उत्तराखंड की राजनीति लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच घूमती रही है। राज्य निर्माण आंदोलन की पृष्ठभूमि से जन्मे उत्तराखंड में जनता ने समय-समय पर दोनों राष्ट्रीय दलों को सत्ता सौंपी, लेकिन राज्य निर्माण के मूल उद्देश्यों—स्थायी विकास, पलायन की रोकथाम, स्थानीय युवाओं को रोजगार, पहाड़ों का संरक्षण और उत्तराखंडियत की पहचान—को लेकर बहस आज भी जारी है। ऐसे समय में उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) एक बार फिर स्वयं को राज्य की क्षेत्रीय आकांक्षाओं के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है।
हाल के दिनों में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के बयानों ने राज्य की राजनीति में नई चर्चा को जन्म दिया है। मुख्यमंत्री धामी ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर तीखा हमला करते हुए कहा कि देश में उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता। भाजपा नेतृत्व लगातार कांग्रेस को अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत करता रहा है, लेकिन दूसरी ओर राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग यह मानता है कि उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय मुद्दों के कारण उत्तराखंड क्रांति दल की प्रासंगिकता फिर से बढ़ सकती है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
कांग्रेस की चुनौती और गिरता जनाधार
उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन में उत्तराखंड क्रांति की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, लेकिन राज्य गठन के बाद कांग्रेस और भाजपा दोनों पर यह आरोप लगता रहा है कि उन्होंने आंदोलन की मूल भावना को पूरी तरह लागू नहीं किया। पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस संगठनात्मक कमजोरी, नेतृत्व संकट और लगातार चुनावी पराजयों से जूझती दिखाई दी है।
राज्य की राजनीति पर नजर रखने वाले कई विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का जनाधार विशेषकर ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में कमजोर हुआ है। भाजपा के मजबूत संगठन, केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता ने कांग्रेस के लिए चुनौती बढ़ाई है।
इसके साथ ही कांग्रेस पर उसके विरोधियों द्वारा समय-समय पर कई आरोप लगाए जाते रहे हैं। भाजपा और अन्य राजनीतिक दलों ने राज्य में अतिक्रमण, जनसांख्यिकीय परिवर्तन तथा सुरक्षा संबंधी विषयों पर कांग्रेस की नीतियों की आलोचना की है। हालांकि इन विषयों पर अलग-अलग राजनीतिक दलों के अपने-अपने दृष्टिकोण हैं और इन पर सार्वजनिक बहस जारी रहती है।
उत्तराखंड की विशिष्ट पहचान का प्रश्न
उत्तराखंड एक भौगोलिक इकाई k साथ साथ यह सैन्य परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक महत्व और प्राकृतिक संपदा का संगम है। देश की सेना में राज्य का योगदान सर्वविदित है। गढ़वाल राइफल्स और कुमाऊँ रेजिमेंट जैसी गौरवशाली सैन्य परंपराएं उत्तराखंड की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
राज्य के लोगों के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि भावनात्मक विषय भी है। यही कारण है कि जब भी सेना, सीमा सुरक्षा या राष्ट्रहित से जुड़े विषय सामने आते हैं तो उत्तराखंड की जनता विशेष संवेदनशीलता दिखाती है।
मुख्यमंत्री धामी द्वारा राहुल गांधी की आलोचना करते हुए सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों का उल्लेख भी इसी व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य का हिस्सा माना जा सकता है। भाजपा लगातार राष्ट्रवाद और सुरक्षा को अपने प्रमुख राजनीतिक विमर्श के रूप में प्रस्तुत करती रही है।
भाजपा का मॉडल: विकास और राष्ट्रवाद
भाजपा वर्तमान में उत्तराखंड में सबसे मजबूत राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में समान नागरिक संहिता (यूसीसी), नकल विरोधी कानून, धर्मांतरण विरोधी कानून और निवेश आकर्षित करने जैसे कदमों को भाजपा अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत करती है।
चारधाम परियोजना, सड़क और रेल संपर्क में सुधार, पर्यटन विकास तथा धार्मिक पर्यटन के विस्तार को भी भाजपा सरकार अपनी प्राथमिकताओं में गिनाती है।
कैंची धाम, केदारनाथ और बदरीनाथ जैसे धार्मिक स्थलों पर बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या ने राज्य की अर्थव्यवस्था को नई गति दी है। मुख्यमंत्री धामी द्वारा कैंची धाम में जाम की समस्या के समाधान और बाईपास निर्माण का उल्लेख इसी विकास मॉडल का हिस्सा है।
भाजपा का तर्क है कि मजबूत केंद्र और राज्य सरकार के समन्वय से उत्तराखंड को देश के अग्रणी राज्यों में शामिल किया जा सकता है।
उत्तराखंड क्रांति दल की वापसी की संभावनाएं
दूसरी ओर उत्तराखंड क्रांति दल का दावा है कि राज्य निर्माण आंदोलन के मूल उद्देश्य आज भी अधूरे हैं। यूकेडी लंबे समय से भू-कानून, मूल निवास, स्थायी राजधानी, पर्वतीय विकास और स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों के अधिकार जैसे मुद्दे उठाता रहा है।
राजनीतिक रूप से यूकेडी कभी भी राज्य की सत्ता तक नहीं पहुंच पाया, लेकिन उसकी वैचारिक उपस्थिति लगातार बनी रही है। समय-समय पर जब भी राज्य की पहचान, भूमि संरक्षण या स्थानीय अधिकारों की चर्चा होती है, तब यूकेडी का नाम फिर सामने आता है।
यूकेडी समर्थकों का मानना है कि राष्ट्रीय दलों ने उत्तराखंड को राष्ट्रीय राजनीति के चश्मे से देखा, जबकि राज्य के विशिष्ट मुद्दों को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिली। उनका तर्क है कि एक क्षेत्रीय दल ही स्थानीय आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से समझ सकता है।
भू-कानून और मूल निवास का मुद्दा
उत्तराखंड की राजनीति में भू-कानून का विषय लगातार चर्चा में रहा है। राज्य के कई सामाजिक संगठन और क्षेत्रीय राजनीतिक समूह मांग करते रहे हैं कि भूमि खरीद और उपयोग को लेकर ऐसे प्रावधान हों जो स्थानीय हितों की रक्षा करें।
यूकेडी इस मुद्दे को लंबे समय से उठाता रहा है। पार्टी का कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों में अंधाधुंध भूमि खरीद से स्थानीय लोगों के हित प्रभावित हो सकते हैं।
भाजपा सरकार ने भी इस विषय पर कदम उठाने की बात कही है और समय-समय पर नियमों में संशोधन किए हैं। लेकिन यूकेडी का तर्क है कि अधिक व्यापक और कठोर व्यवस्था की आवश्यकता है।
पलायन: सबसे बड़ा संकट
उत्तराखंड के सामने सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक पलायन है। हजारों गांव आंशिक या पूर्ण रूप से खाली हो चुके हैं। रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण बड़ी संख्या में लोग मैदानों और अन्य राज्यों की ओर चले गए हैं।
यह समस्या भाजपा और कांग्रेस दोनों सरकारों के कार्यकाल में बनी रही। यूकेडी इसी मुद्दे को आधार बनाकर कहता है कि राज्य को ऐसी नीतियों की जरूरत है जो गांवों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना सकें।
स्थानीय कृषि, बागवानी, जड़ी-बूटी उद्योग, पर्यटन और लघु उद्योगों के माध्यम से रोजगार सृजन को यूकेडी अपनी प्राथमिकता बताता है।
भाजपा बनाम यूकेडी: भविष्य की संभावित राजनीति
यदि कांग्रेस का जनाधार कमजोर होता है और क्षेत्रीय मुद्दे अधिक प्रभावी होते हैं, तो आने वाले वर्षों में भाजपा और उत्तराखंड क्रांति दल के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की संभावना बढ़ सकती है।
भाजपा के पास मजबूत संगठन, संसाधन, केंद्र सरकार का समर्थन और व्यापक जनाधार है। वहीं यूकेडी के पास क्षेत्रीय पहचान और राज्य आंदोलन की विरासत है।
चुनौती यह है कि क्या यूकेडी अपने वैचारिक प्रभाव को चुनावी सफलता में बदल पाएगा। दूसरी ओर भाजपा के सामने चुनौती यह होगी कि वह विकास के साथ-साथ स्थानीय अस्मिता से जुड़े प्रश्नों का भी संतोषजनक समाधान प्रस्तुत करे।
उत्तराखंड की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। भाजपा आज राज्य की सबसे मजबूत राजनीतिक शक्ति है, जबकि कांग्रेस अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के संघर्ष में नजर आती है। वहीं उत्तराखंड क्रांति दल राज्य निर्माण आंदोलन की विरासत और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दों के सहारे पुनर्जीवन की उम्मीद लगाए हुए है।
आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि उत्तराखंड की जनता राष्ट्रीय विकास और स्थिरता के भाजपा मॉडल को प्राथमिकता देती है या क्षेत्रीय पहचान और स्थानीय मुद्दों को केंद्र में रखने वाले उत्तराखंड क्रांति दल को अधिक अवसर प्रदान करती है। इतना निश्चित है कि उत्तराखंड की राजनीति का भविष्य केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि राज्य की मूल आकांक्षाओं को पूरा करने की दिशा तय करने का प्रश्न भी होगा।
