खेत बचाओ से तालाब बचाओ तक: उत्तराखंड में बचाने के लिए आखिर बचा क्या है?

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उत्तराखंड में इन दिनों एक नया नारा गूंज रहा है—”खेत बचाओ अभियान”। यह सुनकर मन बड़ा प्रसन्न हुआ। लगा कि सरकार को आखिरकार खेतों की चिंता हो गई है। लेकिन फिर याद आया कि जिन खेतों को बचाने का अभियान चलाया जा रहा है, उनमें से आधे तो अब कॉलोनी बन चुके हैं, कुछ में प्लॉटिंग हो चुकी है, कुछ में “ड्रीम सिटी”, “ग्रीन वैली”, “हिल व्यू रेजिडेंसी” और “फार्म हाउस प्रोजेक्ट” के बोर्ड लगे हुए हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर बचाया क्या जाएगा?
हमारे गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि पहले खेतों में गेहूं उगता था, फिर धान उगने लगा, उसके बाद कंक्रीट उगने लगी और अब रजिस्ट्री उगती है। किसान पहले फसल काटता था, अब नक्शा काटता है। खेतों में हल नहीं चलता, जेसीबी चलती है। बैलों की जगह अब प्रॉपर्टी डीलर दिखाई देते हैं।
इसी बीच नेताओं ने घोषणा कर दी—”खेत बचाओ अभियान।”
यह वैसा ही है जैसे किसी मरीज के अंतिम संस्कार के बाद डॉक्टर कहे, “अब हम इसे बचाने के लिए विशेष अभियान चलाएंगे।”
गांव के चौधरी जी ने पूछा, “भाई साहब, खेत कहां हैं?”
उत्तर मिला, “यही तो खोजने के लिए अभियान चलाया जा रहा है।”
दरअसल हमारे यहां अभियानों की एक बड़ी खूबी है। जब कोई चीज अपने अस्तित्व के अंतिम चरण में पहुंच जाती है, तभी उसे बचाने का अभियान शुरू होता है।
जब नदियां गंदगी से भर जाती हैं, तब नदी बचाओ अभियान।
जब जंगल कट जाते हैं, तब जंगल बचाओ अभियान।
जब पहाड़ खोखले हो जाते हैं, तब पहाड़ बचाओ अभियान।
और जब खेत प्लॉट बन जाते हैं, तब खेत बचाओ अभियान।
अब मुझे लगता है कि अगला अभियान “गड्ढा बचाओ अभियान” होगा, क्योंकि सड़कें तो पूरी तरह गड्ढों में बदल चुकी हैं।
खेत बचाओ अभियान के मंच पर मंत्री जी किसानों को समझा रहे थे कि जमीन की उर्वरता कैसे बढ़ाई जाए। नीचे बैठे किसान धीरे से बोले, “मंत्री जी, उर्वरता बाद में बढ़ा लेंगे, पहले जमीन तो बची रहे।”
मंत्री जी ने मुस्कुराकर कहा, “आप सकारात्मक सोचिए।”
किसान बोला, “हम तो सकारात्मक ही सोच रहे हैं। तभी तो अपने खेत में बनी कॉलोनी का नाम ‘ग्रीन वैली’ रखा है।”
उत्तराखंड की राजनीति में विकास का मतलब भी बड़ा रोचक है। जहां खेत दिखे, वहां विकास की संभावना दिखती है। पहले सड़क बनती है, फिर सड़क के किनारे दुकानें बनती हैं, फिर दुकानें बाजार बन जाती हैं और फिर बाजार खेतों को खा जाता है।
कुछ वर्षों बाद वही नेता मंच पर खड़े होकर घोषणा करते हैं—”खेत बचाओ अभियान।”
यह सुनकर खेत की आत्मा भी शायद हंसती होगी।
लेकिन अब मुझे लगता है कि सरकार को खेत बचाओ के साथ-साथ “तालाब बचाओ अभियान” भी शुरू कर देना चाहिए।
क्योंकि तालाबों की हालत तो खेतों से भी ज्यादा गंभीर है।
पहले तालाबों में पानी भरा रहता था। अब उनमें मलबा भरा रहता है।
पहले बच्चे तालाब में तैरना सीखते थे। अब वहां लोग प्लॉट नापना सीखते हैं।
पहले तालाब गांव की पहचान होते थे। अब उन पर नजर प्रॉपर्टी कारोबारियों की होती है।
कई तालाब तो ऐसे गायब हुए हैं कि मानो कभी थे ही नहीं।
यदि किसी पुराने नक्शे में तालाब दिख जाए तो अधिकारी कहते हैं, “रिकॉर्ड में तो तालाब है।”
ग्रामीण कहते हैं, “जमीन पर तो मॉल है।”
अधिकारी जवाब देते हैं, “फिर रिकॉर्ड अपडेट कर देंगे।”
एक दिन मैंने कल्पना की कि उत्तराखंड में “तालाब बचाओ अभियान” शुरू हो गया है।
मंच सजा हुआ है।
नेता जी भाषण दे रहे हैं—
“हम तालाबों को बचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”
तभी पीछे से आवाज आती है—
“मंत्री जी, जिस तालाब पर आप मंच बनाकर भाषण दे रहे हैं, पहले उसे ही बचा लीजिए।”
पूरा पंडाल तालियों से गूंज उठता है।
उत्तराखंड के जनप्रतिनिधियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे हर समस्या को अवसर में बदल देते हैं।
जाम है?
घोषणा कर दो।
अतिक्रमण है?
समिति बना दो।
तालाब गायब है?
सर्वे करा दो।
खेत खत्म हो रहे हैं?
अभियान चला दो।
और अगर जनता सवाल पूछने लगे तो एक नई योजना घोषित कर दो।
जनता भी समझदार है।
वह जानती है कि घोषणा और हकीकत के बीच उतनी ही दूरी होती है जितनी चुनावी वादे और बजट के बीच।
खेत बचाओ अभियान में किसानों को आधुनिक खेती सिखाई जाएगी।
लेकिन किसान सोच रहा है कि आधुनिक खेती करे कहां?
जिस खेत में खेती होनी थी, वहां तो अब “रिवर व्यू कॉलोनी” बन रही है।
जिस तालाब में पानी होना था, वहां शादी लॉन बनने की तैयारी है।
और जिस पहाड़ी पर जंगल होना था, वहां रिसॉर्ट का उद्घाटन होने वाला है।
फिर भी हम आशावादी लोग हैं।
हमें विश्वास है कि एक दिन सरकार “तालाब बचाओ अभियान” भी शुरू करेगी।
फिर “नाला बचाओ अभियान” आएगा।
उसके बाद “पहाड़ बचाओ अभियान”।
और यदि यही गति रही तो एक दिन “उत्तराखंड बचाओ अभियान” भी शुरू करना पड़ेगा।
उस दिन मंत्री, विधायक, अधिकारी और जनता सभी एक मंच पर होंगे।
मंत्री जी कहेंगे—
“हम प्रदेश को बचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”
जनता पूछेगी—
“बहुत अच्छा, लेकिन बचाने के लिए बचा क्या है?”
और यही प्रश्न शायद पूरे व्यंग्य का सार है।
क्योंकि किसी भी चीज को बचाने का सबसे अच्छा तरीका यह नहीं कि उसके खत्म होने के बाद अभियान चलाया जाए, बल्कि यह है कि उसके खत्म होने से पहले उसे बचा लिया जाए।
वरना आने वाली पीढ़ियां इतिहास की किताबों में पढ़ेंगी—
“यहां कभी खेत हुआ करते थे।”
“यहां कभी तालाब हुआ करते थे।”
“और यहां कभी बचाओ अभियान चलाया जाता था।”
फिर बच्चे पूछेंगे—
“दादाजी, खेत क्या होता है?”
और दादाजी मोबाइल पर पुरानी तस्वीर दिखाकर कहेंगे—
“बेटा, यही वह चीज थी जिसे बचाने के लिए अभियान तब शुरू हुआ था, जब वह लगभग खत्म हो चुकी थी।”


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