तीलू रौतेली सम्मान: नारी शक्ति का गौरव या राजनीतिक निष्ठा का पुरस्कार?

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उत्तराखंड सरकार ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के तीलू रौतेली राज्य स्त्री शक्ति पुरस्कार और राज्य स्तरीय आंगनबाड़ी कार्यकर्ती पुरस्कारों की घोषणा कर दी है। आठ अगस्त को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी चयनित महिलाओं और आंगनबाड़ी कार्यकर्तियों को सम्मानित करेंगे। सरकार का कहना है कि यह सम्मान समाज में उत्कृष्ट योगदान देने वाली महिलाओं के लिए है। प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में यह सम्मान केवल उत्कृष्ट कार्य के आधार पर दिया जाता है, या फिर इसमें राजनीतिक प्रभाव भी अपनी भूमिका निभाता है?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


तीलू रौतेली उत्तराखंड की वीरांगना थीं। उनका नाम संघर्ष, साहस, त्याग और समाज के प्रति समर्पण का प्रतीक है। उनके नाम पर दिया जाने वाला सम्मान किसी भी राजनीतिक दल की विचारधारा से ऊपर होना चाहिए। यह सम्मान उस महिला तक पहुंचना चाहिए जिसने अपने कार्यों से समाज में परिवर्तन की मिसाल कायम की हो। यदि चयन प्रक्रिया पर राजनीतिक प्रभाव का संदेह पैदा होने लगे तो सम्मान की गरिमा भी प्रभावित होती है।
वर्षों से समय-समय पर यह आरोप सामने आते रहे हैं कि सत्ता परिवर्तन के साथ सम्मान पाने वालों की सूची का स्वरूप भी बदल जाता है। कांग्रेस के शासनकाल में कांग्रेस समर्थक विचारधारा से जुड़ी महिलाओं को प्राथमिकता मिलने के आरोप लगे। अब भाजपा सरकार के दौरान भी विपक्ष और सामाजिक संगठनों के कुछ वर्ग यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या भाजपा की पृष्ठभूमि रखने वाली महिलाओं को अपेक्षाकृत अधिक अवसर मिल रहे हैं। यदि ऐसे आरोप लगातार उठते रहें तो यह केवल सरकार पर प्रश्न खड़ा करने का विषय भर नहीं रहता, बल्कि पूरी चयन व्यवस्था की निष्पक्षता पर भी चर्चा शुरू हो जाती है।
यह भी सच है कि किसी व्यक्ति का किसी राजनीतिक दल से जुड़ाव अपने आप में उसे पुरस्कार के अयोग्य सिद्ध नहीं करता। यदि किसी महिला ने वास्तव में उत्कृष्ट कार्य किया है तो उसे सम्मान मिलना ही चाहिए, चाहे उसकी वैचारिक या राजनीतिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो। दूसरी ओर, यदि किसी अधिक योग्य महिला की उपेक्षा केवल राजनीतिक कारणों से होती है तो यह सम्मान के मूल उद्देश्य के विपरीत माना जाएगा।
सबसे बड़ा प्रश्न चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता का है। क्या चयन के स्पष्ट मानदंड सार्वजनिक किए जाते हैं? क्या नामांकन की प्रक्रिया पूरी तरह खुली होती है? क्या चयन समिति में स्वतंत्र विशेषज्ञों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को पर्याप्त स्थान मिलता है? क्या चयनित और अस्वीकृत नामों के मूल्यांकन का कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध कराया जाता है? इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर मिलें तो विवाद स्वतः कम हो सकते हैं।
उत्तराखंड के दूरस्थ गांवों में अनेक महिलाएं वर्षों से शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, महिला स्वावलंबन, लोक संस्कृति, जैविक खेती और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं। अनेक महिलाएं ऐसी भी हैं, जो किसी राजनीतिक मंच से जुड़ी हुए बिना समाज में परिवर्तन का बड़ा काम कर रही हैं। यदि ऐसी महिलाओं के नाम चयन सूची में लगातार कम दिखाई दें तो स्वाभाविक रूप से यह धारणा मजबूत होती है कि राजनीतिक पहचान योग्यता पर भारी पड़ रही है।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ती पुरस्कार के संदर्भ में भी यही अपेक्षा लागू होती है। आंगनबाड़ी कार्यकर्तियां मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, पोषण, टीकाकरण और प्रारंभिक शिक्षा की आधारशिला हैं। उनका मूल्यांकन केवल उपलब्धियों, कार्य की गुणवत्ता और जनसेवा के आधार पर होना चाहिए। यदि यहां भी किसी प्रकार का बाहरी प्रभाव दिखाई दे तो वास्तविक मेहनत करने वाली कार्यकर्तियों का मनोबल प्रभावित हो सकता है।
सरकार के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी। यदि चयन पूरी तरह निष्पक्ष है तो उसे चयन प्रक्रिया, अंक प्रणाली और मानदंड सार्वजनिक करने चाहिए। इससे हर प्रकार की शंका समाप्त होगी। पारदर्शिता किसी भी सम्मान की विश्वसनीयता को मजबूत करती है। समाज भी उसी सम्मान को सबसे अधिक स्वीकार करता है जिसकी प्रक्रिया निष्पक्ष और प्रमाण आधारित हो।
विपक्ष को भी केवल आरोप लगाने तक सीमित रहने के बजाय यदि किसी चयन पर आपत्ति है तो तथ्यों और प्रमाणों के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। लोकतंत्र में स्वस्थ विमर्श आरोप और प्रत्यारोप से आगे बढ़कर साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए।
अंततः तीलू रौतेली सम्मान किसी दल का सम्मान बनने के लिए स्थापित नहीं किया गया था। यह उत्तराखंड की उन बेटियों और महिलाओं का सम्मान है जिन्होंने अपने साहस, परिश्रम और समर्पण से समाज को नई दिशा दी। यदि यह सम्मान राजनीतिक निष्ठा का प्रतीक बन गया तो इसकी गरिमा धीरे-धीरे कम होगी। यदि यह केवल योग्यता, सेवा और उपलब्धियों के आधार पर दिया जाएगा तो आने वाली पीढ़ियां इसे सर्वोच्च सामाजिक सम्मान के रूप में देखेंगी।
इसलिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न आज भी वही है—क्या तीलू रौतेली सम्मान वास्तव में समाज की सबसे योग्य महिलाओं तक पहुंच रहा है, या सत्ता परिवर्तन के साथ सम्मान की दिशा भी बदल जाती है? इस प्रश्न का उत्तर सरकार की पारदर्शिता, चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता और समाज के विश्वास से ही मिलेगा। लोकतंत्र में सम्मान की सबसे बड़ी ताकत उसकी विश्वसनीयता होती है, और उस विश्वसनीयता को बनाए रखना हर सरकार की जिम्मेदारी है।


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