।महेंद्र भट्ट के बयान का असली संदेश: क्या 2027 में भाजपा का मुकाबला कांग्रेस नहीं, उत्तराखंड क्रांति दल से होगा?

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रुद्रपुर उत्तराखंड की राजनीति में कई बार ऐसे बयान आते हैं, जिनका अर्थ केवल शब्दों में नहीं बल्कि उनके राजनीतिक संकेतों में छिपा होता है। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का हालिया बयान भी कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। उन्होंने कांग्रेस को विपक्ष की भूमिका निभाने में विफल बताते हुए कहा कि वह 2027 के विधानसभा चुनाव में “बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने” का इंतजार कर रही है। पहली नजर में यह कांग्रेस पर हमला लगता है, लेकिन यदि इस बयान की गहराई में जाया जाए तो एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न उभरता है—क्या भाजपा अब कांग्रेस को अपनी मुख्य चुनौती मानना ही छोड़ चुकी है? और क्या भाजपा के रणनीतिकारों को वास्तविक खतरा उत्तराखंड क्रांति दल से दिखाई देने लगा है?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड


उत्तराखंड राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। यह वही राज्य है, जिसकी परिकल्पना क्षेत्रीय अस्मिता, पर्वतीय विकास, स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय अधिकार, रोजगार और पलायन रोकने जैसे मूल उद्देश्यों के साथ की गई थी। लेकिन इन 25 वर्षों में सत्ता कांग्रेस और भाजपा के बीच घूमती रही। जनता ने दोनों दलों को पर्याप्त अवसर दिए, लेकिन आज भी उत्तराखंड के अनेक मूल प्रश्न जस के तस खड़े हैं।
महेंद्र भट्ट ने अपने बयान में कांग्रेस की कमजोरियों का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने कांग्रेस की गुटबाजी, नेतृत्व संकट और चुनावी विफलताओं को गिनाया। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि उन्होंने यह नहीं बताया कि यदि कांग्रेस कमजोर है तो विपक्ष की वास्तविक भूमिका कौन निभा रहा है? यही वह प्रश्न है जो उत्तराखंड की राजनीति को नए मोड़ पर ले जा सकता है।

पूर्व विधायक पुष्पेश त्रिपाठी ने कहा कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ने 25 वर्षों में उत्तराखंड की मूल भावनाओं और राज्य आंदोलन के सपनों के साथ न्याय नहीं किया। भाजपा विकास के दावों में व्यस्त है तो कांग्रेस केवल सत्ता वापसी के सपने देख रही है। आज भी पलायन, बेरोजगारी, भू-कानून और मूल निवास जैसे मुद्दे अनसुलझे हैं। उत्तराखंड की जनता अब राष्ट्रीय दलों के छलावे को समझ चुकी है। मिशन 2027 में उत्तराखंड क्रांति दल राज्य आंदोलन के अधूरे संकल्पों को पूरा करने के लिए मैदान में उतरेगा। जनता परिवर्तन चाहती है और उत्तराखंडियत की आवाज को मजबूत करेगी।

“भाजपा-कांग्रेस ने उत्तराखंड के सपनों से किया विश्वासघात, मिशन 2027 में जनता देगी जवाब पूर्व विधायक पुष्पेश त्रिपाठी

आज उत्तराखंड में यदि कोई दल राज्य आंदोलन की मूल भावना, स्थायी राजधानी, भू-कानून, मूल निवास, स्थानीय युवाओं के रोजगार, पर्वतीय अर्थव्यवस्था और पलायन जैसे मुद्दों को लगातार उठा रहा है तो वह उत्तराखंड क्रांति दल है। यूकेडी भले ही विधानसभा में बड़ी संख्या में सीटें न रखती हो, लेकिन वैचारिक स्तर पर वह लगातार उन सवालों को जीवित रखे हुए है, जिनके आधार पर उत्तराखंड राज्य का निर्माण हुआ था।
भाजपा के लिए कांग्रेस को घेरना आसान राजनीतिक रणनीति है। कांग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण, परिवारवाद और संगठनात्मक कमजोरी के आरोप लंबे समय से लगाए जाते रहे हैं। भाजपा की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस के खिलाफ वैचारिक ध्रुवीकरण पर आधारित रहा है। लेकिन यही फार्मूला उत्तराखंड क्रांति दल पर लागू नहीं होता।
यूकेडी न तो राष्ट्रीय दल है और न ही उस पर तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप आसानी से लगाया जा सकता है। उसका पूरा राजनीतिक आधार उत्तराखंड की क्षेत्रीय पहचान और स्थानीय मुद्दों पर टिका हुआ है। यही कारण है कि भाजपा के लिए यूकेडी का मुकाबला कांग्रेस की तुलना में अधिक जटिल हो सकता है।
यदि कांग्रेस पर हिंदू-मुस्लिम राजनीति का आरोप लगाकर चुनावी ध्रुवीकरण संभव है तो यूकेडी के खिलाफ यह रणनीति सीमित प्रभाव ही छोड़ सकती है। क्योंकि यूकेडी की राजनीति का केंद्र धार्मिक पहचान नहीं बल्कि उत्तराखंडी पहचान है। वह सवाल पूछती है कि राज्य बनने के बाद भी पहाड़ खाली क्यों हो रहे हैं? युवा रोजगार के लिए बाहर क्यों जा रहे हैं? स्थानीय संसाधनों का लाभ स्थानीय लोगों तक क्यों नहीं पहुंच रहा? भू-कानून पर निर्णायक कदम क्यों नहीं उठाए गए?
ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर केवल वैचारिक बहस से नहीं बल्कि शासन की उपलब्धियों और कमियों के आधार पर देना पड़ता है।
महेंद्र भट्ट ने भाजपा सरकार की उपलब्धियों का लंबा विवरण दिया। समान नागरिक संहिता, धर्मांतरण विरोधी कानून, नकल विरोधी कानून, रिकॉर्ड सरकारी भर्तियां, चारधाम परियोजना, सड़क और रेल कनेक्टिविटी जैसे अनेक कार्यों का उल्लेख किया गया। निस्संदेह ये भाजपा सरकार की उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किए जा सकते हैं। लेकिन दूसरी ओर यूकेडी यह सवाल उठाती है कि क्या इन उपलब्धियों के बावजूद उत्तराखंड आंदोलन के मूल सपने पूरे हुए हैं?
उत्तराखंड आंदोलन केवल प्रशासनिक राज्य निर्माण का आंदोलन नहीं था। वह एक सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का आंदोलन था। आंदोलनकारियों ने ऐसे उत्तराखंड की कल्पना की थी जहां गांव आबाद रहें, स्थानीय युवाओं को रोजगार मिले, जल-जंगल-जमीन पर स्थानीय समाज का अधिकार हो और पहाड़ विकास के केंद्र में हों। यदि आज भी पलायन आयोग की रिपोर्टें चिंता पैदा करती हैं, यदि हजारों गांव जनशून्यता की ओर बढ़ रहे हैं, यदि स्थानीय युवाओं में रोजगार को लेकर असंतोष दिखाई देता है, तो यह स्वाभाविक है कि यूकेडी इन प्रश्नों को अपने राजनीतिक एजेंडे का केंद्र बनाए।
यही वह क्षेत्र है जहां भाजपा को कांग्रेस की तुलना में अधिक चुनौती महसूस हो सकती है।
कांग्रेस की स्थिति यह है कि वह स्वयं अपने संगठनात्मक संकटों से जूझती दिखाई देती है। कई बार ऐसा लगता है कि कांग्रेस भाजपा की वैकल्पिक राजनीति प्रस्तुत करने के बजाय केवल भाजपा विरोध तक सीमित हो गई है। इसके विपरीत यूकेडी भाजपा और कांग्रेस दोनों से अलग तीसरा राजनीतिक विमर्श खड़ा करने की कोशिश करती है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो भाजपा के लिए सबसे कठिन प्रतिद्वंद्वी वह होता है जो उसके वैचारिक विरोधी खांचे में फिट न बैठे। कांग्रेस को भाजपा लंबे समय से अपने राजनीतिक आख्यान का हिस्सा बनाकर लड़ती रही है। लेकिन यूकेडी एक अलग तरह की चुनौती पेश करती है। वह भाजपा से पूछती है कि 25 वर्षों में उत्तराखंड को वास्तव में क्या मिला और क्या खोया? वह कांग्रेस से भी यही प्रश्न पूछती है।
इस अर्थ में यूकेडी दोनों राष्ट्रीय दलों को एक साथ कठघरे में खड़ा करती है।
2027 के चुनाव की ओर बढ़ते हुए उत्तराखंड की राजनीति में यह प्रश्न और महत्वपूर्ण होता जाएगा कि क्या जनता फिर भाजपा और कांग्रेस के पारंपरिक मुकाबले को ही स्वीकार करेगी या फिर क्षेत्रीय विकल्प को गंभीरता से देखेगी? इतिहास बताता है कि क्षेत्रीय दल तब मजबूत होते हैं जब राष्ट्रीय दल जनता की स्थानीय आकांक्षाओं को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं कर पाते।
महेंद्र भट्ट के बयान का एक अप्रत्यक्ष संदेश यह भी माना जा सकता है कि भाजपा कांग्रेस को अब उतनी बड़ी चुनौती नहीं मान रही जितनी पहले मानती थी। यदि ऐसा है तो राजनीतिक रिक्तता को भरने की सबसे स्वाभाविक संभावना यूकेडी के सामने है।
यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि 2027 में यूकेडी विधानसभा में दूसरे नंबर की पार्टी बन जाएगी। चुनावी राजनीति केवल मुद्दों से नहीं बल्कि संगठन, संसाधन, नेतृत्व और जनाधार से भी तय होती है। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि यदि उत्तराखंड के मूल मुद्दों पर गंभीर राजनीतिक बहस होती है तो उसका सबसे अधिक लाभ यूकेडी को मिल सकता है।
आज उत्तराखंड की राजनीति एक चौराहे पर खड़ी है। एक ओर भाजपा अपनी उपलब्धियों के आधार पर लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का सपना देख रही है। दूसरी ओर कांग्रेस अभी भी अपने संगठनात्मक पुनर्निर्माण की चुनौती से जूझ रही है। इसी बीच उत्तराखंड क्रांति दल यह याद दिला रहा है कि राज्य आंदोलन के मूल उद्देश्य अभी अधूरे हैं।
महेंद्र भट्ट का बयान भले ही कांग्रेस पर हमला हो, लेकिन उसके राजनीतिक निहितार्थ कहीं अधिक व्यापक हैं। यह बयान अनजाने में उस बहस को जन्म देता है कि उत्तराखंड में वास्तविक विपक्ष कौन है? यदि कांग्रेस जनता के बीच प्रभावी विपक्ष की भूमिका निभाने में असफल रहती है और यूकेडी राज्य के मूल प्रश्नों को लगातार उठाती रहती है, तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड की राजनीति का केंद्र बदल सकता है।
संभव है कि 2027 का चुनाव भाजपा बनाम कांग्रेस के बजाय भाजपा बनाम उत्तराखंडियत की राजनीति के रूप में देखा जाए। और यदि ऐसा हुआ तो उत्तराखंड क्रांति दल पहली बार राज्य की राजनीति में उस स्थान पर पहुंच सकता है, जिसकी कल्पना उसके संस्थापकों ने राज्य आंदोलन के दिनों में की थी।
यही कारण है कि भाजपा के लिए सबसे बड़ा प्रश्न कांग्रेस नहीं, बल्कि वह राजनीतिक विचार है जो लगातार पूछ रहा है—उत्तराखंड राज्य आखिर किस उद्देश्य से बनाया गया था और 25 वर्षों बाद हम उस लक्ष्य से कितनी दूरी पर खड़े हैं?


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