26 साल का राज: मुख्यमंत्री राहत कोष में कितना आया, कितना गया और कितना बचा? हिसाब पर उठे सवाल
राहत कोष का रहस्य: जनता ने दिया करोड़ों, खर्च कितना हुआ? 26 साल के हिसाब पर नेताओं के कान खड़े
देहरादून। प्रधानमंत्री केयर्स फंड में जमा रकम और उसके सीमित उपयोग को लेकर उठे सवालों के बीच अब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री राहत कोष के वित्तीय हिसाब-किताब की पड़ताल भी जरूरी हो गई है। उत्तराखंड राज्य का गठन नवंबर 2000 में हुआ। इसके बाद से प्रदेश में अलग-अलग सरकारें और मुख्यमंत्री बदलते रहे, लेकिन मुख्यमंत्री राहत कोष लगातार संचालित होता रहा। इस कोष में आम नागरिकों, कर्मचारियों, उद्योगपतियों, कंपनियों, सामाजिक संस्थाओं और अन्य संगठनों ने समय-समय पर दान दिया। प्राकृतिक आपदा, दुर्घटना, गंभीर बीमारी और अन्य मानवीय संकटों में इसी कोष से आर्थिक सहायता दिए जाने की व्यवस्था रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि राज्य बनने के बाद 26 वर्षों में मुख्यमंत्री राहत कोष में कुल कितनी राशि जमा हुई, कितनी राशि खर्च हुई और वर्तमान में कितनी रकम शेष है? उपलब्ध सार्वजनिक सूचनाओं में इसका वर्षवार और मुख्यमंत्रीवार पूरा समेकित हिसाब आसानी से उपलब्ध नहीं है।
यही स्थिति इस पड़ताल को महत्वपूर्ण बनाती है।
कोरोना काल में सामने आया था बड़ा आंकड़ा
वर्ष 2020 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के समय मुख्यमंत्री राहत कोष में कोरोना संकट के दौरान बड़े पैमाने पर सहयोग मिला। 15 मार्च से 26 जून 2020 के बीच कोष में 154.56 करोड़ रुपये जमा होने की जानकारी कैबिनेट बैठक में सामने आई थी। उस समय सरकार ने बताया था कि इसमें से 85.60 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके थे। सरकार ने कोष में पारदर्शिता के लिए वित्त विभाग के एक अधिकारी को रखने का निर्णय भी लिया था।
तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी सार्वजनिक रूप से कहा था कि जनता और अधिकारियों ने कोरोना संकट के दौरान मुख्यमंत्री राहत कोष में सहयोग दिया है और सरकार कोष के एक-एक पैसे का हिसाब जनता को देगी।
यह आंकड़ा बताता है कि केवल कोरोना काल के कुछ महीनों में ही राहत कोष में 154 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा हुई थी। इसके बाद भी 2020 के बाद आपदाओं और अन्य परिस्थितियों में कोष में लगातार धनराशि आती रही।
धामी सरकार के दौर में बड़े योगदान
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कार्यकाल में भी मुख्यमंत्री राहत कोष में बड़ी धनराशि के योगदान के कई उदाहरण सामने आए हैं।
सितंबर 2023 में रिलायंस इंडस्ट्रीज की ओर से 25 करोड़ रुपये मुख्यमंत्री राहत कोष के लिए दिए गए। यह योगदान उत्तराखंड में भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन से प्रभावित लोगों की सहायता के लिए किया गया था।
जोशीमठ भूधंसाव संकट के दौरान एनएचपीसी ने भी मुख्यमंत्री राहत कोष में 2 करोड़ रुपये का योगदान दिया। कंपनी के अनुसार यह राशि जोशीमठ क्षेत्र में प्रभावित लोगों के पुनर्वास और राहत कार्यों में सहयोग के उद्देश्य से दी गई थी।
वर्ष 2025 में आपदा प्रभावित उत्तराखंड के लिए विभिन्न संस्थाओं ने भी मुख्यमंत्री राहत कोष में बड़ी रकम दी। इनमें कैंची धाम ट्रस्ट की ओर से 2.5 करोड़ रुपये, देवघर सत्संग परिवार की ओर से 1 करोड़ रुपये और टीएचडीसी इंडिया की ओर से 1 करोड़ रुपये का योगदान शामिल है।
अक्टूबर 2025 में लार्सन एंड टुब्रो ने भी राहत एवं पुनर्वास कार्यों के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष में 5 करोड़ रुपये दिए।
इससे साफ है कि मुख्यमंत्री राहत कोष में समय-समय पर करोड़ों रुपये का जनसहयोग और संस्थागत योगदान आता रहा है।
पैसा किसके कार्यकाल में आया?
उत्तराखंड बनने के बाद मुख्यमंत्री राहत कोष का इतिहास प्रदेश की राजनीतिक यात्रा के समानांतर चलता है। राज्य के शुरुआती मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी और भगत सिंह कोश्यारी के बाद एनडी तिवारी, बीसी खंडूड़ी, रमेश पोखरियाल निशंक, विजय बहुगुणा, हरीश रावत, त्रिवेंद्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत और पुष्कर सिंह धामी के कार्यकाल आए।
लेकिन एक महत्वपूर्ण कमी है—सरकार ने सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई समेकित दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराया है जिसमें 2000 से अब तक प्रत्येक मुख्यमंत्री के कार्यकाल में राहत कोष में प्राप्त धनराशि, ब्याज से हुई आय, खर्च और शेष रकम अलग-अलग दिखाई गई हो।
इसलिए यह कहना कि किसी एक मुख्यमंत्री के कार्यकाल में इतनी राशि जमा हुई और इतनी खर्च हुई, तब तक प्रमाणित नहीं माना जा सकता जब तक संबंधित वित्तीय रिकॉर्ड सामने न आए।
मुख्यमंत्री के पास कितनी शक्ति?
मुख्यमंत्री राहत कोष का मूल उद्देश्य सामान्य सरकारी बजट की तरह सड़क, भवन या नियमित विकास योजनाओं को वित्तपोषित करना नहीं, बल्कि आपदा, दुर्घटना, गंभीर बीमारी और मानवीय संकट में तत्काल आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है।
सरकारी सूचनाओं से यह भी स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री राहत कोष से प्राकृतिक आपदा में मृतकों के परिवारों, पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त भवनों और प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता स्वीकृत की जाती है।
उदाहरण के तौर पर वर्ष 2025 में बुरांसी गांव में आपदा में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को मुख्यमंत्री राहत कोष से 2-2 लाख रुपये की सहायता दी गई। एक पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त आवासीय भवन के लिए भी राहत राशि उपलब्ध कराई गई।
वर्ष 2026 में उत्तरकाशी के धराली, हर्षिल और अन्य प्रभावित क्षेत्रों में पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त 123 आवासीय भवनों के प्रभावित परिवारों के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष से 3.69 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी गई।
इससे यह स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री राहत कोष का इस्तेमाल वास्तविक आपदा राहत में किया जाता है।
क्या मुख्यमंत्री अपनी मर्जी से पैसा बांट सकते हैं?
यह सवाल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।
मुख्यमंत्री राहत कोष को मुख्यमंत्री की निजी निधि समझना गलत होगा। यह सार्वजनिक उद्देश्य वाला सरकारी राहत तंत्र है। मुख्यमंत्री इसके संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और राहत राशि की स्वीकृति से जुड़े निर्णय लेते हैं, मगर इसका अर्थ यह नहीं कि कोष की राशि मुख्यमंत्री की निजी संपत्ति है या उसे मनमाने तरीके से खर्च किया जा सकता है।
इसलिए जनता को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि सहायता स्वीकृत करने के लिए कौन-कौन से नियम हैं, किस स्तर पर प्रस्ताव तैयार होता है, किस अधिकारी की जांच होती है, मुख्यमंत्री की स्वीकृति की सीमा क्या है और भुगतान किस प्रक्रिया के तहत किया जाता है।
यदि किसी व्यक्ति को बीमारी, दुर्घटना या आपदा के कारण सहायता दी जाती है, तो उसके लिए निर्धारित नियम और पात्रता भी सार्वजनिक होनी चाहिए।
क्या जितना दान आया, उतना ही खर्च हुआ?
यहां सबसे बड़ा रहस्य यही है।
उपलब्ध रिकॉर्ड में अलग-अलग वर्षों और घटनाओं की प्राप्ति तथा खर्च के आंकड़े मिलते हैं, मगर राज्य गठन से लेकर आज तक की कुल जमा राशि और कुल खर्च का एक प्रमाणित समेकित आंकड़ा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
इसलिए यह कहना भी उचित नहीं होगा कि कोष में जितना पैसा दान के रूप में आया, उससे अधिक या कम खर्च हुआ।
इसके लिए कम से कम पांच आंकड़े सरकार को सार्वजनिक करने चाहिए—
पहला— 9 नवंबर 2000 से प्रत्येक वित्तीय वर्ष में प्राप्त कुल दान।
दूसरा— बैंक ब्याज और अन्य स्रोतों से हुई आय।
तीसरा— प्रत्येक वित्तीय वर्ष में राहत कोष से किया गया कुल भुगतान।
चौथा— वर्ष के अंत में बची हुई राशि।
पांचवां— पिछले वर्षों की बची राशि पर मिले ब्याज सहित वर्तमान कुल शेष।
इसके साथ प्रत्येक मुख्यमंत्री के कार्यकाल की अलग-अलग तालिका भी जारी होनी चाहिए।
आपदा के समय असली परीक्षा
उत्तराखंड देश के सबसे संवेदनशील पर्वतीय राज्यों में है। केदारनाथ आपदा से लेकर जोशीमठ भूधंसाव, अतिवृष्टि, भूस्खलन, बादल फटना और बाढ़ तक राज्य ने लगातार आपदाओं का सामना किया है।
ऐसे राज्य में मुख्यमंत्री राहत कोष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
सरकार द्वारा हाल के वर्षों में इस कोष से प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता देने के कई उदाहरण सामने आए हैं। 2026 में पिथौरागढ़ में प्राकृतिक आपदा से मृत नौ लोगों के परिजनों को मुख्यमंत्री राहत कोष से एक-एक लाख रुपये तथा पूर्ण रूप से क्षतिग्रस्त पांच भवनों के लिए तीन-तीन लाख रुपये की अतिरिक्त सहायता स्वीकृत की गई।
इससे यह साबित होता है कि कोष केवल कागजों पर मौजूद व्यवस्था नहीं है, उसका इस्तेमाल वास्तविक राहत में होता है।
मगर सवाल यह है कि कुल कितनी राशि आई और कुल कितनी राशि गई?
यही आंकड़ा आज जनता के सामने होना चाहिए।
पीएम केयर्स से तुलना क्यों जरूरी?
पीएम केयर्स फंड पर बहस ने देश में सार्वजनिक राहत कोषों की पारदर्शिता को लेकर चर्चा तेज कर दी है। उसी संदर्भ में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री राहत कोष का भी सामाजिक ऑडिट जरूरी है।
दोनों कोषों की कानूनी संरचना और संचालन व्यवस्था अलग है, इसलिए उनकी सीधी तुलना करना उचित नहीं होगा। मगर एक समान प्रश्न दोनों से जुड़ता है—जनता से मिले धन का कितना हिस्सा आया, कहां खर्च हुआ और कितना बचा?
यदि उत्तराखंड सरकार वर्ष 2000 से अब तक का पूरा लेखा-जोखा सार्वजनिक कर देती है तो यह सरकार की पारदर्शिता को मजबूत करेगा।
सरकार को जारी करना चाहिए ’26 साल का हिसाब’
उत्तराखंड सरकार को चाहिए कि मुख्यमंत्री राहत कोष की स्थापना से अब तक का ’26 साल का हिसाब’ जनता के सामने रखे।
एक वेबसाइट पर वर्षवार विवरण उपलब्ध कराया जा सकता है—
वित्तीय वर्ष
शुरुआती शेष
दान/योगदान
ब्याज
अन्य आय
कुल उपलब्ध राशि
राहत खर्च
अंतिम शेष
2000-01
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2001-02 से आगे
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2019-20
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2020-21
उपलब्ध रिकॉर्ड आंशिक
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2021-22
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2022-23
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2023-24
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2024-25
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2025-26
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इस तालिका के रिक्त स्थान भरना ही असली पारदर्शिता की परीक्षा होगी।
निष्कर्ष: सवाल आरोप का नहीं, हिसाब का है
मुख्यमंत्री राहत कोष में जनता का योगदान भावनात्मक विश्वास से जुड़ा होता है। कोई कर्मचारी अपना एक दिन का वेतन देता है, कोई व्यापारी अपनी क्षमता के अनुसार राशि देता है, कोई संस्था करोड़ों रुपये देती है और कोई सामान्य नागरिक अपनी छोटी बचत से सहयोग करता है।
इसलिए इस धन का हिसाब केवल सरकारी फाइल का विषय नहीं है। यह जनता के विश्वास का विषय है।
उपलब्ध रिकॉर्ड बताते हैं कि उत्तराखंड मुख्यमंत्री राहत कोष में समय-समय पर बड़ी रकम जमा हुई और जरूरतमंदों को सहायता भी दी गई। कोरोना काल में जून 2020 तक 154.56 करोड़ रुपये आने और 85.60 करोड़ रुपये खर्च होने का आधिकारिक आंकड़ा इसका उदाहरण है। बाद के वर्षों में भी 25 करोड़ रुपये, 5 करोड़ रुपये, 2.5 करोड़ रुपये, 2 करोड़ रुपये और 1 करोड़ रुपये जैसे बड़े योगदान सामने आए हैं।
लेकिन राज्य गठन से अब तक का संपूर्ण आय-व्यय लेखा सार्वजनिक किए बिना यह तय करना संभव नहीं है कि कुल कितना पैसा आया, कितना खर्च हुआ और कितना बचा।
इसलिए सरकार से कोई आरोप नहीं, एक सीधी मांग होनी चाहिए—
‘उत्तराखंड मुख्यमंत्री राहत कोष का वर्ष 2000 से 2026 तक का पूरा ऑडिटेड हिसाब जनता के सामने रखिए।’
किस मुख्यमंत्री के कार्यकाल में कितना आया, कितना खर्च हुआ, किन मदों में खर्च हुआ, कितने लोगों को सहायता मिली और आज कोष में कितनी रकम शेष है—इन पांच सवालों का जवाब सार्वजनिक हो जाए तो मुख्यमंत्री राहत कोष को लेकर उठने वाली अधिकांश आशंकाएं अपने आप समाप्त हो जाएंगी।
जनता ने पैसा विश्वास से दिया है। उस विश्वास का पूरा हिसाब भी जनता के सामने होना चाहिए।
उत्तराखंड मुख्यमंत्री राहत कोष: 26 साल में कितना आया, कितना खर्च हुआ? सरकार के पास जनता के हर रुपये का हिसाब है या नहीं?
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | विशेष पड़ताल
अवतार सिंह बिष्ट
