शिक्षा विभाग में तबादलों का खेल: दुर्गम में शिक्षक रिटायर, सुगम में पूरी नौकरी—क्या 2017 की तबादला नीति सिर्फ कागजों तक सीमित?

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हल्द्वानी। उच्च शिक्षा विभाग में 500 से अधिक शिक्षकों के तबादलों के बाद एक बार फिर उत्तराखंड की तबादला व्यवस्था सवालों के घेरे में आ गई है। जहां एक ओर महाविद्यालयों में बड़े पैमाने पर स्थानांतरण किए गए हैं, वहीं दूसरी ओर प्राथमिक, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में वर्षों से जमे शिक्षकों को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड


शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि वर्ष 2017 में लागू की गई तबादला नीति का उद्देश्य दुर्गम और सुगम क्षेत्रों में संतुलन बनाना था, लेकिन धरातल पर इसके उलट तस्वीर दिखाई देती है। राज्य के कई दुर्गम विद्यालयों में शिक्षक वर्षों तक सेवा देने के बाद सेवानिवृत्त हो जाते हैं, जबकि कुछ शिक्षक पूरी नौकरी सुगम क्षेत्रों में ही बिताने में सफल रहते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों के अभिभावकों और जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि शिक्षा विभाग में तबादलों के मानकों का समान रूप से पालन नहीं हो रहा। दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षकों की कमी से छात्रों की पढ़ाई प्रभावित होती है, जबकि मैदानी और शहरी क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक शिक्षक तैनात रहते हैं। इससे शिक्षा की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
उच्च शिक्षा विभाग में हुए हालिया तबादलों के बीच यह मांग भी उठने लगी है कि प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा विभाग में भी पारदर्शी और समयबद्ध स्थानांतरण प्रक्रिया लागू की जाए। जिन शिक्षकों की दुर्गम सेवा की निर्धारित अवधि पूरी हो चुकी है, उन्हें नियमानुसार सुगम क्षेत्रों में अवसर मिले और लंबे समय से सुगम क्षेत्रों में तैनात शिक्षकों को दुर्गम क्षेत्रों में भेजा जाए।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तबादला नीति का निष्पक्ष और पारदर्शी क्रियान्वयन नहीं हुआ तो शिक्षा व्यवस्था में असंतुलन बढ़ता जाएगा। राज्य के दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक है कि तबादला प्रक्रिया को प्रभावी बनाया जाए और किसी भी स्तर पर पक्षपात या अनियमितता की जांच हो।

संस्कृत पढ़ने वाले छात्र मझधार में

स्नातक में संस्कृत के प्राध्यापक का ट्रांसफर तो कर दिया, लेकिन उनकी जगह पढ़ाने के लिए कोई प्राध्यापक नहीं भेजा है। ऐसे में संस्कृत पढ़ने वाले छात्र मझधार में हैं।

महाविद्यालय के 20 प्राध्यापकों के बाजपुर, द्वाराहाट, रूद्रपुर, गणाई गंगोली, काशीपुर, मानिला, गोपेश्वर, रानीखेत, कर्णप्रयाग, लोहाघाट, जयहरीखाल, अगस्त्यमुनिक, नैनीडांडा, बेरीनाग, उत्तरकाशी ट्रांसफर हुए हैं, जबकि रसायन विज्ञान के संविदा प्राध्यापक भी नए प्राध्यापक के आने से प्रभावित हो गए हैं।

महाविद्यालय में स्नातक स्तर पर संस्कृत पढ़ाने के लिए कोई भी प्राध्यापक नहीं आए हैं। समाजशास्त्र विषय में दो का ट्रांसफर हुआ तो एक ही प्राध्यापक भेजा। भूगोल विषय के दो प्राध्यापक का ट्रांसफर किया तो एक ही प्राध्यापक भेजा है।

इसी तरह वनस्पति विज्ञान में भी तीन प्राध्यापकों का ट्रांसफर हुआ है, उनकी जगह दो ही प्राध्यापक भेजे हैं। 10 जुलाई तक सेमेस्टर परीक्षाएं चल रही हैं, चूंकि ट्रांसफर के बाद नई जगह पर प्राध्यापकों की ज्वाइनिंग लेने से भी परीक्षा में परेशानी हो सकती है।


शिक्षकों और अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा विभाग को तबादलों के मामले में जवाबदेही तय करनी होगी, ताकि दुर्गम क्षेत्रों के बच्चों को भी समान शैक्षिक अवसर मिल सकें और शिक्षा व्यवस्था पर जनता का विश्वास मजबूत हो।

एसआईआर में लगे प्राध्यापकों को कार्यमुक्त करने को लिखा पत्र

रामनगर: महाविद्यालय में चार प्राध्यापकों की ड्यूटी एसआईआर में लगी थी। उनका ट्रांसफर हो गया है। उन्हें कार्यमुक्त करने के लिए महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. एमसी पांडे की ओर से प्राध्यापकों को एसआईआर आर की ड्यूटी से कार्यमुक्त करने के लिए पत्र लिखा है।


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