देहरादून। उत्तराखंड के राजकीय मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश प्रक्रिया को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग के सचिव एवं महानिदेशक को भेजे गए एक विस्तृत ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि राज्य के कुछ सरकारी मेडिकल कॉलेजों में बाहरी राज्यों के अभ्यर्थियों ने कथित रूप से फर्जी स्थायी निवास (डोमिसाइल) और जाति प्रमाण पत्रों के आधार पर प्रवेश प्राप्त किया है। ज्ञापन में पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच विशेष जांच दल (SIT) अथवा विजिलेंस से कराने की मांग की गई है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
ज्ञापन में कहा गया है कि उत्तराखंड के राजकीय मेडिकल कॉलेजों—जैसे राजकीय मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी, दून मेडिकल कॉलेज देहरादून और वीर चंद्र सिंह गढ़वाली मेडिकल कॉलेज श्रीनगर सहित अन्य संस्थानों—में राज्य के मूल निवासियों के लिए आरक्षित 85 प्रतिशत सीटों का उद्देश्य स्थानीय प्रतिभाओं को चिकित्सा शिक्षा में अवसर प्रदान करना है। आरोप है कि कुछ बाहरी राज्यों के परिवारों ने नियमों का उल्लंघन करते हुए गलत तथ्यों के आधार पर अपने बच्चों के उत्तराखंड के स्थायी निवास प्रमाण पत्र बनवा लिए और उसी के आधार पर प्रवेश प्राप्त किया।
ज्ञापन में यह भी आरोप लगाया गया है कि केवल स्थायी निवास प्रमाण पत्र ही नहीं, बल्कि कुछ मामलों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के जाति प्रमाण पत्र भी कथित रूप से गलत तरीके से बनवाए गए। इन प्रमाण पत्रों का उपयोग कर आरक्षित वर्ग की सीटों पर भी प्रवेश लेने का आरोप लगाया गया है।
ज्ञापन के अनुसार यदि इन आरोपों में सत्यता पाई जाती है तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उत्तराखंड के उन मेधावी विद्यार्थियों को हुआ है, जिन्होंने नियमों के अनुरूप परीक्षा उत्तीर्ण करने के बावजूद सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश का अवसर खो दिया। स्थानीय छात्रों के भविष्य पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और राज्य की आरक्षण व्यवस्था की मूल भावना भी प्रभावित हुई है।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यह केवल प्रवेश प्रक्रिया का मामला नहीं है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था और प्रमाण पत्र जारी करने की पूरी प्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। यदि किसी अभ्यर्थी को गलत दस्तावेजों के आधार पर स्थायी निवास या जाति प्रमाण पत्र जारी किए गए हैं, तो उन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच आवश्यक है, जिन्होंने ऐसे दस्तावेज जारी किए।
ज्ञापन में मांग की गई है कि राज्य के सभी राजकीय मेडिकल कॉलेजों में वर्तमान में अध्ययनरत विद्यार्थियों के साथ-साथ पिछले कुछ वर्षों में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी कर चुके संदिग्ध अभ्यर्थियों के स्थायी निवास और जाति प्रमाण पत्रों का व्यापक सत्यापन कराया जाए। यह जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी, जैसे SIT या विजिलेंस, से कराई जाए ताकि पूरे मामले की निष्पक्ष पड़ताल हो सके।
शिकायतकर्ताओं ने यह भी मांग की है कि जांच के दौरान संबंधित अभिलेख, प्रवेश प्रक्रिया के दस्तावेज, राजस्व विभाग के रिकॉर्ड तथा प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया की भी गहन जांच की जाए। यदि किसी भी स्तर पर फर्जीवाड़ा, धोखाधड़ी या सरकारी नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों, अभ्यर्थियों और उनके अभिभावकों के विरुद्ध कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई की जाए।
ज्ञापन में दोषी पाए जाने वाले विद्यार्थियों के प्रवेश निरस्त करने तथा उनके विरुद्ध धोखाधड़ी और जालसाजी की धाराओं में मुकदमा दर्ज करने की भी मांग की गई है। साथ ही भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए स्थायी निवास और जाति प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी तथा तकनीकी रूप से सुरक्षित बनाने का सुझाव दिया गया है।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि चिकित्सा शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में यदि किसी भी प्रकार का फर्जीवाड़ा होता है तो इसका असर केवल प्रवेश प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह योग्य छात्रों के अधिकारों, शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता और जनता के विश्वास पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसलिए इस मामले में समयबद्ध और निष्पक्ष जांच अत्यंत आवश्यक है।
ज्ञापन में राज्य सरकार से आग्रह किया गया है कि उत्तराखंड के युवाओं के हितों की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए पूरे प्रकरण की पारदर्शी जांच कराई जाए। साथ ही भविष्य में मेडिकल कॉलेजों सहित अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश के समय स्थायी निवास और जाति प्रमाण पत्रों के सत्यापन के लिए मजबूत डिजिटल प्रणाली विकसित की जाए, जिससे किसी भी प्रकार के फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्रवेश की संभावना समाप्त हो सके।
फिलहाल इस संबंध में शासन या चिकित्सा शिक्षा विभाग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यदि शिकायत के आधार पर जांच के आदेश जारी होते हैं तो इससे पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। आरोपों की पुष्टि या खंडन जांच के निष्कर्षों के बाद ही संभव होगी। ऐसे में सभी पक्षों की जिम्मेदारी है कि जांच प्रक्रिया में सहयोग करें और तथ्यों के आधार पर ही निष्कर्ष निकाले जाएं।
यदि सरकार इस प्रकरण में उच्च स्तरीय जांच कराती है तो यह न केवल मेडिकल शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा, बल्कि उत्तराखंड के वास्तविक पात्र विद्यार्थियों के अधिकारों की रक्षा और सरकारी व्यवस्था में जनता का विश्वास मजबूत करने में भी सहायक सिद्ध हो सकता है।
