संपादकीय: पीएम केयर्स फंड में बढ़ती रकम और घटते खर्च के बीच पारदर्शिता का सवालहिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | संपादकीयअवतार सिंह बिष्ट

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कोविड-19 महामारी के भयावह दौर में जब देश स्वास्थ्य संकट, आर्थिक कठिनाइयों और अनिश्चितता से जूझ रहा था, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पीएम केयर्स फंड की स्थापना आपदा और आपात परिस्थितियों में राहत पहुंचाने के उद्देश्य से की गई। उस समय देशवासियों और संस्थानों ने इस पहल को संकट की घड़ी में सामूहिक सहयोग के एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देखा। आज छह वर्ष से अधिक समय बाद इस फंड की वित्तीय तस्वीर एक गंभीर सवाल सामने रखती है—जब फंड में हजारों करोड़ रुपये उपलब्ध हैं, तब आपदा और जनकल्याण के लिए उसका इस्तेमाल इतना सीमित क्यों है?
उपलब्ध ऑडिट आंकड़ों के अनुसार 31 मार्च 2025 तक पीएम केयर्स फंड में करीब 8,452 करोड़ रुपये जमा थे। इनमें लगभग 7,846 करोड़ रुपये यानी कुल राशि का करीब 93 प्रतिशत फिक्स्ड डिपॉजिट में रखा गया था। दूसरी ओर, वित्त वर्ष 2024-25 में इस फंड से महज 87.85 लाख रुपये खर्च किए गए। इसमें करीब 87.84 लाख रुपये पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रन योजना पर और 451 रुपये बैंक तथा एसएमएस शुल्क पर खर्च हुए।
यह आंकड़ा अपने आप में चिंता पैदा करने वाला है। किसी भी राहत कोष की उपयोगिता उसकी राशि जमा करने में नहीं, बल्कि जरूरतमंद लोगों तक समय पर सहायता पहुंचाने में होती है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में हर वर्ष बाढ़, भूस्खलन, चक्रवात, बादल फटने, भूकंप और अन्य प्राकृतिक आपदाएं आती हैं। ऐसे में हजारों करोड़ रुपये का बड़ा हिस्सा सुरक्षित निवेश में पड़ा रहे और खर्च लगातार घटता जाए, तो स्वाभाविक रूप से व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल उठेंगे।
खर्च के आंकड़ों पर नजर डालें तो वित्त वर्ष 2020-21 में करीब 3,976.17 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। 2021-22 में यह राशि 3,716.29 करोड़ रुपये रही। 2022-23 में खर्च घटकर 437.87 करोड़ रुपये रह गया और 2023-24 में करीब 15.59 करोड़ रुपये खर्च हुए। इसके बाद 2024-25 में खर्च महज 87.85 लाख रुपये तक सिमट गया। यानी फंड में राशि बढ़ती रही, जबकि खर्च का दायरा लगातार सिकुड़ता गया।
यहां सरकार के सामने सबसे बड़ा प्रश्न पारदर्शिता का है। फंड में धन कहां से आया, किस संस्था या व्यक्ति ने कितना योगदान दिया, किन परियोजनाओं के लिए राशि स्वीकृत हुई, किस एजेंसी को कितना पैसा दिया गया और उसका परिणाम क्या रहा—इन सवालों के स्पष्ट और नियमित सार्वजनिक जवाब लोकतांत्रिक व्यवस्था में भरोसा मजबूत करते हैं।
वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान फंड को घरेलू स्रोतों से करीब 479.04 करोड़ रुपये का दान मिला। विदेशों से लगभग 92 लाख रुपये प्राप्त हुए। इसके अतिरिक्त 475.14 करोड़ रुपये ब्याज से आए, जिसमें अधिकांश राशि फिक्स्ड डिपॉजिट से मिली। करीब 324.65 करोड़ रुपये एजेंसियों से रिफंड के रूप में वापस आए। यही रिफंड भी एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है कि यह राशि किन परियोजनाओं के लिए जारी हुई थी और किन परिस्थितियों में वापस आई?
रिफंड का मतलब हमेशा अनियमितता नहीं होता। किसी परियोजना की लागत कम होने, योजना बदलने या निर्धारित कार्य पूरा होने के बाद बची राशि लौटने जैसी सामान्य वजहें भी हो सकती हैं। मगर समस्या तब पैदा होती है जब जनता को पर्याप्त विवरण उपलब्ध नहीं कराया जाता। लोकतंत्र में केवल ऑडिट रिपोर्ट जारी कर देना पारदर्शिता की अंतिम सीमा नहीं हो सकती। ऑडिट के साथ यह भी बताया जाना चाहिए कि धन का वास्तविक उपयोग कहां हुआ और उसका सामाजिक परिणाम क्या रहा।
पीएम केयर्स फंड की संरचना को लेकर भी लंबे समय से बहस होती रही है। प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष हैं और रक्षा मंत्री, गृह मंत्री तथा वित्त मंत्री इसके ट्रस्टी हैं। इसलिए आम नागरिक की अपेक्षा स्वाभाविक है कि इस फंड के संचालन, निर्णय प्रक्रिया और धन के इस्तेमाल की जानकारी अधिकतम स्पष्टता के साथ सामने आए।
सूचना के अधिकार के दायरे को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं। यदि किसी संस्था का संचालन देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों से जुड़ा है और उसमें बड़े पैमाने पर जनता तथा कॉरपोरेट क्षेत्र से योगदान आता है, तो पारदर्शिता का स्तर भी उसी अनुपात में ऊंचा होना चाहिए। सरकार की ओर से यह तर्क दिया जाता रहा है कि पीएम केयर्स एक अलग सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट है। इस कानूनी स्थिति के बावजूद जनता का सवाल अपनी जगह कायम है—अगर फंड का उद्देश्य सार्वजनिक हित और आपदा राहत है, तो उसके संचालन से जुड़ी अधिक से अधिक जानकारी सार्वजनिक करने में समस्या क्या है?
यहां एक और महत्वपूर्ण बात समझनी होगी। पारदर्शिता की मांग का अर्थ यह मान लेना नहीं है कि फंड में कोई अनियमितता हुई है। बिना प्रमाण किसी संस्था या व्यक्ति पर आरोप लगाना उचित नहीं। मगर पारदर्शिता ऐसी व्यवस्था है जो आरोपों की गुंजाइश को कम करती है और विश्वास को मजबूत करती है। यदि धन का इस्तेमाल नियमों के अनुसार हो रहा है, तो दान और खर्च का विस्तृत विवरण सार्वजनिक होने से संस्था की विश्वसनीयता ही बढ़ेगी।
देश में आपदा प्रबंधन के लिए कई सरकारी तंत्र और कोष पहले से मौजूद हैं। इसलिए पीएम केयर्स फंड के कम खर्च को केवल आंकड़े के आधार पर गलत ठहराना भी उचित नहीं होगा। यह भी संभव है कि सरकार ने राहत और पुनर्वास के लिए अन्य बजटीय माध्यमों का उपयोग किया हो। मगर तब जनता को यह समझाया जाना चाहिए कि पीएम केयर्स फंड की विशिष्ट भूमिका क्या है और किन परिस्थितियों में इससे राशि जारी की जाती है।
आज सबसे जरूरी जरूरत एक स्पष्ट सार्वजनिक व्यवस्था की है। फंड की निर्णय प्रक्रिया, राशि आवंटन के मानदंड, प्राप्त दान का विस्तृत वर्गीकरण, परियोजनाओं के नाम, लाभार्थियों की संख्या, जारी राशि, उपयोग प्रमाण और वापस आई रकम का कारण नियमित रूप से सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इससे सरकार पर भी अनावश्यक सवालों का दबाव कम होगा और जनता का भरोसा मजबूत होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने डिजिटल पारदर्शिता, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और सार्वजनिक वित्तीय निगरानी को शासन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है। उसी कसौटी पर पीएम केयर्स फंड को भी अधिक पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। हजारों करोड़ रुपये की राशि किसी फंड में जमा रहना अपने आप में उपलब्धि नहीं है। संकट के समय जरूरतमंद नागरिक तक सहायता पहुंचना ही उसकी वास्तविक सफलता है।
पीएम केयर्स फंड की स्थापना जिस भावना से हुई थी, वह भावना आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। इसलिए सरकार को चाहिए कि वह बढ़ती जमा राशि और घटते खर्च के बीच उठ रहे सवालों का विस्तृत, तथ्यात्मक और सार्वजनिक जवाब दे। आखिर यह केवल एक फंड का मामला नहीं है, यह जनता के विश्वास का प्रश्न है। लोकतंत्र में विश्वास जितना पारदर्शी होगा, व्यवस्था उतनी ही मजबूत होगी।


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