चमोली में एक दर्जन से अधिक सड़कें बंद, सात जिलों में बारिश का अलर्ट; चंपावत में गर्भस्थ शिशु की मौत के बाद जिला अस्पताल की व्यवस्था पर सवाल, रुद्रपुर में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी से बढ़ी चिंता
देहरादून/चमोली/चंपावत/रुद्रपुर। उत्तराखंड में मौसम ने करवट बदलनी शुरू कर दी है। ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में सीजन की पहली बर्फबारी ने दस्तक दे दी है, जबकि निचले इलाकों में लगातार बारिश के कारण तापमान में गिरावट दर्ज की जा रही है। चमोली जिले में जोशीमठ नगर के सामने की ऊंची चोटियों पर बर्फबारी का सिलसिला शुरू हो गया है। हेमकुंड साहिब और फूलों की घाटी के आसपास की चोटियां भी बर्फ की सफेद चादर से ढकने लगी हैं। दूसरी ओर लगातार बारिश ने चमोली समेत प्रदेश के कई हिस्सों में जनजीवन प्रभावित कर दिया है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
चमोली जिले में बारिश के कारण एक दर्जन से अधिक सड़कें बंद बताई जा रही हैं। बंद मार्गों को खोलने और यातायात व्यवस्था बहाल करने का काम जारी है। पहाड़ी इलाकों में बारिश और भूस्खलन की आशंका के बीच यात्रियों को सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। मौसम विभाग ने देहरादून, टिहरी, पौड़ी, नैनीताल, पिथौरागढ़, बागेश्वर और ऊधमसिंह नगर के लिए बारिश का अलर्ट जारी किया है। अगले 24 घंटे के दौरान कई स्थानों पर तेज बारिश का येलो अलर्ट भी बताया गया है।
राजधानी देहरादून और आसपास के इलाकों में सुबह से ही घने बादल छाए हुए हैं। कुमाऊं मंडल के नैनीताल और तराई क्षेत्र ऊधमसिंह नगर में भी गरज-चमक के साथ तेज बारिश की संभावना जताई गई है। नैनीताल के पहाड़ी और घुमावदार मार्गों पर कम दृश्यता तथा पत्थर गिरने की आशंका को देखते हुए वाहन चालकों और पर्यटकों को विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत है। हल्द्वानी, रुद्रपुर और काशीपुर जैसे मैदानी शहरों में भी तेज हवाओं के साथ बारिश के दौर आने की संभावना है। नदी-नालों और रपटों के आसपास रहने वाले लोगों को सतर्क रहने तथा उफनते पानी को पार करने से बचने की सलाह दी गई है।
मौसम की यह तस्वीर उत्तराखंड की भौगोलिक चुनौती को सामने रखती है। पहाड़ में सड़क बंद होती है तो उसका सीधा असर अस्पताल, स्कूल, बाजार और रोजमर्रा की जरूरतों तक पहुंच पर पड़ता है। गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और गंभीर मरीजों के लिए ऐसी परिस्थितियां और अधिक संवेदनशील हो जाती हैं। यही वजह है कि मौसम के साथ-साथ प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
चंपावत में गर्भस्थ शिशु की मौत के बाद उठे सवाल
आदर्श चंपावत की परिकल्पना और स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के दावों के बीच जिला अस्पताल की व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। 22 वर्षीय गर्भवती प्रियंका सामंत के गर्भस्थ शिशु की मौत के बाद उन्हें हायर सेंटर रेफर किया गया। स्वजनों का आरोप है कि जिला अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ उपलब्ध होने की जानकारी मिलने के कारण उपचार को लेकर उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ा।
स्वजनों के अनुसार प्रियंका 14 अगस्त को लोहाघाट उप जिला अस्पताल में अल्ट्रासाउंड कराने पहुंची थीं। वहां जांच के बाद उन्हें गर्भस्थ शिशु के स्वस्थ होने की जानकारी दी गई। 18 अगस्त को पेट में तेज दर्द हुआ। सड़क बंद होने के कारण पति जीवन सिंह करीब तीन किलोमीटर तक पैदल अपनी पत्नी को लेकर पहुंचे। इसके बाद वाहन से लोहाघाट उप जिला अस्पताल ले जाया गया, जहां से जिला अस्पताल जाने की सलाह दी गई।
जिला अस्पताल पहुंचने से पहले स्वजनों ने चंपावत के एक निजी अस्पताल में अल्ट्रासाउंड कराया। जीवन सिंह के अनुसार वहां चिकित्सकों ने बताया कि गर्भस्थ शिशु की लगभग दो सप्ताह पहले ही मौत हो चुकी थी। इसके बाद जिला अस्पताल पहुंचने पर उन्हें स्त्री रोग विशेषज्ञ की उपलब्धता को लेकर समस्या बताई गई और महिला को हायर सेंटर रेफर करने की बात कही गई।
परिवार ने उपचार में देरी का आरोप लगाते हुए मामले की जांच और जिम्मेदारी तय करने की मांग उठाई है। हालांकि पूरे मामले में संबंधित स्वास्थ्य अधिकारियों की जांच और दोनों अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट के चिकित्सकीय परीक्षण के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। जिला अस्पताल के पीएमएस ने दोनों रिपोर्टों के बीच पर्याप्त अंतर होने की बात कही है। ऐसे में यह मामला केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रखने के बजाय निष्पक्ष चिकित्सकीय जांच की मांग करता है।
रुद्रपुर में भी विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी चिंता का विषय
चंपावत की घटना ने प्रदेश के मैदानी जिलों की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी बहस तेज कर दी है। रुद्रपुर जिला अस्पताल को ऊधमसिंह नगर का प्रमुख सरकारी स्वास्थ्य केंद्र माना जाता है। यहां बड़ी आबादी उपचार के लिए पहुंचती है। विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी और मरीजों के हायर सेंटर या निजी अस्पतालों की ओर जाने की मजबूरी लंबे समय से चिंता का विषय बनी हुई है।
हाल में रुद्रपुर जिला चिकित्सालय में एक महिला की मृत्यु का मामला भी सामने आया था, जिसके बाद अस्पताल की व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठे। ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच जरूरी है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि चिकित्सा सुविधा की कमी, उपचार में देरी या किसी अन्य कारण की भूमिका रही।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल गर्भवती महिलाओं की सुरक्षा को लेकर है। ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में आशा कार्यकर्ता स्वास्थ्य व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। गर्भवती महिलाओं को समय पर जांच, संस्थागत प्रसव और आवश्यकता पड़ने पर उच्च स्तरीय चिकित्सा केंद्र तक पहुंचाने में उनकी भूमिका रहती है। कई परिस्थितियों में आशा कार्यकर्ताओं के सामने सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में उपलब्ध संसाधनों और विशेषज्ञ चिकित्सकों की वास्तविक स्थिति भी चुनौती बन जाती है।
ग्रामीण परिवारों में अक्सर आशा कार्यकर्ता पर निजी अस्पताल ले जाने के लिए दबाव बनाने अथवा निजी संस्थानों की ओर भेजने के आरोप लगाए जाते हैं। इस आरोप के पीछे सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में उपलब्ध सुविधाओं की वास्तविक स्थिति को भी समझना जरूरी है। यदि किसी सरकारी अस्पताल में आवश्यक विशेषज्ञ, जांच सुविधा या आपातकालीन उपचार उपलब्ध है, तो मरीज को निजी अस्पताल की ओर जाने की जरूरत स्वाभाविक रूप से कम होगी। जहां ऐसी सुविधा सीमित है, वहां आशा कार्यकर्ता के सामने मरीज की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की स्थिति पैदा होती है।
2027 के दावों के बीच धरातल का सवाल
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। सरकार और राजनीतिक दल विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बेहतर बुनियादी सुविधाओं के बड़े दावे कर रहे हैं। ऐसे समय में स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी स्थिति सबसे महत्वपूर्ण कसौटी बन जाती है।
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद स्वास्थ्य क्षेत्र को लेकर लगातार योजनाएं बनीं। मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल, उप जिला अस्पताल, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का नेटवर्क विकसित करने की कोशिश हुई। इसके बावजूद विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी, दूरदराज के क्षेत्रों में डॉक्टरों की उपलब्धता, जांच सुविधाओं का अभाव, सड़क संपर्क और मरीजों को रेफर करने की समस्या आज भी बड़ी चुनौती के रूप में सामने आती है।
पहाड़ में सड़क बंद होने का मतलब कई बार मरीज के लिए घंटों की देरी होता है। गर्भवती महिला के मामले में यह देरी गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है। इसलिए स्वास्थ्य व्यवस्था को केवल अस्पताल भवन, उपकरण या बजट के आंकड़ों से मापना पर्याप्त नहीं है। सवाल यह है कि जब किसी महिला को प्रसव संबंधी आपात स्थिति आती है, तब उसके निकटतम सरकारी अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक, जांच सुविधा, दवाएं, ऑपरेशन की व्यवस्था और आवश्यकता पड़ने पर तत्काल रेफरल परिवहन उपलब्ध है या नहीं।
चंपावत की घटना की निष्पक्ष जांच और रुद्रपुर समेत अन्य जिला अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता की समीक्षा इसी व्यापक सवाल से जुड़ी है। सरकार को यह देखना होगा कि प्रदेश की स्वास्थ्य नीति का लाभ कागजों से निकलकर अस्पताल की ओपीडी, प्रसव कक्ष और आपातकालीन वार्ड तक कितनी प्रभावी तरह पहुंच रहा है।
उत्तराखंड के पहाड़ों पर पहली बर्फबारी जहां पर्यटन और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए उम्मीद जगाती है, वहीं बारिश और सड़क बंद होने की घटनाएं स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोर कड़ियों को सामने लाती हैं। मौसम की चुनौती प्राकृतिक है, पर स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता प्रशासनिक जिम्मेदारी है। 2027 की राजनीतिक कसौटी पर बड़े दावों के साथ यह भी देखा जाएगा कि पहाड़ की गर्भवती महिला को सुरक्षित प्रसव के लिए कितनी दूर जाना पड़ता है, गंभीर मरीज को विशेषज्ञ चिकित्सक कितनी जल्दी मिलता है और सरकारी अस्पताल आम परिवार के लिए भरोसे का केंद्र कितना बन पाया है।
उत्तराखंड के विकास का वास्तविक पैमाना वही होगा, जहां बर्फ से ढके पहाड़ों से लेकर तराई के बड़े शहरों तक हर नागरिक को समय पर गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधा मिल सके।
