जस्टिस आलोक मेहरा की सिंगल जज बेंच ने बुधवार को तत्कालीन पुलिस क्षेत्राधिकारी (सीओ) भूपेंद्र धोनी और एसआई रमेश बोहरा के मामले में सुनवाई के दौरान यह निर्णय दिया। यह मामला हल्द्वानी के मुखानी थाना क्षेत्र से जुड़ा है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड।
सेशंस कोर्ट का आदेश किया रद्द
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में तय किए गए सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि सेशंस कोर्ट ने कानूनी नियमों का उल्लंघन किया है। हाईकोर्ट ने इस मामले में सेशंस कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें बिना प्रशासनिक जांच रिपोर्ट के लोक सेवक के खिलाफ केस दर्ज करने के निर्देश दिए गए थे।
हाईकोर्ट ने कहा कि एसी/एसटी ऐक्ट के तहत लोक सेवक के खिलाफ कोई भी आरोप या मामला तब तक दर्ज नहीं किया जा सकता, जब तक कि किसी प्रशासनिक जांच में इसकी संस्तुति (सिफारिश) न की गई हो।
पुलिसवाले निचली अदालत के खिलाफ गए थे हाईकोर्ट
बता दें कि दो साल पहले 2024 में नैनीताल की डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने एक महिला के परिवाद पर सुनवाई करते हुए आरोपित युवक के साथ ही तत्कालीन सीओ एवं एसओ के खिलाफ एसी/एसटी ऐक्ट में मुकदमा दर्ज करने के निर्देश दिए थे। पुलिसवालों ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
क्या है पूरा मामला
डिस्ट्रि्क्ट एंड सेशंस कोर्ट का यह आदेश एक महिला द्वारा सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत दायर अर्जी पर दिया गया था, जिसमें उसने आरोप लगाया था कि उसके साथ जाति-सूचक टिप्पणियां करके दुर्व्यवहार किया गया और मारपीट की गई। पुलिस जांच में आरोप गलत निकले तो मुकदमा दर्ज नहीं हुआ।
सेशंस कोर्ट ने महिला की अर्जी पर मुख्य आरोपी के खिलाफ आईपीसी और एससी/एसटी ऐक्ट के तहत अपराधों के लिए एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिए थे। साथ ही कथित तौर पर कानूनी ड्यूटी निभाने में नाकाम रहे दोनों पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भी एससी/एसटी ऐक्ट की धारा 4 के तहत मुकदमा लिखने का निर्देश दिए था।
निचली अदालत के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचे पुलिस अधिकारियों ने तर्क दिया कि सेशंस जज ने एससी/एसटी ऐक्ट की धारा 4(2) के प्रावधान में दी गई जरूरी शर्त का पालन किए बिना ही मुकदमा दर्ज करने का आदेश दे दिया। उनका कहना था कि धारा 4 के तहत ड्यूटी में लापरवाही के लिए किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने से पहले प्रशासनिक जांच बहुत जरूरी है। याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि इस मामले में ऐसी कोई जांच नहीं की गई थी।
