सोने से पेट्रोल तक महंगाई का सवाल: क्या कांग्रेस की वापसी से लौटेंगे पुराने दिन? जनता को सस्ती चीजों, रोजगार और आर्थिक राहत की उम्मीद,  अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर


देश में सोने की कीमतों में प्रति 10 ग्राम करीब 10 हजार रुपये की गिरावट की खबर ने एक बार फिर आम आदमी की जेब, महंगाई और सरकार की आर्थिक नीतियों पर बहस तेज कर दी है। कभी सोना शादी-ब्याह और पारिवारिक बचत का भरोसेमंद सहारा माना जाता था, लेकिन आज इसकी कीमतें आम परिवारों के बजट को चुनौती दे रही हैं। पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, खाद्य पदार्थ, मकान बनाने की सामग्री, शिक्षा और रोजगार की चिंता भी लगातार राजनीतिक चर्चा के केंद्र में बनी हुई है।

अवतार सिंह बिष्ट,हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | उत्तराखंड, देश-दुनिया और जन सरोकारों की खबरों पर नजर


ऐसे में एक बड़ा सवाल जनता के सामने है—जब देश में कांग्रेस की सरकार थी, तब सोने और रोजमर्रा की जरूरतों के दाम क्या थे? भाजपा के शासनकाल में ये कीमतें कहां पहुंच गईं? और यदि भविष्य में कांग्रेस की सरकार बनती है, तो क्या आम आदमी को पुराने दिनों जैसी आर्थिक राहत मिल सकती है?
इस सवाल का जवाब केवल राजनीतिक नारों में नहीं, बल्कि आंकड़ों, सरकारी नीतियों और जनता की क्रय शक्ति में छिपा है।
सोने की कीमतों ने बढ़ाई चिंता, लेकिन निवेशकों के सामने नया अवसर
दिए गए बाजार विवरण के अनुसार, 24 कैरेट सोने का भाव 21 सितंबर को 1,57,585 रुपये प्रति 10 ग्राम था, जो 21 अक्टूबर के आसपास घटकर 1,47,805 रुपये प्रति 10 ग्राम बताया गया। यानी करीब 9,780 रुपये की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि सोने की कीमतें शहर, कर, शुद्धता और कारोबारी दरों के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।
सोने की कीमतों में गिरावट से उन परिवारों को कुछ राहत मिल सकती है जो दिवाली, धनतेरस और शादी के लिए आभूषण खरीदने की योजना बना रहे हैं। लेकिन यह गिरावट अपने आप में इस बात की गारंटी नहीं है कि सोना आगे भी सस्ता होता जाएगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार, डॉलर की मजबूती, ब्याज दरें, केंद्रीय बैंकों की खरीद और भू-राजनीतिक तनाव इसके भाव को प्रभावित करते हैं।
यही कारण है कि सोने की कीमत को किसी एक सरकार की सफलता या विफलता का अकेला प्रमाण मानना उचित नहीं होगा। फिर भी, जब कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो आम परिवार के लिए आभूषण खरीदना कठिन हो जाता है और आर्थिक नीतियों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
कांग्रेस के दौर में कितना था सोना, आज कहां पहुंचा?
कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का कार्यकाल 2004 से 2014 तक रहा। इस अवधि में सोने की कीमतों में भी लगातार बदलाव आया। 2004 के आसपास भारत में 24 कैरेट सोने का भाव मोटे तौर पर 6,000 से 7,000 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर था। 2014 तक यह बढ़कर लगभग 28,000 से 31,000 रुपये प्रति 10 ग्राम के दायरे में पहुंच गया था। ये ऐतिहासिक बाजार के अनुमानित स्तर हैं, न कि हर शहर की एक समान आधिकारिक दर।
इसके बाद 2014 से भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के कार्यकाल में सोने की कीमतों में भी बड़ी वृद्धि हुई। 2024-25 तक कई बाजारों में भाव एक लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास या उससे ऊपर पहुंचने लगे और अक्टूबर 2026 में दिए गए बाजार विवरण के अनुसार यह करीब 1.48 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम था।
इन आंकड़ों से एक बात स्पष्ट होती है: सोने की कीमत कांग्रेस के शासनकाल में भी बढ़ी थी और भाजपा के शासनकाल में भी बढ़ी है, लेकिन दोनों अवधियों में अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियां, रुपये की विनिमय दर, आयात शुल्क, मुद्रास्फीति और वैश्विक मांग अलग-अलग रही हैं।
जनता के लिए असली सवाल यह है कि उसकी आमदनी की तुलना में जरूरी चीजें कितनी महंगी हुईं और उसकी बचत कितनी बची। यदि वेतन और रोजगार की वृद्धि महंगाई से पीछे रह जाए, तो कमाने वाला व्यक्ति भी आर्थिक दबाव महसूस करता है।
पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस: घर का बजट क्यों बिगड़ता है?
आम परिवार के लिए सोने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, दूध, दाल, खाद्य तेल और सब्जियों के दाम हैं। पेट्रोल-डीजल महंगा होने पर परिवहन लागत बढ़ सकती है, जिसका असर सामान को बाजार तक पहुंचाने की लागत पर पड़ता है। इसी तरह बिजली, गैस और खाद्य पदार्थों की कीमतें घरेलू बजट पर सीधा असर डालती हैं।
2004 से 2014 के बीच भी पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी हुई थी। उस समय अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, रुपये की कमजोरी और सरकारी सब्सिडी का बोझ बड़ी आर्थिक चुनौतियां थीं। 2014 के बाद भी ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव, कर व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों ने आम उपभोक्ता को प्रभावित किया।
इसलिए कांग्रेस के शासनकाल के किसी एक वर्ष का भाव लेकर उसकी तुलना आज से करना पर्याप्त नहीं होगा। सही तुलना के लिए एक ही शहर, समान गुणवत्ता, समान कर व्यवस्था और समान अवधि के आंकड़ों को देखना जरूरी है। इसके बावजूद महंगाई पर राहत देना किसी भी सरकार की प्रमुख जिम्मेदारी है।