देहरादून। उत्तराखण्ड के एसएसबी प्रशिक्षित गुरिल्लाओं ने अपनी वर्षों पुरानी मांगों को लेकर एक बार फिर आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है। संगठन ने घोषणा की है कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र निर्णय नहीं लिया गया तो 29 और 30 जून से प्रदेश में अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन शुरू किया जाएगा। संगठन का कहना है कि लगभग दो दशकों से वे सरकारों के आश्वासनों और वादों के भरोसे संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन आज तक उनकी समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो पाया है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
संगठन के सचिव हुकुम सिंह बिष्ट के अनुसार एसएसबी प्रशिक्षित गुरिल्लाओं का धैर्य अब जवाब दे रहा है। लंबे समय से उपेक्षा का शिकार यह वर्ग सरकार से केवल अपने अधिकारों और किए गए वादों को पूरा करने की मांग कर रहा है। बार-बार ज्ञापन, धरना, प्रदर्शन और वार्ताओं के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है।
क्या है एसएसबी प्रशिक्षित गुरिल्ला योजना का इतिहास
उत्तराखण्ड के सीमांत क्षेत्रों में वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से विशेष सेवा ब्यूरो (एसएसबी) द्वारा सीमावर्ती गांवों के युवाओं को गुरिल्ला युद्ध, सुरक्षा और आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया गया था। उस समय इन युवाओं को यह भरोसा दिलाया गया था कि आवश्यकता पड़ने पर उनकी सेवाओं का उपयोग किया जाएगा और उन्हें रोजगार के अवसरों में प्राथमिकता मिलेगी।
हजारों युवाओं ने देश सेवा की भावना से प्रशिक्षण प्राप्त किया। उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़, चम्पावत, उत्तरकाशी, चमोली और अन्य सीमांत जिलों के युवाओं ने कठिन परिस्थितियों में प्रशिक्षण लेकर अपनी भूमिका निभाई। लेकिन समय बीतने के साथ यह योजना लगभग निष्क्रिय हो गई और प्रशिक्षित गुरिल्ला रोजगार तथा भविष्य की सुरक्षा को लेकर असमंजस में पड़ गए।
संघर्ष की दो दशक लंबी कहानी
एसएसबी प्रशिक्षित गुरिल्ला पिछले लगभग 20 वर्षों से अपनी मांगों को लेकर संघर्षरत हैं। इस दौरान उन्होंने देहरादून से लेकर दिल्ली तक कई बार प्रदर्शन किए। विधानसभा और संसद के सामने भी अपनी आवाज उठाई। कई बार मुख्यमंत्री, मंत्रियों और अधिकारियों से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपे गए।
प्रदेश में विभिन्न राजनीतिक दलों की सरकारें आईं और गईं, लेकिन गुरिल्लाओं का कहना है कि उनकी समस्याओं का समाधान केवल आश्वासनों तक सीमित रहा। चुनावी घोषणाओं और बैठकों में कई बार सकारात्मक संकेत मिले, मगर धरातल पर कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया।
क्या हैं गुरिल्लाओं की प्रमुख मांगें
एसएसबी प्रशिक्षित गुरिल्ला संगठन लंबे समय से कई प्रमुख मांगों को लेकर आंदोलन कर रहा है। इनमें प्रमुख रूप से—
प्रशिक्षित गुरिल्लाओं को सरकारी सेवाओं में समायोजित किया जाए।
आयु सीमा में विशेष छूट प्रदान की जाए।
रोजगार के अवसरों में प्राथमिकता दी जाए।
वृद्ध हो चुके गुरिल्लाओं के लिए विशेष पेंशन या आर्थिक सहायता योजना लागू की जाए।
सीमांत क्षेत्रों में सुरक्षा एवं आपदा प्रबंधन से जुड़े कार्यों में उनकी सेवाओं का उपयोग किया जाए।
प्रशिक्षण अवधि और योगदान को मान्यता देते हुए सम्मानजनक पैकेज दिया जाए।
गुरिल्लाओं के आश्रितों के लिए विशेष रोजगार और कल्याणकारी योजनाएं बनाई जाएं।
संगठन का कहना है कि अब बड़ी संख्या में प्रशिक्षित गुरिल्ला 50 से 70 वर्ष की आयु पार कर चुके हैं। ऐसे में रोजगार की मांग के साथ-साथ उनके सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो गए हैं।
सरकारों से मिले आश्वासन, लेकिन समाधान अधूरा
वर्षों से आंदोलन कर रहे गुरिल्लाओं को विभिन्न सरकारों द्वारा समय-समय पर आश्वासन दिए जाते रहे हैं। कई समितियां बनीं, रिपोर्टें तैयार हुईं और वार्ताएं भी हुईं, लेकिन कोई ऐसा निर्णय नहीं हो सका जिससे गुरिल्लाओं को स्थायी राहत मिलती।
गुरिल्लाओं का आरोप है कि सीमांत क्षेत्रों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए जिन युवाओं ने अपना समय और ऊर्जा दी, उन्हें बाद में भुला दिया गया। आज अनेक प्रशिक्षित गुरिल्ला आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे हैं और अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं।
मानवीय दृष्टिकोण से भी जरूरी है समाधान
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल रोजगार का मुद्दा नहीं है बल्कि उन लोगों के सम्मान और विश्वास का भी प्रश्न है जिन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा की भावना से प्रशिक्षण प्राप्त किया था। वर्षों से संघर्ष कर रहे गुरिल्लाओं की उम्र बढ़ती जा रही है और अनेक साथी इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं।
ऐसे में सरकार के सामने यह चुनौती है कि वह इस मामले का मानवीय और व्यावहारिक समाधान तलाशे। यदि पूर्ण रोजगार संभव नहीं है तो पुनर्वास, पेंशन, आर्थिक सहायता या विशेष पैकेज जैसे विकल्पों पर गंभीरता से विचार किया जा सकता है।
29 जून से शुरू होगा नया आंदोलन
संगठन ने स्पष्ट किया है कि 29 और 30 जून से अनिश्चितकालीन धरना-प्रदर्शन शुरू किया जाएगा। प्रदेश भर के गुरिल्ला इस आंदोलन में भाग लेंगे। संगठन का कहना है कि अब केवल आश्वासनों से काम नहीं चलेगा बल्कि लिखित और समयबद्ध निर्णय चाहिए।
गुरिल्लाओं ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर गंभीरता नहीं दिखाई तो आंदोलन को राज्यव्यापी और राष्ट्रीय स्तर तक विस्तारित किया जाएगा। इसके लिए शासन और प्रशासन स्वयं जिम्मेदार होगा।
सरकार के सामने बड़ा प्रश्न
उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद से एसएसबी प्रशिक्षित गुरिल्लाओं का मुद्दा लगातार राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का हिस्सा रहा है। आज भी हजारों परिवार इस समस्या के समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। राज्य सरकार के सामने यह अवसर है कि वह वर्षों से लंबित इस मामले पर संवेदनशीलता और गंभीरता के साथ निर्णय ले।
दो दशक से अधिक समय से चल रहा यह संघर्ष केवल कुछ लोगों की मांग नहीं बल्कि उन हजारों परिवारों की उम्मीदों से जुड़ा है जिन्होंने देशहित में प्रशिक्षण लिया और बदले में सम्मानजनक भविष्य की अपेक्षा की थी। अब देखना यह होगा कि सरकार आगामी आंदोलन से पहले कोई सकारात्मक पहल करती है या फिर एक बार फिर गुरिल्लाओं को सड़कों पर उतरकर अपनी आवाज बुलंद करनी पड़ेगी।
