संपादकीय | विधायी सख्ती या मसौदे की कमजोरी?उत्तराखंड सरकार को एक के बाद एक दो अहम विधायी मोर्चों पर लोकभवन से लौटे विधेयकों ने असहज कर दिया है। एक ओर जबरन धर्मांतरण से जुड़ा उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता एवं विधि विरुद्ध प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक भाषाई खामियों के चलते अटक गया, तो दूसरी ओर समान नागरिक संहिता उत्तराखण्ड (संशोधन) विधेयक, 2025 भी राज्यपाल की आपत्तियों के कारण दोबारा विधानसभा की दहलीज पर खड़ा है। सवाल यह नहीं कि सरकार की मंशा क्या है, बल्कि यह है कि क्या मंशा के अनुरूप विधायी तैयारी भी उतनी ही मजबूत है?
धामी सरकार जिस “सख्ती” का दावा कर रही है, वह अध्यादेश के सहारे लागू करने की हड़बड़ी में बदलती दिख रही है। यदि कोई विधेयक सरकार का “सबसे महत्वपूर्ण” एजेंडा है, तो उसमें भाषाई या तकनीकी त्रुटियों का रह जाना स्वयं सरकार की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाता है। अध्यादेश शासन का विकल्प नहीं, बल्कि अपवाद होता है—पर उत्तराखंड में यह अपवाद धीरे-धीरे आदत बनता जा रहा है।
धर्मांतरण जैसे संवेदनशील विषय पर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान कानूनी मजबूती की मांग करता है, न कि जल्दबाजी की। वहीं, समान नागरिक संहिता के संशोधन में पहले से मौजूद प्रावधानों की पुनरावृत्ति पर आपत्ति यह संकेत देती है कि मसौदा तैयार करते समय गंभीर विधायी मंथन का अभाव रहा।
राज्यपाल द्वारा लौटाए गए विधेयक सरकार के लिए चेतावनी हैं—कि बहुमत के भरोसे कानून बनाना और संविधानिक कसौटी पर खरा उतरने वाला कानून बनाना, दोनों अलग बातें हैं। धामी सरकार को आत्ममंथन करना होगा कि कहीं वह “कड़े कानून” की राजनीतिक छवि गढ़ने में विधायी गुणवत्ता की बलि तो नहीं चढ़ा रही?
उन्होंने तकनीकी खामियों का हवाला दिया है. एक अधिकारी ने कहा, ग्रामर और तकनीकी खामियों के अलावा राज्यपाल ने नए कानूनों में कुछ अपराधों के लिए सजा की अवधि पर भी सवाल उठाए हैं.
उन्होंने आगे कहा, अब बिल गवर्नर के ऑफिस से वापस आ गए हैं, इसलिए उन्हें फिर से बनाना होगा. बताई गई गलतियों को हटाया जाएगा और दूसरी तकनीकी कमियों को भी ठीक किया जाएगा. अधिकारी ने कहा, सरकार के पास दो विकल्प होंगे, या तो अध्यादेश लाकर संशोधनों को पास कराए या उन्हें फिर से विधानसभा में पास करवाकर राज्यपाल की मंज़ूरी के लिए भेज दे.
धामी सरकार के लिए झटका
धार्मिक धर्मांतरण और UCC बिल दोनों ही भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली पुष्कर सिंह धामी सरकार द्वारा लाए गए सबसे महत्वाकांक्षी बिल में से थे. कांग्रेस ने इनका विरोध किया था. उसने इसे अल्पसंख्यक समुदाय पर हमला बताया था. UCC जनवरी 2024 में पास हुआ था और सरकार ने इस साल अगस्त में विधानसभा के मॉनसून सत्र के दौरान विधेयक में एक संशोधन किया.
बिल में क्या-क्या?
कई बदलावों में सरकार ने उन लोगों के लिए सजा बढ़ाकर सात साल तक कर दी, जो शादीशुदा होने के बावजूद लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं. जो लोग जबरदस्ती, दबाव या धोखे से रिलेशनशिप में आते हैं, उनके लिए भी ऐसी ही सज़ा का प्रस्ताव दिया गया.
विधेयक में एक नई धारा 390-A को भी जोड़ा गया है. रजिस्ट्रार जनरल को सेक्शन 12 के तहत शादी, तलाक, लिव-इन रिलेशनशिप या विरासत से जुड़े रजिस्ट्रेशन रद्द करने की शक्तियां दीं.
हालांकि राज्य में 2018 में पहले से ही धर्मांतरण विरोधी कानून लागू था, लेकिन सरकार ने 2022 में और फिर 2025 में इसमें संशोधन किया. इस बार जबरन धर्मांतरण के दोषी पाए जाने वाले लोगों के लिए तीन साल से लेकर उम्रकैद तक की जेल की सजा का प्रस्ताव रखा गया. पहले जबरन धर्मांतरण के लिए अधिकतम जेल की सज़ा 10 साल थी.
कांग्रेस का सरकार पर निशाना
राज्य सरकार ने दावा किया है कि राज्यपाल के ऑफिस ने मामूली गलतियों की वजह से बिल वापस कर दिए, लेकिन कांग्रेस ने इस कदम को 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले मुद्दों को ज़िंदा रखने की एक चाल बताया है.
उत्तराखंड कांग्रेस के नेता सूर्यकांत धस्माना ने कहा, अगर ये सिर्फ़ छोटी-मोटी कमियां होतीं तो गवर्नर का ऑफिस उन्हें अनौपचारिक रूप से सुधार के लिए वापस भेज सकता था. उन्हें मैसेज के साथ वापस भेजना यह पक्का करने के लिए काफ़ी है कि या तो वह कानूनों से पूरी तरह नाखुश हैं या यह सरकार की सिर्फ़ एक चाल है ताकि बिलों को वापस बुलाया जा सके और 2027 की शुरुआत में होने वाले चुनावों के आसपास उन्हें एक बार फिर असेंबली में पास कराया जा सके, क्योंकि बीजेपी पहले ही चुनाव जीतने के लिए अपनी सभी चालें चल चुकी है और अब उनके पास कुछ भी नया नहीं बचा है.
लोकतंत्र में कानून की सख्ती से ज्यादा उसकी वैधानिक स्पष्टता मायने रखती है। अन्यथा, सख्त इरादों के बावजूद सरकार की किरकिरी होना तय है—और विपक्ष को कटाक्ष का मौका खुद सरकार ही थाली में परोस रही है।
