की।
आधुनिक भारत की आत्मा मनुस्मृति के वर्ण-आधारित दंड विधान में नहीं, संविधान की समानता में है।
आज किसी नागरिक का सम्मान उसके जन्म से तय नहीं होता। कानून की नजर में नागरिक समान है।
फिर सवाल यह है कि अगर कोई राजनीतिक संगठन दलित सम्मान की बात करता है तो उसे सबसे पहले अपने व्यवहार और राजनीतिक सहयोगियों के आचरण को भी देखना चाहिए।
दलित सम्मान नारे से साबित होता है या व्यवहार से?
यही सवाल भाजपा से पूछा जाना चाहिए।
भाजपा का नारा कहीं आत्मघाती गोल तो नहीं?
मेट्रोपोलिस गेट पर भाजपा कार्यकर्ताओं का कांग्रेस के खिलाफ प्रदर्शन राजनीतिक रूप से उनका अधिकार है। कांग्रेस के खिलाफ नारे लगाना भी उनका अधिकार है। मगर जब नारे में “दलित विरोधी” जैसा आरोप लगाया जाता है तो फिर उस आरोप के समर्थन में राजनीतिक तर्क भी देना पड़ेगा।
वरना मामला ऐसा हो जाता है जैसे कोई व्यक्ति आईने के सामने खड़ा होकर आईने को ही बदसूरत कहने लगे।
भाजपा कहती है—कांग्रेस दलित विरोधी।
कांग्रेस कहती है—भाजपा मनुवादी।
जनता कहती है—भाई, मुद्दा बताओ!
रोजगार कहां है?
युवाओं के अवसर कहां हैं?
शिक्षा का सवाल क्या है?
स्वास्थ्य व्यवस्था कैसी है?
महंगाई का क्या हुआ?
शहर की सड़कें और जलभराव कब सुधरेंगे?
और सबसे बड़ा सवाल—जाति के नाम पर राजनीति करने के बजाय सामाजिक बराबरी के लिए ठोस काम क्या हुआ?
गोबर गणेश वाली राजनीति से जनता सावधान
राजनीति में विरोध जरूरी है। लोकतंत्र में विपक्ष जरूरी है। सरकार से सवाल जरूरी हैं। मगर जब राजनीतिक नारे इतने उलझ जाएं कि लगाने वाला खुद यह भूल जाए कि नारा किसके पक्ष में जा रहा है और किसके खिलाफ, तब जनता मुस्कुराएगी भी और सवाल भी करेगी।
भाजपा अगर 2027 के चुनाव से पहले रुद्रपुर में अपनी राजनीतिक जमीन की ताकत नाप रही है तो यह उसका अधिकार है।
मगर अगर रणनीति यह है कि कांग्रेस के खिलाफ हर विरोध को “दलित विरोधी” का तमगा देकर चुनावी मैदान में उतरा जाए, तो भाजपा को यह भी देखना पड़ेगा कि जनता वीडियो देखकर क्या निष्कर्ष निकाल रही है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि नारा कांग्रेस के खिलाफ लगाया गया और सवाल भाजपा के सामने आ गया?
यही राजनीति का सबसे बड़ा व्यंग्य है।
राहुल गांधी दलित विरोधी? फिर तर्क कहां है?
राहुल गांधी को दलित विरोधी कह देना आसान है। किसी भी नेता के खिलाफ नारा लगाना उससे भी आसान है।
मगर लोकतंत्र में आरोप के साथ तथ्य भी चाहिए।
राहुल गांधी की राजनीति का बड़ा हिस्सा संविधान, सामाजिक न्याय, आरक्षण और प्रतिनिधित्व के मुद्दों पर केंद्रित रहा है। उनकी राजनीति से असहमति पूरी तरह वैध है। उनके खिलाफ राजनीतिक आलोचना भी हो सकती है।
लेकिन “दलित विरोधी” जैसे गंभीर आरोप को केवल नारे में बदल देना राजनीतिक विमर्श को कमजोर करता है।
और यदि उसी समय किसी सार्वजनिक स्थान के “शुद्धिकरण” की घटना पर सवाल उठ रहे हों, तो भाजपा को सबसे पहले अपने राजनीतिक पक्ष की स्पष्टता जनता के सामने रखनी चाहिए।
2027 से पहले असली परीक्षा
उधम सिंह नगर में 2027 की चुनावी पटकथा धीरे-धीरे लिखी जा रही है।
युवा कांग्रेस की भीड़, भाजपा की जवाबी सक्रियता, कलेक्ट्रेट की बैरिकेडिंग, पुलिस की मौजूदगी, पुतला दहन और मेट्रोपोलिस गेट पर नारे—ये सभी संकेत हैं कि चुनावी तापमान बढ़ रहा है।
मगर चुनाव केवल भीड़ से नहीं जीता जाता।
नारे से भी नहीं।
पुतला जलाने से भी नहीं।
और किसी को “दलित विरोधी” घोषित कर देने से भी नहीं।
चुनाव उस दिन जीता जाएगा जब जनता मतदान केंद्र पर खड़ी होकर तय करेगी कि किसने उसके जीवन से जुड़े सवालों पर काम किया और किसने केवल दूसरे पर आरोप लगाए।
इसलिए भाजपा के सामने आज सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल कांग्रेस नहीं, उसकी अपनी विश्वसनीयता है।
अगर भाजपा सचमुच दलित सम्मान की राजनीति करना चाहती है तो उसे हर उस सामाजिक सोच से दूरी बनानी होगी जो जन्म के आधार पर किसी मनुष्य को ऊंचा या नीचा मानती है।
और कांग्रेस को भी केवल भाजपा पर आरोप लगाने के बजाय यह साबित करना होगा कि सामाजिक न्याय उसके लिए चुनावी नारा नहीं, शासन की नीति है।
रुद्रपुर की जनता इतनी भोली भी नहीं कि एक तरफ “दलित विरोधी कांग्रेस” का नारा सुने और दूसरी तरफ शुद्धिकरण की घटना को देखकर सवाल ही न करे।
इसलिए मेट्रोपोलिस गेट से उठी आवाज का सबसे बड़ा राजनीतिक व्यंग्य यही है—
भाजपा कांग्रेस को दलित विरोधी साबित करने निकली थी, मगर जनता ने पूछ लिया—पहले यह बताइए कि शुद्धिकरण किस सोच का प्रतीक था?
और अगर इस सवाल का जवाब नारे में दिया जाएगा तो जनता शायद अगला सवाल और जोर से पूछेगी—
“दलित सम्मान भाषण में है या व्यवहार में?”
2027 की राह में यही सवाल रुद्रपुर से लेकर पूरे उत्तराखंड तक राजनीतिक दलों का पीछा करने वाला है।
