विश्वप्रसिद्ध श्री पशुपतिनाथ महादेव मंदिर से महज एक किलोमीटर दूर खिलचीपुरा स्थित श्री धौलागढ़ महादेव मंदिर देश का ऐसा दूसरा अनूठा देवस्थान है, जहां धन के अधिपति भगवान कुबेर स्वयं भगवान शिव की पंचायत में विराजित हैं।
देशभर में उत्तराखंड के केदारनाथ धाम के बाद केवल मंदसौर का यह मंदिर है, जहां शिव परिवार के साथ भगवान कुबेर को गर्भगृह में स्थान प्राप्त है। यही कारण है कि धनतेरस के पावन अवसर पर यहां देश-विदेश से श्रद्धालु सुख-समृद्धि, वैभव और आर्थिक संकटों से मुक्ति की कामना लेकर पहुंचते हैं।
धनतेरस पर ब्रह्म मुहूर्त से देर रात तक विशेष अनुष्ठान
धनतेरस पर श्री धौलागढ़ महादेव मंदिर में धार्मिक कार्यक्रमों की विस्तृत रूपरेखा-
- प्रातः 4:00 बजे ब्रह्म मुहूर्त में भगवान शिव और धनपति कुबेर का विशेष द्रव्यों से महाभिषेक संपन्न होगा। इसके बाद उनका मनोहारी और आकर्षक शृंगार किया जाएगा।
- सुबह से ही वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विशेष हवन और पूजन प्रारंभ होंगे, जो पूरे दिन निरंतर चलेंगे।
- पूर्णाहुति: देर रात महाआरती और हवन की पूर्णाहुति के साथ धनतेरस के महापर्व का समापन होगा।
7वीं शताब्दी की दुर्लभ कुबेर प्रतिमा
पुरातत्व विभाग के विशेषज्ञ डॉ. कैलाश शर्मा के अनुसार, इस मंदिर का ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व असाधारण है। श्री धौलागढ़ महादेव मंदिर लगभग 1200 वर्ष पुराना है। गर्भगृह में स्थापित भगवान कुबेर की पाषाण प्रतिमा 7वीं शताब्दी (उत्तर गुप्तकाल) की मानी जाती है। मराठा शासनकाल में जब मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ, तब इस प्रतिमा को पूरे आदर के साथ गर्भगृह में स्थापित किया गया था।
करीब 3 फीट ऊंची इस दुर्लभ प्रतिमा में भगवान कुबेर को उनके पारंपरिक स्वरूप- बड़ा उदर (तोंद), चार भुजाएं और उनके वाहन नेवले (नकुल) पर विराजमान दिखाया गया है। उनके एक हाथ में धन की थैली और दूसरे हाथ में अमृत/सुरा का प्याला सुशोभित है। पुरातात्विक सर्वेक्षण के दौरान वर्ष 1978 में इस प्रतिमा की आधिकारिक पहचान ‘भगवान कुबेर’ के रूप में दर्ज की गई थी।
लोक-मान्यताएं और स्थापत्य की विशेषताएं
स्थानीय लोक-मान्यताओं में यह चर्चा रहती है कि यह मंदिर किसी अन्य स्थान से उड़कर यहां स्थापित हुआ था और इसकी पारंपरिक गहरी नींव नहीं है। हालांकि पुरातत्वविद इसे स्थापत्य कला की विशिष्ट तकनीक मानते हैं, वैज्ञानिक स्तर पर उड़ने की मान्यता की पुष्टि नहीं होती।
अपने ऐतिहासिक और प्राचीन स्वरूप के कारण मंदिर की मूल संरचना को जस का तस संरक्षित रखा गया है। मराठा काल के जीर्णोद्धार के बाद से इसकी प्राचीनता और आध्यात्मिक आभा अक्षुण्ण बनी हुई है।
शिव पंचायत में पार्वती, गणेश और कार्तिकेय के साथ धनपति कुबेर के साक्षात दर्शन कराने वाला यह पावन धाम धनतेरस के दिन हर सनातनी के लिए विशेष श्रद्धा और आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
