कुत्तों की खाप का बढ़ता साम्राज्य: रुद्रपुर से पिथौरागढ़ तक आवारा कुत्तों के आतंक में कैद उत्तराखंड:रेबीज के संदिग्ध मामलों से दहशत, सड़कों पर झुंडों का कब्जा, बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा पर सवाल—क्या उत्तराखंड में आवारा कुत्तों का संकट नियंत्रण से बाहर हो चुका है?

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उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के धारचूला क्षेत्र में रेबीज के दो संदिग्ध मामलों ने पूरे राज्य को झकझोर दिया है। जुम्मा गांव के एक किशोर की मौत के बाद उसी गांव के आठवीं कक्षा के छात्र में भी रेबीज जैसे लक्षण मिलने से स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ गई है। बताया जा रहा है कि दोनों किशोरों को एक ही लावारिस कुत्ते के पिल्ले ने काटा था। यह कुत्ता गांव के पांच लोगों को काट चुका था।
लेकिन यह कहानी केवल पिथौरागढ़ की नहीं है। राज्य के मैदानी शहरों से लेकर पहाड़ी कस्बों तक एक ऐसा संकट तेजी से बढ़ रहा है जिस पर प्रशासनिक बैठकों में चर्चा तो होती है, लेकिन समाधान दिखाई नहीं देता। रुद्रपुर, काशीपुर, हल्द्वानी, किच्छा, हरिद्वार, देहरादून और नैनीताल जैसे शहरों में आवारा कुत्तों के झुंड अब शहरी जीवन का स्थायी हिस्सा बन चुके हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड


हर 200 मीटर पर एक झुंड
रुद्रपुर की सड़कों पर सुबह या रात के समय निकलने वाला कोई भी व्यक्ति इस सच्चाई को महसूस कर सकता है। शहर की कॉलोनियों, मुख्य मार्गों, बाजारों और औद्योगिक क्षेत्रों में लगभग हर 200 से 300 मीटर पर कुत्तों का एक अलग झुंड दिखाई देता है।
स्थानीय लोग बताते हैं कि इन झुंडों की अपनी सीमाएं होती हैं। जिस तरह गांवों में कभी खाप पंचायतों का प्रभाव क्षेत्र हुआ करता था, उसी तरह शहरों में कुत्तों के झुंडों ने अपनी-अपनी “सरहदें” तय कर रखी हैं। एक क्षेत्र का झुंड दूसरे क्षेत्र में घुसने वाले कुत्ते को स्वीकार नहीं करता।
पशु व्यवहार विशेषज्ञ भी मानते हैं कि कुत्ते स्वाभाविक रूप से क्षेत्रीय (टेरिटोरियल) प्रवृत्ति रखते हैं। वे अपने इलाके की रक्षा करते हैं और बाहरी गतिविधियों पर आक्रामक प्रतिक्रिया देते हैं।
बाइक और कारों के पीछे क्यों भागते हैं कुत्ते?
रुद्रपुर, किच्छा और हल्द्वानी में बाइक चालकों की सबसे आम शिकायत है कि अचानक कुत्तों का झुंड उनके पीछे दौड़ पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई कारण हैं—
क्षेत्रीय सुरक्षा की प्रवृत्ति
तेज गति से चलने वाली वस्तुओं के प्रति प्रतिक्रिया
शिकार जैसी प्रवृत्ति
झुंड की सामूहिक मानसिकता
अक्सर एक कुत्ता भौंकना शुरू करता है और देखते ही देखते पूरा झुंड वाहन के पीछे दौड़ पड़ता है। कई बार इससे दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं।
कॉलोनियों में बढ़ता कब्जा
रुद्रपुर की ट्रांजिट कैंप, आदर्श कॉलोनी, आवास विकास, सिडकुल क्षेत्र, डीडी चौक, गांधी पार्क, जगतपुरा और फुलसुंगा जैसे इलाकों में लोग रात के समय अकेले निकलने से डरने लगे हैं।
कई कॉलोनियों में बच्चों को पार्क में खेलने भेजने से पहले माता-पिता आसपास कुत्तों की स्थिति देखते हैं। बुजुर्ग सुबह की सैर के दौरान डंडा लेकर निकलते हैं।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि नगर निगम समय-समय पर नसबंदी अभियान चलाता है लेकिन आबादी की वृद्धि की गति कहीं अधिक तेज है।
सोशल मीडिया पर दर्दनाक तस्वीरें
पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया पर देशभर से ऐसी अनेक तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं जिनमें आवारा कुत्तों द्वारा बच्चों पर हमले दिखाई देते हैं।
कहीं स्कूल जाते बच्चे को घेर लिया जाता है, कहीं पार्क में खेल रहे मासूम पर हमला होता है, तो कहीं नवजात शिशु तक को नहीं बख्शा जाता।
उत्तराखंड में भी कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं जहां छोटे बच्चों को गंभीर चोटें आई हैं।
इन घटनाओं ने लोगों के मन में भय पैदा कर दिया है।
पशु प्रेम और जन सुरक्षा के बीच संघर्ष
आवारा कुत्तों का मुद्दा केवल सुरक्षा का प्रश्न नहीं है बल्कि एक सामाजिक और नैतिक बहस भी है।
एक पक्ष का कहना है कि कुत्तों को मारना समाधान नहीं हो सकता। वे भी जीवित प्राणी हैं और उन्हें संरक्षण मिलना चाहिए।
दूसरा पक्ष सवाल उठाता है कि यदि नागरिकों, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाए तो प्रशासन की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए?
इसी बहस के बीच सरकारें और स्थानीय निकाय अक्सर संतुलन बनाने की कोशिश करते दिखाई देते हैं।
रेबीज: सबसे बड़ा खतरा
आवारा कुत्तों के बढ़ते संकट का सबसे भयावह पहलू रेबीज है।
रेबीज एक घातक वायरल बीमारी है। एक बार इसके लक्षण प्रकट हो जाएं तो रोगी को बचाना लगभग असंभव माना जाता है।
चिकित्सकों के अनुसार कुत्ते के काटने के बाद तत्काल घाव को साबुन और पानी से धोना तथा एंटी रेबीज वैक्सीन लगवाना बेहद जरूरी है।
पिथौरागढ़ के हालिया मामले ने एक बार फिर इस खतरे को सामने ला दिया है।
देहरादून और हरिद्वार की चुनौती
राजधानी देहरादून में आवारा कुत्तों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कई रिहायशी इलाकों में लोग शिकायत करते हैं कि रात में कुत्तों के झुंड सड़कों पर कब्जा कर लेते हैं।
हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे धार्मिक नगरों में श्रद्धालुओं की भारी आवाजाही रहती है। यहां भी आवारा कुत्तों की मौजूदगी कई बार सुरक्षा और स्वच्छता की चुनौती बन जाती है।
हल्द्वानी और नैनीताल में बढ़ती शिकायतें
कुमाऊं के सबसे बड़े शहर हल्द्वानी में आवारा कुत्तों को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं।
बस अड्डों, बाजारों, अस्पतालों और स्कूलों के आसपास कुत्तों के झुंड आम दृश्य बन चुके हैं।
नैनीताल में पर्यटन सीजन के दौरान स्थिति और जटिल हो जाती है क्योंकि पर्यटकों और स्थानीय आबादी दोनों का दबाव बढ़ जाता है।
प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल
विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल नसबंदी या केवल पकड़ने की कार्रवाई से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा।
इसके लिए बहुस्तरीय रणनीति की जरूरत है—
व्यापक नसबंदी अभियान
नियमित एंटी रेबीज टीकाकरण
कूड़ा प्रबंधन में सुधार
पशु आश्रय गृहों की स्थापना
नागरिक जागरूकता अभियान
स्कूलों में रेबीज और पशु सुरक्षा की शिक्षा
क्या उत्तराखंड किसी बड़े संकट की ओर बढ़ रहा है?
पिथौरागढ़ के गांव से लेकर रुद्रपुर की कॉलोनियों तक एक सवाल लगातार उठ रहा है—क्या हम समस्या के बढ़ने का इंतजार कर रहे हैं?
जब किसी गांव में एक ही कुत्ता पांच लोगों को काट देता है, जब शहरों में बच्चे स्कूल जाते समय झुंडों से बचते हुए निकलते हैं, जब बाइक सवार रोज दुर्घटना के खतरे का सामना करते हैं और जब रेबीज जैसे जानलेवा रोग के मामले सामने आते हैं, तब यह केवल पशु प्रबंधन का विषय नहीं रह जाता।
यह सार्वजनिक स्वास्थ्य, नागरिक सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न बन जाता है।
उत्तराखंड की सड़कों पर आज एक अदृश्य संघर्ष चल रहा है। एक तरफ तेजी से बढ़ती आवारा कुत्तों की आबादी है, दूसरी तरफ सुरक्षित जीवन की उम्मीद लगाए नागरिक। पिथौरागढ़ के रेबीज संदिग्ध मामलों ने चेतावनी की घंटी बजा दी है। अब देखना यह है कि सरकार, नगर निकाय और समाज इस चुनौती का सामना मिलकर करते हैं या फिर अगली दुखद खबर का इंतजार करते हैं।


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