चीनी 40% महंगी, सरकार ने 10 लाख टन रॉ शुगर आयात को दी मंजूरी; थोक खरीदारों पर स्टॉक लिमिट

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उत्तराखंड। देश में त्योहारी सीजन से पहले चीनी की कीमतों में तेज उछाल ने आम रसोई का बजट बिगाड़ दिया है। पिछले तीन महीनों में चीनी के दाम करीब 40 फीसदी बढ़कर 48 रुपये से 67 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। इसी अवधि में गुड़ 24 फीसदी, चावल कनकी 16 फीसदी और मक्के का आटा 11 फीसदी तक महंगा हुआ है। सरकार ने बढ़ती कीमतों और उपलब्धता को देखते हुए 31 अक्टूबर 2026 तक 10 लाख मीट्रिक टन रॉ शुगर के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। यह फैसला टैरिफ रेट कोटा (TRQ) के तहत लिया गया है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


सरकार ने चीनी की जमाखोरी पर अंकुश लगाने के लिए स्टॉक सीमा भी लागू की है। 1 अगस्त से 30 नवंबर तक डीलरों के लिए अधिकतम 400 टन स्टॉक सीमा तय की गई है। वहीं 1 सितंबर से हर महीने 10 टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करने वाले थोक उपभोक्ता अधिकतम 15 दिन की खपत के बराबर स्टॉक रख सकेंगे। इस दायरे में बड़े खाद्य निर्माता, मिठाई कारोबारी, पेय पदार्थ निर्माता और अन्य संस्थागत खरीदार शामिल हैं।
तीन महीने में रोजमर्रा की चीजों के दाम
उत्पाद
3 माह पहले
मौजूदा दाम
बढ़ोतरी
चीनी
₹48
₹67
39.58%
गुड़
₹50
₹65
24.00%
चावल कनकी
₹25
₹29
16.00%
मक्के का आटा
₹36
₹40
11.11%
इडली रवा/राइस फ्लोर
₹38
₹42
10.53%
पशु आहार
₹29
₹32
10.34%
पॉल्ट्री फीड
₹23
₹25
8.70%
सरकार ने बताई कीमत बढ़ने की दूसरी वजह
केंद्र सरकार ने चीनी की महंगाई को सीधे एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने के डायवर्जन से जोड़ने को खारिज किया है। सरकार के अनुसार एथेनॉल के लिए चीनी का डायवर्जन 2022-23 में करीब 12 फीसदी से घटकर 2025-26 में करीब 9 फीसदी रह गया है। साथ ही देश में एथेनॉल उत्पादन का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्के, से आता है।
सरकार के मुताबिक मौजूदा तेजी के पीछे अनुमान से कम चीनी उत्पादन, त्योहारी मांग, गन्ने की फसल को मौसम से नुकसान, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तंग आपूर्ति तथा कुछ हिस्सों में जमाखोरी और सट्टेबाजी जैसे कारण हैं। 2025-26 सीजन में चीनी उत्पादन का अनुमान करीब 306 लाख टन रह गया है, जबकि गन्ना उत्पादक राज्यों का शुरुआती अनुमान करीब 343 लाख टन था।
2026-27 सीजन में उत्पादन बढ़ने का अनुमान
दिलचस्प स्थिति यह है कि 2026-27 सीजन के लिए उत्पादन को लेकर तस्वीर कुछ बेहतर दिखाई दे रही है। उद्योग अनुमानों के अनुसार आगामी सीजन में चीनी उत्पादन करीब 3.36 करोड़ टन रह सकता है, जो मौजूदा सीजन के अनुमान से लगभग 12 फीसदी अधिक है। हालांकि नया सीजन शुरू होने से पहले उपलब्ध शुरुआती स्टॉक कई वर्षों के मुकाबले काफी कम है।
सरकार ने राज्यों और चीनी मिलों को पेराई सीजन जल्दी शुरू करने की सलाह दी है। सरकार के अनुसार 15 अक्टूबर से पेराई शुरू होने पर अक्टूबर में सामान्य 3-4 लाख टन के मुकाबले 10 लाख टन से ज्यादा चीनी उत्पादन संभव हो सकता है, जिससे त्योहारी मांग के दौरान आपूर्ति बेहतर होगी।
एथेनॉल और चीनी के बीच बढ़ता संतुलन
चीनी उद्योग में पिछले वर्षों में गन्ने और उसके उत्पादों को एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ने की नीति का विस्तार हुआ है। इससे मिलों को अतिरिक्त आय का रास्ता मिला और सरकार के एथेनॉल मिश्रण लक्ष्य को भी गति मिली। सरकार के अनुसार 2025-26 में एथेनॉल के लिए चीनी का डायवर्जन पिछले वर्षों की तुलना में घटा है।
वहीं उद्योग के कुछ कारोबारी संगठनों का तर्क है कि खाद्य चीनी और एथेनॉल के बीच उपलब्ध गन्ने का संतुलन बनाए रखना जरूरी है। उनका कहना है कि जब घरेलू उत्पादन और शुरुआती स्टॉक अनुमान से कम हों तो एथेनॉल के लिए गन्ने का उपयोग बाजार में चीनी की उपलब्धता पर दबाव डाल सकता है।
निर्यात में भारी गिरावट
भारत कभी दुनिया के प्रमुख चीनी निर्यातकों में शामिल रहा है। उपलब्ध वाणिज्यिक आंकड़ों के अनुसार 2022-23 में करीब 133.79 लाख टन चीनी का निर्यात हुआ था। यह मात्रा 2023-24 में घटकर 51.35 लाख टन और 2024-25 में 38.43 लाख टन रह गई। यानी दो साल में निर्यात में भारी कमी आई।
भारत ने घरेलू उपलब्धता बनाए रखने के लिए चीनी निर्यात पर नियंत्रण लगाया। 2024-25 सीजन में सरकार ने सीमित मात्रा में निर्यात की अनुमति दी थी। इसके साथ ही आयात में भी बदलाव देखने को मिला। DGCI&S आधारित आंकड़ों के मुताबिक चीनी आयात 2022-23 के करीब 5.77 लाख टन से बढ़कर 2023-24 में 33.10 लाख टन और 2024-25 में 27.08 लाख टन रहा।
दस साल बाद आयात की जरूरत
10 लाख टन रॉ शुगर का शुल्क-मुक्त आयात इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि भारत लंबे समय से घरेलू उत्पादन के दम पर अपनी चीनी जरूरत पूरी करता रहा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार घरेलू बाजार के लिए रॉ शुगर का इस तरह आयात करीब एक दशक बाद हो रहा है। सामान्य आयात शुल्क करीब 100 फीसदी है, जबकि TRQ के तहत तय 10 लाख टन मात्रा पर 31 अक्टूबर तक शुल्क-मुक्त आयात की सुविधा दी गई है।
सरकार का मानना है कि आयात, स्टॉक लिमिट और पेराई सीजन को जल्दी शुरू करने जैसे कदमों से त्योहारी अवधि में बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध रहेगी। दूसरी ओर, बाजार विशेषज्ञों की नजर इस बात पर है कि आयातित चीनी घरेलू बाजार में कितनी जल्दी पहुंचती है और सितंबर-अक्टूबर में कीमतों पर इसका कितना असर पड़ता है।
सिर्फ चीनी की महंगाई का सवाल नहीं
चीनी की कीमतों का असर केवल चाय और मिठाई तक सीमित रहने वाला विषय नहीं है। गुड़, चावल के कुछ उत्पाद, मक्के का आटा, राइस फ्लोर और पशु-पोल्ट्री फीड की कीमतों में भी वृद्धि दर्ज हुई है। पशु आहार और पोल्ट्री फीड महंगे होने से आगे चलकर दूध और अंडे जैसे उत्पादों की लागत पर भी दबाव बढ़ सकता है।
सरकार के अनुसार देश में सामान्य वार्षिक चीनी उत्पादन करीब 320-340 लाख टन और घरेलू खपत करीब 280-290 लाख टन रहती है। मौजूदा संकट इसलिए मुख्यतः उत्पादन, शुरुआती स्टॉक, त्योहारी मांग और बाजार प्रबंधन के बीच संतुलन का मामला बन गया है।
इस बीच सरकार ने साफ किया है कि देश में घरेलू मांग पूरी करने लायक स्टॉक उपलब्ध है और नई पेराई शुरू होने तक आपूर्ति बनाए रखने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। 20 अगस्त को चीनी का खुदरा औसत मूल्य करीब ₹55.70 प्रति किलो बताया गया, जो 20 जुलाई के ₹48.18 से काफी अधिक है।
अब असली परीक्षा सितंबर से नवंबर के बीच होगी। त्योहारी मांग, आयातित रॉ शुगर की उपलब्धता, मिलों की शुरुआती पेराई और सरकार की स्टॉक निगरानी यह तय करेगी कि चीनी की मौजूदा तेजी कितनी जल्दी थमती है। साथ ही 2026-27 में उत्पादन बढ़ने का अनुमान राहत देता है, पर शुरुआती स्टॉक का कम स्तर खाद्य सुरक्षा और एथेनॉल नीति के बीच संतुलन की बहस को फिर केंद्र में ले आया है।


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