उत्तराखंड में आखिर क्या चल रहा है? सरकार की नाक के नीचे 13.83 करोड़ का छात्रवृत्ति घोटाला, हजारों फर्जी छात्रों के नाम पर डकार गए करोड़ों रुपये

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रुद्रपुर,देहरादून उत्तराखंड में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के गरीब छात्रों के लिए चलाई गई पोस्ट मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना में सामने आया घोटाला केवल वित्तीय अनियमितता नहीं है, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा 13.83 करोड़ रुपये की संपत्तियों को कुर्क किए जाने के बाद यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो गया है कि आखिर राज्य में इतने बड़े स्तर पर फर्जीवाड़ा वर्षों तक कैसे चलता रहा और जिम्मेदार अधिकारियों ने इसे रोकने के लिए क्या किया?
जिन छात्रों के लिए सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही थी, उनमें से हजारों छात्र या तो अस्तित्व में ही नहीं थे, विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड में दर्ज नहीं थे, कक्षाओं में उपस्थित नहीं थे, परीक्षा में असफल हो चुके थे या ऐसे पाठ्यक्रमों में दाखिल दिखाए गए थे जिन्हें मान्यता ही प्राप्त नहीं थी। इसके बावजूद करोड़ों रुपये की छात्रवृत्ति जारी होती रही और सरकारी खजाने से पैसा निकलकर निजी संस्थानों के खातों तक पहुंचता रहा।
छह वर्षों तक चलता रहा खेल
ईडी की जांच के अनुसार वर्ष 2011-12 से 2016-17 के बीच समाज कल्याण विभाग के माध्यम से छात्रवृत्ति की राशि जारी की गई। जांच के दायरे में आए निजी शिक्षण संस्थानों में रुड़की और हरिद्वार स्थित संस्थान प्रमुख रूप से शामिल हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि फर्जीवाड़ा एक-दो महीने नहीं बल्कि छह वर्षों तक चला, तो क्या विभागीय अधिकारियों, जिला समाज कल्याण कार्यालय और संबंधित निगरानी तंत्र को इसकी भनक तक नहीं लगी?
जांच में सामने आया कि हरिद्वार के तत्कालीन जिला समाज कल्याण अधिकारी के माध्यम से 6208 छात्रवृत्ति दावों को मंजूरी दी गई। इन दावों के आधार पर कुल 27.98 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई।
इनमें:
19.74 करोड़ रुपये सीधे शिक्षण संस्थानों के खातों में गए।
8.24 करोड़ रुपये छात्रों के खातों में भेजे गए।
लेकिन जब रिकॉर्ड की जांच हुई तो तस्वीर चौंकाने वाली निकली।
6208 दावे, 2895 पूरी तरह फर्जी
ईडी की जांच के अनुसार कुल 6208 छात्रवृत्ति दावों में से 2895 दावे पूरी तरह फर्जी पाए गए। इन फर्जी दावों के आधार पर 13.83 करोड़ रुपये निकाले गए।
अर्थात लगभग हर दूसरा दावा संदिग्ध या फर्जी निकला।
यह कोई छोटी प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि व्यवस्था की व्यापक विफलता का संकेत है।
आंकड़े जो पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा करते हैं
जांच में निम्नलिखित तथ्य सामने आए—
668 छात्र अनुपस्थित
ऐसे 668 छात्र मिले जो नियमित रूप से अनुपस्थित थे या जिनकी वास्तविक उपस्थिति नहीं थी।
इनके नाम पर ली गई छात्रवृत्ति:
3.85 करोड़ रुपये
84 छात्रों का रिकॉर्ड ही नहीं
84 छात्र ऐसे पाए गए जो परीक्षा में असफल थे या जिनसे संबंधित परीक्षा रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था।
इनके नाम पर ली गई छात्रवृत्ति:
33.65 लाख रुपये
1662 छात्र विश्वविद्यालय रिकॉर्ड में दर्ज नहीं
यह सबसे बड़ा खुलासा माना जा रहा है।
1662 छात्र ऐसे मिले जिनका विश्वविद्यालय रिकॉर्ड में कोई अस्तित्व ही नहीं था।
इनके नाम पर प्राप्त छात्रवृत्ति:
7.34 करोड़ रुपये
47 छात्र गैर-मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रमों में
47 छात्रों को ऐसे कोर्स में दाखिल दिखाया गया जो विश्वविद्यालय से संबद्ध ही नहीं थे।
434 छात्र कॉलेज रिकॉर्ड में नहीं
434 छात्र ऐसे पाए गए जो कॉलेज रिकॉर्ड में मौजूद नहीं थे या डुप्लीकेट रिकॉर्ड के रूप में पाए गए।
छात्रों के खाते, नियंत्रण कॉलेज प्रबंधन के हाथ
जांच में सामने आया कि कई मामलों में छात्रों के नाम पर बैंक खाते खोले गए लेकिन इन खातों का संचालन छात्रों द्वारा नहीं बल्कि कॉलेज प्रबंधन और कर्मचारियों द्वारा किया जा रहा था।
कई खातों में एक ही मोबाइल नंबर दर्ज था।
यह तथ्य अपने आप में बैंकिंग और प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर करता है।
ईडी के अनुसार छात्रवृत्ति की राशि खाते में पहुंचते ही उसे या तो कॉलेज खातों में ट्रांसफर कर दिया जाता था या फिर नकद निकाल लिया जाता था।
यानी गरीब छात्रों के लिए भेजा गया पैसा छात्रों तक पहुंचने से पहले ही रास्ते में गायब हो रहा था।
सबसे बड़ा सवाल—जिम्मेदार कौन?
किसी भी छात्रवृत्ति को मंजूरी देने से पहले कई स्तरों पर जांच की व्यवस्था होती है।
संस्थान सत्यापन करता है।
जिला समाज कल्याण कार्यालय सत्यापन करता है।
विश्वविद्यालय रिकॉर्ड उपलब्ध रहता है।
बैंक खातों का सत्यापन होता है।
विभागीय अधिकारी भुगतान की अनुमति देते हैं।
जब इतनी सारी प्रक्रियाएं मौजूद थीं तो हजारों फर्जी छात्र वर्षों तक सिस्टम में कैसे बने रहे?
क्या किसी अधिकारी ने दस्तावेजों की जांच नहीं की?
क्या उपस्थिति रिकॉर्ड नहीं देखा गया?
क्या विश्वविद्यालयों से मिलान नहीं कराया गया?
क्या बैंक खातों की जांच नहीं हुई?
यदि हुई तो फर्जीवाड़ा कैसे हुआ?
यदि नहीं हुई तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
गरीबों का हक लूटने का मामला
यह मामला केवल सरकारी धन के दुरुपयोग का नहीं है।
यह उन एससी और एसटी छात्रों के अधिकारों पर डाका है जिनके लिए यह योजना बनाई गई थी।
सरकार का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को उच्च शिक्षा में सहायता देना था।
लेकिन जांच से संकेत मिलता है कि योजना का लाभ बड़ी संख्या में पात्र छात्रों के बजाय कथित तौर पर फर्जी रिकॉर्ड तैयार कर निजी संस्थानों और उनसे जुड़े लोगों तक पहुंचाया गया।
नौकरशाही की भूमिका पर उठते सवाल
जांच एजेंसियों की कार्रवाई के बाद अब सबसे ज्यादा सवाल नौकरशाही की जवाबदेही पर उठ रहे हैं।
क्योंकि कोई भी वित्तीय घोटाला केवल निजी संस्थानों के दम पर नहीं चल सकता जब तक निगरानी व्यवस्था पूरी तरह विफल न हो जाए या कुछ स्तरों पर मिलीभगत न हो।
यही कारण है कि जनता अब यह जानना चाहती है—
किस अधिकारी ने फाइलों को मंजूरी दी?
किस स्तर पर सत्यापन हुआ?
फर्जी छात्रों की पहचान पहले क्यों नहीं हुई?
विभागीय ऑडिट ने क्या पाया?
क्या जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी कठोर कार्रवाई होगी?
ईडी की कार्रवाई से खुल रही परतें
ईडी द्वारा 13.83 करोड़ रुपये की संपत्तियों की कुर्की इस बात का संकेत है कि जांच केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं है।
कुर्क की गई संपत्तियों में हरिद्वार और रुड़की स्थित भूमि, शैक्षणिक भवन तथा फिक्स्ड डिपॉजिट शामिल हैं।
इस कार्रवाई से यह संदेश गया है कि यदि सरकारी योजनाओं के धन का दुरुपयोग किया जाएगा तो उसकी आर्थिक कीमत भी चुकानी पड़ेगी।
क्या यह सिर्फ एक घोटाला है?
विशेषज्ञ मानते हैं कि छात्रवृत्ति घोटाले का मामला केवल एक संस्थान या एक जिले तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए।
यह पूरे कल्याणकारी तंत्र की निगरानी व्यवस्था की परीक्षा है।
यदि हजारों फर्जी छात्र वर्षों तक सरकारी रिकॉर्ड में बने रह सकते हैं, तो यह जांच का विषय है कि अन्य योजनाओं में भी कहीं इसी प्रकार की कमियां तो नहीं हैं।
जनता जवाब चाहती है
ईडी की कार्रवाई ने घोटाले का वित्तीय पक्ष सामने ला दिया है, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न अभी भी बाकी है।
उत्तराखंड की जनता यह जानना चाहती है कि गरीब दलित और आदिवासी छात्रों के लिए भेजे गए करोड़ों रुपये आखिर किसकी लापरवाही, संरक्षण या मिलीभगत से गलत हाथों तक पहुंचे।
जब तक जिम्मेदार अधिकारियों, संस्थान संचालकों और संबंधित व्यक्तियों पर निर्णायक कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह मामला केवल एक घोटाले की खबर नहीं बल्कि शासन और प्रशासन की विश्वसनीयता पर लगा एक गंभीर प्रश्नचिह्न बना रहेगा।
आज सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या उत्तराखंड में कल्याणकारी योजनाओं का पैसा वास्तव में जरूरतमंदों तक पहुंच रहा है, या फिर भ्रष्ट तंत्र गरीबों के हक पर डाका डालने में लगा हुआ है?
ईडी की ताजा कार्रवाई ने इस सवाल को और अधिक प्रासंगिक बना दिया है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि जांच की अगली कड़ी में किन अधिकारियों, संस्थानों और प्रभावशाली लोगों की भूमिका सामने आती है और क्या वास्तव में दोषियों को सजा मिल पाती है।


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