9 नवंबर 2000 को जिस सपने के साथ उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ था, क्या वह सपना पूरा हुआ? भाजपा और कांग्रेस दोनों को देना होगा जवाब। ‘पायर’ फिल्म पहाड़ के पलायन, भ्रष्टाचार, बुजुर्गों की बेबसी और खोखले विकास की ऐसी तस्वीर सामने रखती है, जिसे देखकर 2027 के मतदाताओं को अपने वोट की ताकत समझनी होगी।
अवतार सिंह बिष्ट | अध्यक्ष, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद
9 नवंबर 2000… यह तारीख उत्तराखंड के इतिहास में केवल एक नए राज्य के गठन की तारीख नहीं है, बल्कि उन लाखों आंदोलनकारियों के संघर्ष, बलिदान, त्याग और सपनों का प्रतीक है, जिन्होंने अलग उत्तराखंड राज्य के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। वर्षों तक सड़कों पर आंदोलन हुए, लाठियां खाईं, जेल गए, गोलियां चलीं, माताओं-बहनों ने संघर्ष किया और अनेक आंदोलनकारियों ने अपनी जान तक गंवा दी। आखिरकार उत्तराखंड अलग राज्य बना। उस समय उम्मीद थी कि अब पहाड़ की समस्याओं का समाधान पहाड़ की परिस्थितियों के अनुरूप होगा। युवाओं को रोजगार मिलेगा, गांवों में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचेंगी, किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलेगा और पहाड़ का बुजुर्ग अपने ही घर में सम्मान और सुरक्षा के साथ जीवन व्यतीत कर सकेगा।
अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर
लेकिन आज राज्य गठन के 26 वर्ष पूरे होने के अवसर पर जब हम उत्तराखंड की वास्तविक तस्वीर देखते हैं तो एक बड़ा सवाल सामने खड़ा होता है—क्या हमने उसी उत्तराखंड का निर्माण किया था, जिसका सपना राज्य आंदोलनकारियों ने देखा था?
विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पायर’ देखने के बाद यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है। रुद्रपुर के चावला थिएटर में इस फिल्म को देखने का अनुभव केवल एक सिनेमाई अनुभव नहीं था, बल्कि ऐसा लगा मानो उत्तराखंड के उजड़ते गांवों, टूटते परिवारों और उपेक्षित बुजुर्गों की वास्तविक जिंदगी हमारे सामने चल रही हो। फिल्म ने वह सच्चाई पर्दे पर उतार दी है, जिसे राजनीतिक मंचों से अक्सर विकास की चमकदार घोषणाओं के पीछे छिपा दिया जाता है।
भाजपा और कांग्रेस दोनों को देना होगा जवाब
उत्तराखंड में अब तक भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों की सरकारें सत्ता में रही हैं। दोनों ने चुनावों में विकास, रोजगार, पलायन रोकने, गांवों को आबाद करने और पहाड़ की तस्वीर बदलने के बड़े-बड़े वादे किए। मुख्यमंत्री बदले, मंत्री बदले, विधायक बदले, सरकारें बदलीं, लेकिन पहाड़ की मूल समस्याएं आज भी वहीं खड़ी हैं।
सवाल किसी एक राजनीतिक दल का नहीं है। सवाल उस पूरी राजनीतिक व्यवस्था का है, जिसने उत्तराखंड राज्य आंदोलन की भावनाओं को कितनी गंभीरता से समझा और उन सपनों को जमीन पर उतारने के लिए कितना काम किया?
आज भी पहाड़ के युवा रोजगार की तलाश में दिल्ली, मुंबई, देहरादून, हल्द्वानी और दूसरे शहरों की ओर जा रहे हैं। गांवों में बुजुर्ग माता-पिता अकेले रह गए हैं। कई गांवों में घरों पर ताले लटक रहे हैं। खेती की जमीन बंजर होती जा रही है। स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या घट रही है और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में लोगों को छोटी-छोटी बीमारियों के उपचार के लिए भी लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।
यदि राज्य गठन के 26 वर्ष बाद भी यही स्थिति है तो सत्ता में रहे और सत्ता में आने की इच्छा रखने वाले सभी राजनीतिक दलों को आत्ममंथन करना चाहिए।
‘पायर’ फिल्म नहीं, उत्तराखंड की हकीकत का आईना है
फिल्म में पदम सिंह और तुलसी नाम के बुजुर्ग दंपती अपने बेटे की वापसी की उम्मीद में जीवन गुजार रहे हैं। बेटा लगभग 28 वर्ष पहले रोजगार की तलाश में गांव छोड़कर चला गया। माता-पिता बूढ़े हो गए, शरीर जवाब देने लगा, लेकिन बेटे के लौटने की उम्मीद समाप्त नहीं हुई।
सबसे ज्यादा झकझोरने वाला दृश्य तब सामने आता है, जब पदम सिंह को अपनी और पत्नी की मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार की चिंता सताने लगती है। गांव में लोग ही नहीं बचे हैं। वह अपनी चिता के लिए स्वयं लकड़ियां जुटाने लगते हैं।
जरा सोचिए, जिस उत्तराखंड के निर्माण के लिए आंदोलनकारियों ने संघर्ष किया, उस राज्य के किसी गांव में एक बुजुर्ग को अपनी मृत्यु के बाद चिता जलाने के लिए लोगों की अनुपस्थिति की चिंता करनी पड़े, इससे बड़ी विडंबना क्या हो सकती है?
यह फिल्म किसी काल्पनिक समस्या को नहीं दिखाती। यह उन हजारों गांवों की वास्तविकता का प्रतिनिधित्व करती है, जहां पलायन ने सामाजिक जीवन की जड़ों को कमजोर कर दिया है।
जब गांव का प्रधान भी गांव छोड़ दे तो विकास किसका हुआ?
उत्तराखंड की व्यवस्था पर एक और गंभीर सवाल खड़ा करना जरूरी है। गांवों के विकास की जिम्मेदारी जिन जनप्रतिनिधियों के कंधों पर होती है, उनमें से कुछ लोग अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद स्वयं गांव छोड़कर शहरों में बस जाते हैं। पांच वर्ष तक ग्राम प्रधान रहने के बाद यदि कोई प्रतिनिधि अपने गांव में स्थायी रूप से रहने की स्थिति या इच्छा नहीं रखता तो यह भी विचार का विषय है कि गांव के विकास के दावों की वास्तविकता क्या है?
यह आरोप हर जनप्रतिनिधि पर नहीं लगाया जा सकता। प्रदेश में ईमानदारी से काम करने वाले अनेक प्रधान, जनप्रतिनिधि और अधिकारी भी हैं, लेकिन जहां भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी और योजनाओं में बंदरबांट की शिकायतें हैं, वहां जवाबदेही तय होनी चाहिए।
आज जरूरत इस बात की है कि गांवों के लिए आने वाला बजट वास्तव में गांवों पर खर्च हो। सड़क निर्माण से लेकर पेयजल, सिंचाई, विद्यालय, पंचायत भवन और स्वास्थ्य केंद्र तक हर योजना की सामाजिक निगरानी हो। केवल कागजों पर विकास दिखाकर जनता को गुमराह करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
यदि गांवों के विकास के लिए करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी ग्रामीणों को बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलतीं तो यह व्यवस्था की विफलता है। उत्तराखंड को ईमानदार नेतृत्व और जवाबदेह प्रशासन की आवश्यकता है, न कि केवल चुनावी नारों की।
शराब की बोतल, मुर्गा और बकरी के लालच में मत बेचिए अपना भविष्य
2027 में उत्तराखंड विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनाव आते ही दिल्ली, मुंबई, देहरादून और दूसरे शहरों में रहने वाले कई राजनीतिक चेहरे पहाड़ के गांवों की ओर रुख करेंगे। चुनाव के समय उन लोगों को भी अपने गांव की याद आने लगेगी, जो वर्षों से गांव की सुध लेने नहीं पहुंचे।
भोले-भाले ग्रामीणों को शराब की बोतल, मुर्गा, बकरी, कुछ पैसों और छोटे-मोटे प्रलोभनों के जरिए अपने पक्ष में मतदान करने के लिए प्रभावित करने की कोशिशें होती रही हैं। चुनाव के दौरान अचानक रिश्तेदारी, गांव और विकास की याद आने लगती है। लेकिन चुनाव समाप्त होते ही वही गांव फिर अपनी समस्याओं के साथ अकेला रह जाता है।
ग्रामीणों को समझना होगा कि एक दिन के प्रलोभन के बदले पांच साल का भविष्य दांव पर लग जाता है। शराब की एक बोतल कुछ घंटों का नशा दे सकती है, लेकिन अच्छी सड़क, अस्पताल, रोजगार और शिक्षा आपके बच्चों को बेहतर भविष्य दे सकते हैं।
जो व्यक्ति चुनाव से पहले आपके दरवाजे पर आकर वोट मांगता है, उससे पूछिए कि पिछले पांच वर्षों में उसने गांव के लिए क्या किया? कितने युवाओं को रोजगार दिलाया? कितने गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाईं? कितने स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति कराई? कितने पलायन कर चुके परिवारों को वापस गांव में बसाने के लिए प्रयास किए?
वोट रिश्तेदारी, जाति, पार्टी, शराब या पैसों के आधार पर नहीं, बल्कि उम्मीदवार के चरित्र, ईमानदारी, काम और उत्तराखंड के प्रति उसकी प्रतिबद्धता के आधार पर दीजिए।
2027 का चुनाव केवल सरकार चुनने का नहीं, पहाड़ का भविष्य तय करने का चुनाव होना चाहिए
उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों ने अलग राज्य इसलिए नहीं मांगा था कि देहरादून में सत्ता के नए केंद्र बन जाएं और पहाड़ के गांव पहले से ज्यादा खाली हो जाएं। आंदोलन का उद्देश्य था कि पहाड़ के अंतिम गांव तक विकास पहुंचे। स्थानीय युवाओं को रोजगार मिले। महिलाओं को पानी के लिए मीलों न चलना पड़े। बुजुर्गों को उपचार के लिए दर-दर भटकना न पड़े। किसानों और सैनिक परिवारों को सम्मान मिले।
आज 2027 के चुनाव से पहले हर राजनीतिक दल को अपना घोषणा पत्र बनाते समय ‘पायर’ जैसी फिल्मों में दिखाई गई वास्तविकता को समझना चाहिए। घोषणा पत्र में केवल बड़ी सड़कें, भवन, पर्यटन कॉरिडोर और निवेश के आंकड़े नहीं होने चाहिए। उसमें गांवों को आबाद करने की ठोस नीति होनी चाहिए।
पलायन प्रभावित गांवों में स्थानीय रोजगार, छोटे उद्योग, फल-सब्जी आधारित प्रसंस्करण इकाइयां, पशुपालन, जड़ी-बूटी उत्पादन और स्थानीय उत्पादों के विपणन की व्यवस्था हो। प्रत्येक गांव या उसके आसपास बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हों। बुजुर्गों की देखभाल के लिए प्रभावी व्यवस्था बने। शिक्षा की गुणवत्ता सुधरे और पहाड़ के युवाओं को अपने ही प्रदेश में सम्मानजनक रोजगार मिले।
राज्य आंदोलनकारियों की मांगें भी आज तक पूरी तरह पूरी नहीं हुई हैं। आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों के क्षैतिज आरक्षण, छूटे हुए आंदोलनकारियों के चिन्हीकरण, सम्मानजनक पेंशन और अन्य सुविधाओं के सवाल आज भी सरकारों के सामने हैं। जिस संघर्ष के कारण उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया, उस संघर्ष के सिपाहियों को सम्मान और न्याय मिलना चाहिए।
आंदोलनकारियों के सपनों का उत्तराखंड कब बनेगा?
आज राज्य स्थापना दिवस पर हमें केवल सांस्कृतिक कार्यक्रमों, सरकारी समारोहों और उपलब्धियों के विज्ञापनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हमें उन गांवों की भी सुध लेनी चाहिए, जहां अब दीपावली और होली पर पहले जैसी रौनक नहीं रही। उन बुजुर्गों के बारे में सोचना चाहिए, जिनके बच्चे वर्षों से घर नहीं लौटे। उन युवाओं की चिंता करनी चाहिए, जिन्हें अपने ही प्रदेश में भविष्य दिखाई नहीं देता।
मैं उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद के अध्यक्ष के रूप में यह मानता हूं कि राज्य निर्माण का संघर्ष केवल अलग राज्य प्राप्त करने तक सीमित नहीं था। हमारा संघर्ष एक ऐसी व्यवस्था बनाने के लिए था जिसमें आम आदमी को सम्मान, न्याय, रोजगार और बुनियादी सुविधाएं मिल सकें।
भाजपा हो या कांग्रेस, अथवा कोई अन्य राजनीतिक दल, सभी को जनता के सामने अपने काम का हिसाब रखना होगा। उत्तराखंड की जनता अब केवल भाषण नहीं, परिणाम देखना चाहती है।
विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पायर’ को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हर उत्तराखंडी को देखना चाहिए। विशेष रूप से उन लोगों को, जो पहाड़ की समस्याओं से दूर शहरों में बैठकर प्रदेश की राजनीति और भविष्य के फैसले करते हैं। इस फिल्म को देखकर शायद उन्हें एहसास हो कि पहाड़ का असली विकास चमकते मंचों और चुनावी नारों में नहीं, बल्कि उन गांवों में दिखाई देना चाहिए जहां आज भी जीवन संघर्ष कर रहा है।
9 नवंबर को राज्य स्थापना दिवस मनाते समय एक संकल्प जरूर लें—हम अपना वोट किसी प्रलोभन में नहीं बेचेंगे, अपने गांव की समस्याओं को नहीं भूलेंगे और 2027 में उसी को चुनेंगे जो उत्तराखंड के भविष्य के लिए ईमानदारी से काम करेगा।
क्योंकि उत्तराखंड केवल एक भौगोलिक प्रदेश नहीं, यह हमारे शहीदों के बलिदान, आंदोलनकारियों के संघर्ष, मातृशक्ति के त्याग और पहाड़ की अस्मिता का नाम है।
जिस दिन पहाड़ का अंतिम गांव आबाद होगा, जिस दिन किसी बुजुर्ग को अपने अंतिम संस्कार की चिंता नहीं सताएगी और जिस दिन पहाड़ का युवा रोजगार के लिए अपना घर छोड़ने को मजबूर नहीं होगा, उसी दिन हम गर्व से कह सकेंगे कि उत्तराखंड राज्य निर्माण की परिकल्पना वास्तव में सार्थक हुई है।
अवतार सिंह बिष्ट
अध्यक्ष, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, उत्तराखंड
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