उत्तराखंड के रुद्रपुर से 25 जुलाई 2025 को आई जिलाधिकारी नितिन सिंह भदौरिया की महत्वपूर्ण अधिसूचना प्रशासनिक पारदर्शिता की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखी जा रही है। इस आदेश में स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि किसी भी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी को बिना विभागीय अनुमति के निजी व्यक्तियों को अपने राजकीय कार्यों में संलिप्त करने की अनुमति नहीं है। यह कदम न केवल शासन की पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है, बल्कि यह भी रेखांकित करता है कि सरकारी तंत्र में बढ़ते अपारदर्शी तरीकों और भ्रष्टाचार की जड़ों को समझा जा चुका है।
लेकिन प्रश्न यह है — क्या ऐसे आदेश वास्तव में व्यवहारिक धरातल पर बदलाव ला पाएंगे? क्या यह भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक प्रहार है या एक और प्रशासनिक औपचारिकता?
. आदेश का निहितार्थ और प्रशासनिक दृष्टिकोण?डीएम नितिन भदौरिया द्वारा जारी आदेश की मुख्य बिंदु यह है कि किसी भी राजकीय कार्य में बिना विभागीय अनुमति के बाहरी व्यक्ति को शामिल करना अब दंडनीय होगा।
इस आदेश की आवश्यकता इसलिए महसूस की गई क्योंकि वर्षों से देखा जा रहा है कि अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा “सहयोगी” या “स्टाफ” के नाम पर कुछ निजी व्यक्तियों को अपने आसपास रखा जाता है। ये लोग अक्सर न तो विभाग से अधिकृत होते हैं और न ही उनकी कोई जवाबदेही होती है।इनकी भूमिका फाइलों को पहुंचाने, जनता के कार्यों में हस्तक्षेप करने से लेकर वसूली तक देखी जाती रही है। कुछ मामलों में तो यह भी सामने आया है कि ये निजी लोग ठेके, नापजोख, पट्टे, नामांतरण, एवं निर्माण अनुमति जैसे कार्यों में पूरी तरह हस्तक्षेप करते हैं और जनता से सीधे पैसे वसूलते हैं — “साहब तक बात पहुंचाने” या “काम जल्दी करवाने” के नाम पर।
बाहरी सहयोगियों” की परंपरा: भ्रष्टाचार की अनदेखी गई जड़?राजस्व विभाग, नगर निकाय, विकास प्राधिकरण, आबकारी, खाद्य आपूर्ति, और यहाँ तक कि जिला आपूर्ति कार्यालयों में भी यह देखा गया है कि एक “स्थायी बाहरी व्यक्ति” अधिकारी के दफ्तर के बाहर बैठता है। वह लोगों से आवेदन, दस्तावेज और रुपये लेकर “अंदर” भेजता है।
ये लोग अक्सर स्थानीय नेताओं या प्रभावशाली लोगों के सिफारिशी होते हैं,भूतपूर्व कर्मचारी या उनके परिजन होते हैं,या ऐसे व्यक्ति होते हैं जो अवैध रूप से “बिचौलिया” बनकर काम कर रहे होते हैं।
ऐसे में आम जनता को यह भ्रम होता है कि सरकारी व्यवस्था इन्हीं के जरिये चलती है, और अधिकारियों से सीधा संवाद असंभव है।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध ‘सख्त कार्यवाही’ की चेतावनी: कितनी प्रभावी?डीएम का आदेश प्रशंसनीय है, लेकिन इसमें यह भी लिखा गया है कि यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी द्वारा ऐसा प्रकरण प्रकाश में आता है तो उसके विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जाएगी।
अब यह महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है:कठोर कार्यवाही से क्या आशय है?क्या यह निलंबन तक सीमित रहेगा या कानूनी मुकदमेबाजी भी की जाएगी?क्या ऐसे मामलों की नियमित जांच या निगरानी की व्यवस्था की गई है?कई बार देखा गया है कि विभागीय कार्रवाई नाम मात्र की होती है और दोषियों को केवल चेतावनी देकर छोड़ दिया जाता है, जिससे व्यवस्था में डर का अभाव बना रहता है।
फील्ड रिपोर्ट: क्या रुद्रपुर के सरकारी कार्यालय इस आदेश का पालन कर रहे हैं?
संपादकीय टीम द्वारा रुद्रपुर के कुछ विभागीय कार्यालयों — जैसे तहसील कार्यालय, नगर निगम, खाद्य विभाग, एआरटीओ कार्यालय — का दौरा किया गया। स्थिति कुछ इस प्रकार मिली:तहसील कार्यालय: यहां “मनोज भैया” नामक व्यक्ति जो कि न तो विभाग का कर्मचारी है, न ही किसी फर्म से अधिकृत है, हर दिन दस्तावेजों की फाइलिंग कर रहा है। लोग उसे “तहसील वाले” मानते हैं।नगर निगम कार्यालय: पार्किंग पास बनवाने, निर्माण नक्शा पास करवाने जैसी सेवाओं में कुछ निजी व्यक्ति सक्रिय रूप से “सहयोग” करते देखे गए।खाद्य विभाग: राशन कार्ड सत्यापन के नाम पर “एक बाबू के जानकार” द्वारा ₹100-₹500 वसूली की जा रही थी।इन उदाहरणों से साफ है कि आदेश ज़ारी कर देना एक बात है, लेकिन उसका जमीनी क्रियान्वयन दूसरी।
सरकारी अधिकारियों की चुप्पी और मिलीभगत?जब संपादकीय टीम ने कुछ अधिकारियों से इस पर बात की तो उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि—ये लोग हमारे ऊपर के लोगों के सिफारिशी होते हैं।”काम का दबाव इतना अधिक है कि कभी-कभी इनसे मदद लेनी ही पड़ती है।कभी-कभी इनकी जानकारी जनता से भी ज्यादा होती है।”यह स्वीकारोक्ति साफ दर्शाती है कि समस्या सिर्फ नीतियों में नहीं, बल्कि मानसिकता में है। जब तक अधिकारी स्वयं इन लोगों को बाहर करने की ईमानदार कोशिश नहीं करेंगे, तब तक जिलाधिकारी का आदेश सिर्फ दीवारों पर चिपका एक नोटिस ही बना रहेगा।
आम जनता का नजरिया: “बिना दलाल के कोई काम नहीं होता”रुद्रपुर की जनता से बात करने पर जो राय सामने आई वह चौंकाने वाली नहीं थी लेकिन चिंताजनक ज़रूर थी। अधिकांश लोगों ने कहा:“साहब से मिलना आसान नहीं, लेकिन उसका आदमी पैसे लेकर काम करा देता है।”“हम गरीब आदमी हैं, बार-बार भागदौड़ नहीं कर सकते।“अगर कोई कहे कि 500 में काम हो जाएगा, तो हम दे देते हैं।”यह जनता की उस निराशा को दर्शाता है जहाँ सरकारी व्यवस्था से भरोसा लगभग टूट चुका है।
क्या यह आदेश राज्यभर में एक मॉडल बन सकता है?यदि जिलाधिकारी रुद्रपुर के आदेश का क्रियान्वयन वास्तव में हो जाए और इसका असर सकारात्मक हो तो यह उत्तराखंड के अन्य जिलों के लिए एक मॉडल बन सकता है।इसके लिए जरूरी होगा कि:हर कार्यालय में प्रवेश द्वार पर स्पष्ट बोर्ड लगाया जाए: “बिना विभागीय पहचान पत्र वाला कोई भी व्यक्ति राजकीय कार्य में अधिकृत नहीं है।”सीसीटीवी निगरानी बढ़ाई जाए और रिकार्डिंग की समीक्षा की जाए।हर शिकायत को ऑनलाइन ट्रैक करने योग्य प्लेटफॉर्म पर डाला जाए।कार्यों में पारदर्शिता हेतु समयसीमा निर्धारित की जाए।जनभागीदारी सुनिश्चित हो – जैसे आरटीआई कार्यकर्ता या सामाजिक संगठनों की निरीक्षण समितियां बनाई जाएं।
क्या यह कदम उत्तरदायी शासन की शुरुआत है?भ्रष्टाचार से मुक्ति केवल चेतावनियों और परिपत्रों से नहीं आती। इसके लिए चाहिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक कड़ाई, और नागरिक सहभागिता।
रुद्रपुर के जिलाधिकारी द्वारा लिया गया यह कदम सराहनीय है क्योंकि यह व्यवस्था के एक ऐसे छिपे हुए पहलू पर प्रहार करता है जो लंबे समय से नजरअंदाज किया गया — “असंगठित भ्रष्टाचार का संगठित ढांचा।”
लेकिन यही कदम तभी सार्थक होगा जब:इसकी निगरानी प्रणाली सक्रिय हो,दोषियों को वाकई दंड मिले,और ईमानदार अधिकारियों को समर्थन दिया जाए।
अगर रुद्रपुर इस व्यवस्था को ईमानदारी से लागू करता है, तो यह न केवल उत्तराखंड के अन्य जिलों को प्रेरणा देगा बल्कि यह भी साबित करेगा कि “प्रशासनिक आदेश केवल कागज़ नहीं, बदलाव का औजार भी हो सकते हैं।”
वरना ये भी एक कागज़ी आदेश बनकर रह जाएगा — जैसे वर्षों से होती रही खानापूरी और नकली पारदर्शिता।
(लेखक: अवतार सिंह बिष्ट, वरिष्ठ संपादक — हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स)
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