रुद्रपुर/देहरादून। उत्तराखंड में निवेश लाने के नाम पर आयोजित बड़े-बड़े कार्यक्रमों और सरकारी जमीनों के आवंटन को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। विपक्ष ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार की निवेश नीति पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि निवेश सम्मेलन विकास और रोजगार का माध्यम बनने के बजाय बड़े आयोजनों, प्रचार और चुनिंदा संस्थानों को सरकारी संसाधन उपलब्ध कराने तक सीमित होते जा रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल देहरादून के छरबा क्षेत्र में सिडकुल की जमीन के आवंटन को लेकर उठ रहा है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार छरबा क्षेत्र में सिडकुल ने करीब 60 एकड़ भूमि UPES को आवंटित की थी। रिपोर्टों में बताया गया कि यह आवंटन निवेश नीति के तहत टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से हुआ। इससे पहले इसी जमीन पर फिजिक्स वाला संस्थान ने भी आवेदन किया था, लेकिन एकल बोली होने के कारण वह टेंडर निरस्त हो गया था।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
यहीं से सवाल पैदा होता है कि यदि सरकारी जमीन निवेश और संस्थान स्थापित करने के लिए उपलब्ध कराई जा रही है तो पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है? जमीन का वास्तविक बाजार मूल्य क्या था? आवंटन किस दर पर हुआ? टेंडर की शर्तें क्या थीं और राज्य को इससे कितना राजस्व प्राप्त हुआ? इन सवालों का सार्वजनिक जवाब सामने आना चाहिए।
कांग्रेस की ओर से छरबा प्रकरण में इससे भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोप है कि बड़ी मात्रा में भूमि को अपेक्षाकृत कम दर पर उपलब्ध कराया गया और बाद में सर्किल रेट में बदलाव से जमीन के मूल्य में बड़ा अंतर पैदा हो गया। हालांकि इन आरोपों में बताए गए 325 बीघा, ₹122.36 करोड़ और ₹75.20 लाख प्रति बीघा जैसे आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि अभी उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों से नहीं हो सकी है। इसलिए इन आंकड़ों की पुष्टि के लिए सिडकुल, उद्योग विभाग, राजस्व विभाग और स्टाम्प एवं पंजीयन विभाग के मूल दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
उत्तराखंड के स्टाम्प एवं पंजीयन विभाग की वेबसाइट पर जिलावार सर्किल रेट उपलब्ध हैं। ऐसे में सरकार के लिए यह स्पष्ट करना मुश्किल नहीं होना चाहिए कि संबंधित भूमि का आवंटन किस तारीख को हुआ, उस तारीख को लागू सर्किल रेट क्या था और बाद में दरों में कब तथा कितनी वृद्धि हुई।
रुद्रपुर का निवेश उत्सव भी सवालों के घेरे में
रुद्रपुर में 19 जुलाई 2025 को आयोजित उत्तराखंड निवेश उत्सव में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि थे। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक कार्यक्रम में ₹1 लाख करोड़ से अधिक निवेश की ग्राउंडिंग का दावा किया गया और ₹1,271 करोड़ की विभिन्न सरकारी विकास योजनाओं का उद्घाटन तथा शिलान्यास हुआ।
सरकार ने इस आयोजन को उत्तराखंड में निवेश की बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया। केंद्र सरकार की ओर से जारी जानकारी में कहा गया कि वर्ष 2023 के ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में आए एमओयू में से एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश जमीन पर उतर चुका है और इससे 81 हजार से ज्यादा रोजगार पैदा हुए हैं।
लेकिन अब सवाल यह है कि इन आंकड़ों का उत्तराखंड के आम नागरिक को वास्तविक लाभ कितना मिला?
रुद्रपुर जैसे औद्योगिक शहर में यदि करोड़ों रुपये खर्च कर निवेश सम्मेलन आयोजित किया जाता है तो जनता यह जानना चाहती है कि आयोजन पर कुल कितना खर्च हुआ? टेंट, एयर कंडीशनिंग, मंच, सुरक्षा, भोजन, प्रचार-प्रसार, परिवहन और अन्य व्यवस्थाओं पर कितनी धनराशि खर्च हुई? कार्यक्रम में शामिल कंपनियों और निवेशकों ने वास्तव में कितनी धनराशि लगाई और कितने स्थानीय युवाओं को रोजगार मिला?
यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कार्यक्रम में जिन निवेश परियोजनाओं की घोषणा की गई थी, उनमें से कितनी परियोजनाएं आज जमीन पर हैं और कितनी केवल कागजों पर हैं।
निवेश सम्मेलन या राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन?
यही वह बिंदु है जहां रुद्रपुर के लोगों के बीच चर्चा तेज होती है। अगर किसी निवेश सम्मेलन में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन स्थानीय जनता को उसके परिणाम स्पष्ट दिखाई नहीं देते, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आयोजन का वास्तविक उद्देश्य क्या था?
क्या यह केवल निवेश को बढ़ावा देने का कार्यक्रम था या इसके साथ राजनीतिक संदेश भी जुड़ा हुआ था?
सरकार का तर्क है कि बड़े निवेश सम्मेलन राज्य की ब्रांडिंग और निवेश आकर्षित करने के लिए आवश्यक हैं। विपक्ष का सवाल है कि ब्रांडिंग से ज्यादा महत्वपूर्ण जमीन पर निवेश, स्थानीय रोजगार और राजस्व है।
कांग्रेस ने पहली बार उठाया जमीन के हिसाब का सवाल
छरबा की जमीन को लेकर कांग्रेस की ओर से उठाए गए सवालों ने अब इस पूरे निवेश मॉडल पर बहस खड़ी कर दी है। विपक्ष यदि दस्तावेजों के साथ आरोप सामने रखता है तो सरकार को भी केवल राजनीतिक जवाब देने के बजाय जमीन की फाइल, टेंडर प्रक्रिया, मूल्यांकन रिपोर्ट, आवंटन दर और बाद के सर्किल रेट का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक करना चाहिए।
क्योंकि सरकारी जमीन जनता की संपत्ति है।
यदि जमीन बाजार मूल्य से कम दर पर दी गई है तो उसका कारण क्या था? यदि टेंडर प्रक्रिया हुई तो उसमें कितने आवेदक थे? यदि किसी एक संस्थान को भूमि मिली तो उसके चयन का आधार क्या था? और यदि बाद में सर्किल रेट बढ़ा तो उस बढ़ोतरी का आवंटन पर क्या प्रभाव पड़ा?
इन सवालों का जवाब सामने आने के बाद ही यह तय हो सकेगा कि निवेश नीति वास्तव में उत्तराखंड के हित में है या सरकारी जमीन और संसाधनों के इस्तेमाल का कोई दूसरा मॉडल विकसित हो रहा है।
रुद्रपुर और छरबा के मामले ने अब सरकार के सामने एक सीधा सवाल खड़ा कर दिया है—उत्तराखंड में निवेश चाहिए, लेकिन क्या निवेश के नाम पर सरकारी जमीन और जनता के पैसे के इस्तेमाल का पूरा हिसाब भी जनता को नहीं मिलना चाहिए?
सरकार को चाहिए कि वह छरबा भूमि आवंटन से लेकर रुद्रपुर निवेश उत्सव तक एक-एक रुपये के खर्च और एक-एक एकड़ भूमि के आवंटन का सार्वजनिक हिसाब दे। यही पारदर्शिता निवेश नीति में जनता का भरोसा मजबूत करेगी।
