मंचों पर नशामुक्त उत्तराखंड की शपथ, गली-मोहल्लों में नशे का कारोबार!

मुख्यमंत्री जी, वॉकथॉन से आगे बढ़कर वार्डों और पहाड़ों की हकीकत भी देखिए

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर

उत्तराखंड को नशामुक्त बनाने का संकल्प सुनने में जितना अच्छा लगता है, उसकी असली परीक्षा मंचों, भाषणों और वॉकथॉन में नहीं, बल्कि गलियों, मोहल्लों, गांवों और पहाड़ों की उन दुकानों के आसपास होनी चाहिए, जहां नशे की उपलब्धता को लेकर आम नागरिक सवाल उठाते हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देहरादून में ‘ड्रग फ्री उत्तराखंड वॉकथॉन’ को हरी झंडी दिखाकर युवाओं को नशामुक्ति की शपथ दिलाई। संदेश स्पष्ट था—नशे को ना, जिंदगी को हां। मगर सवाल यह है कि इस नारे की गूंज उन इलाकों तक कब पहुंचेगी, जहां परिवार नशे की समस्या से जूझ रहे हैं?

मुख्यमंत्री ने कहा कि नशे के खिलाफ लड़ाई सरकार, पुलिस और पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है। बात बिल्कुल सही है। लेकिन इस साझा जिम्मेदारी में प्रशासन, आबकारी विभाग, पुलिस, स्थानीय निकाय और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। आखिर जनता केवल शपथ सुनने के लिए नहीं, जमीन पर बदलाव देखने के लिए भी इंतजार करती है।

वॉकथॉन की तस्वीर और मोहल्लों के सवाल

देहरादून के मैदान में युवा दौड़ते हैं, हाथों में नशामुक्ति के संदेश दिखाई देते हैं और मंच से स्वस्थ उत्तराखंड का आह्वान होता है। यह अच्छी पहल है। मगर किसी शहर के वार्ड में यदि नशे की बिक्री की शिकायतें सामने आती हैं, तो वहां रहने वाले परिवारों के लिए अभियान की सफलता का पैमाना क्या होगा? क्या संबंधित विभाग मौके पर जाकर जांच करेंगे? क्या शिकायत मिलने पर कार्रवाई होगी? और क्या कार्रवाई का परिणाम जनता को बताया जाएगा?

सवाल इसलिए जरूरी हैं, क्योंकि नशे की समस्या केवल किसी एक व्यक्ति की आदत तक सीमित नहीं रहती। इसका असर परिवार की आर्थिक स्थिति, बच्चों की पढ़ाई, घरेलू शांति और युवाओं के भविष्य पर भी पड़ सकता है। ऐसे में जागरूकता की दौड़ के साथ अवैध कारोबार पर प्रभावी कार्रवाई की दौड़ भी जरूरी है।

राशन की दुकान या नशे की दुकान? पहाड़ों की चिंता का जवाब कौन देगा?

पहाड़ों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की राशन दुकानों का उद्देश्य गरीब और जरूरतमंद परिवारों तक खाद्यान्न पहुंचाना है। ग्रामीणों को राशन के लिए दूर-दूर तक जाना पड़ता है। ऐसे में यदि किसी क्षेत्र में राशन की दुकान के आसपास शराब या अन्य नशीले पदार्थों की अवैध बिक्री की शिकायत सामने आती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। किसी भी दुकानदार पर बिना प्रमाण आरोप लगाना उचित नहीं, लेकिन शिकायतों को नजरअंदाज करना भी जनता के हित में नहीं है।

उत्तराखंड की पहचान उसकी देवभूमि, संस्कृति, परंपराओं और मेहनतकश लोगों से है। पहाड़ का युवा रोजगार, शिक्षा और बेहतर भविष्य की तलाश में संघर्ष करता है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में नशे की उपलब्धता को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब केवल जागरूकता रैली से नहीं मिल सकता। जरूरत है कि प्रशासन शिकायत वाले क्षेत्रों की पहचान करे, बिक्री के स्रोतों की जांच करे और अवैध गतिविधि प्रमाणित होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई करे।

सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि राशन वितरण की व्यवस्था और शराब की बिक्री से जुड़े नियमों का पालन हो। यदि कहीं सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकान के नाम या परिसर का दुरुपयोग होने की शिकायत है, तो संबंधित विभाग उसकी जांच करें। जनता को अफवाह नहीं, तथ्य और कार्रवाई चाहिए।

शराब की भट्टियां, दुकानें और सरकारी जिम्मेदारी

उत्तराखंड में शराब की वैध दुकानों और आबकारी नीति के तहत संचालित बिक्री व्यवस्था को लेकर भी सार्वजनिक बहस होती रहती है। सरकार को राजस्व मिलता है, लाइसेंसधारियों को कारोबार की अनुमति मिलती है, लेकिन नशे से प्रभावित परिवारों के सामने सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। यहीं से एक बड़ा सवाल उठता है—राजस्व और जनस्वास्थ्य के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?

यदि सरकार नशामुक्त उत्तराखंड का लक्ष्य लेकर चल रही है, तो उसे केवल अवैध नशीले पदार्थों के कारोबार पर कार्रवाई तक सीमित नहीं रहना चाहिए। शराब की दुकानों के नियमों का पालन, निर्धारित समय और स्थान पर बिक्री, नाबालिगों को शराब उपलब्ध न होने देना, अवैध भट्टियों पर कार्रवाई और नशे में वाहन चलाने के खिलाफ सख्ती जैसे विषय भी लगातार प्राथमिकता में रहने चाहिए।

किसी दुकान का वैध लाइसेंस होना अपने आप में अवैध बिक्री का प्रमाण नहीं है। इसी तरह किसी क्षेत्र में शिकायत होना भी दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। इसलिए जांच निष्पक्ष हो, कार्रवाई प्रमाण के आधार पर हो और नियम तोड़ने वालों को संरक्षण न मिले—यही प्रशासन की जिम्मेदारी है।

युवाओं को भाषण नहीं, विकल्प भी चाहिए

मुख्यमंत्री ने खेल, योग, व्यायाम, कौशल विकास, स्टार्टअप और उद्यमिता को बढ़ावा देने की बात कही। यह नशामुक्ति की दिशा में महत्वपूर्ण सोच है। मगर सवाल है कि दूरस्थ गांवों में युवाओं के लिए खेल मैदान कितने उपलब्ध हैं? कितने गांवों में नियमित खेल प्रशिक्षक हैं? कितने युवाओं को कौशल प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर आसानी से मिलते हैं? कितने परिवार नशे की लत से प्रभावित अपने सदस्य के उपचार का खर्च उठा सकते हैं?

युवाओं को केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि वे नशे से दूर रहें। उन्हें खेल, शिक्षा, रोजगार और रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ने के अवसर भी देने होंगे। स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता कार्यक्रम हों, पंचायत स्तर पर नशामुक्ति समितियां सक्रिय हों और जरूरतमंद लोगों के लिए परामर्श तथा उपचार की सुविधाएं सुलभ बनाई जाएं।

नशे की लत से जूझ रहे हर व्यक्ति को अपराधी मानकर दूर धकेलना समस्या का समाधान नहीं है। जहां अवैध कारोबार हो, वहां कानून कार्रवाई करे; जहां कोई व्यक्ति लत से परेशान हो, वहां उपचार, परामर्श और परिवार का सहयोग मिले। इन दोनों पहलुओं के बीच संतुलन ही समाज को आगे ले जा सकता है।

मुख्यमंत्री जी, अब जमीन पर परीक्षा दीजिए

नशामुक्त उत्तराखंड का संकल्प तभी प्रभावी दिखाई देगा, जब हर जिले में नशे से संबंधित शिकायतों पर सुनवाई हो, संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित निगरानी हो, अवैध शराब और नशीले पदार्थों के स्रोतों पर कार्रवाई हो तथा उपचार और पुनर्वास की सुविधाएं मजबूत बनें।

सरकार को चाहिए कि वह जिला प्रशासन और संबंधित विभागों के माध्यम से वार्डों, कस्बों और पहाड़ी गांवों में शिकायतों की समीक्षा करे। जनप्रतिनिधियों, ग्राम प्रधानों, महिला मंगल दलों, युवक मंगल दलों और सामाजिक संगठनों को साथ लेकर स्थानीय स्तर पर निगरानी और जागरूकता बढ़ाई जाए। कार्रवाई के आंकड़े और नशामुक्ति कार्यक्रमों की प्रगति भी सार्वजनिक की जाए, ताकि जनता को पता चले कि अभियान कहां तक पहुंचा।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का संदेश है कि नशामुक्त उत्तराखंड केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि आचार, विचार और व्यवहार का हिस्सा बनना चाहिए। इस संदेश को प्रशासनिक कार्ययोजना में बदलना अब सबसे महत्वपूर्ण कदम है।

कटाक्ष यही है कि मैदान में नशामुक्ति की शपथ लेना आसान है, लेकिन गली-मोहल्लों और पहाड़ों में नशे की उपलब्धता पर उठने वाले सवालों का जवाब देना असली चुनौती है। वॉकथॉन की तस्वीरें तभी सार्थक होंगी, जब आम नागरिक अपने आसपास बदलाव महसूस करेगा, परिवारों को राहत मिलेगी और युवाओं के सामने नशे के बजाय आगे बढ़ने के रास्ते खुलेंगे।

क्योंकि उत्तराखंड को केवल नशामुक्ति के नारे नहीं, नशे से सुरक्षित भविष्य चाहिए।