यह मामला केवल एक ट्रेकर के लापता होने का नहीं, बल्कि एडवेंचर पर्यटन में सुरक्षा मानकों की घोर अनदेखी का गंभीर उदाहरण है। सबसे बड़ा सवाल उस ट्रेकिंग एजेंसी पर है जिसने बिना वैध परमिट के बबीता पांडे को दयारा बुग्याल जैसे संवेदनशील ट्रेकिंग क्षेत्र में भेज दिया। यदि नियमों का पालन किया गया होता तो प्रशासन के पास उनकी पूरी जानकारी उपलब्ध रहती और आपात स्थिति में तत्काल कार्रवाई संभव होती।
दूसरा गंभीर प्रश्न यह है कि बबीता के लापता होने की सूचना पुलिस और प्रशासन को समय पर क्यों नहीं दी गई? सूचना में देरी ने खोज एवं बचाव अभियान को प्रभावित किया और बहुमूल्य समय नष्ट हुआ। क्या एजेंसी अपनी लापरवाही छिपाने की कोशिश कर रही थी? पर्यटन विभाग, वन विभाग और स्थानीय प्रशासन को भी यह स्पष्ट करना होगा कि बिना परमिट ट्रेकिंग गतिविधियां कैसे संचालित हो रही थीं। यह घटना बताती है कि मुनाफे की होड़ में सुरक्षा नियमों को नजरअंदाज किया जा रहा है। यदि जिम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई तो भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा हो सकती हैं। बबीता की सुरक्षित वापसी के साथ-साथ जवाबदेही तय करना भी प्रशासन की बड़ी परीक्षा है।
जांच में पता चला है कि जिस ट्रेकिंग एजेंसी के जरिए वह ट्रेक पर गई थीं, उसने उनके नाम पर कोई वैध परमिट जारी ही नहीं कराया था.
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
जानकारी के अनुसार, नैनीताल निवासी लगभग 30 वर्षीय बबीता पांडे एक निजी कंपनी में कार्यरत थीं और साथ ही एमबीए की पढ़ाई भी कर रही थीं. वह अन्य ट्रेकर्स के समूह के साथ दयारा बुग्याल ट्रेक पर निकली थीं. दयारा बुग्याल उत्तराखंड का एक बेहद लोकप्रिय ट्रेकिंग डेस्टिनेशन है, जहां हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक और एडवेंचर प्रेमी पहुंचते हैं.
आधिकारिक ट्रेकिंग परमिट के बिना बबिता को ट्रेक पर भेजा
घटना उस समय सामने आई जब ट्रेक के दौरान बबीता अचानक अपने समूह से अलग हो गईं और फिर लापता हो गईं. जब काफी देर तक उनका कोई पता नहीं चला, तो मामले की सूचना प्रशासन को दी गई. इसके बाद पुलिस, वन विभाग, स्थानीय प्रशासन और एसडीआरएफ की टीमों ने संयुक्त रूप से सर्च ऑपरेशन शुरू किया. हालांकि लगातार प्रयासों के बावजूद अभी तक बबीता का कोई सुराग नहीं मिल पाया है.
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला खुलासा पर्यटन विभाग की जांच के दौरान हुआ. अधिकारियों ने साफ किया कि बबीता पांडे के नाम से कोई आधिकारिक ट्रेकिंग परमिट जारी नहीं किया गया था. इसका सीधा मतलब है कि ट्रेकिंग एजेंसी ने नियमों की अनदेखी करते हुए बिना अनुमति के ही उन्हें ट्रेक पर भेज दिया.
पुलिस को समय पर नहीं दी गई बबीता के लापता होने की सूचना
नियमों के मुताबिक, दयारा बुग्याल जैसे संवेदनशील और वन क्षेत्र में आने वाले ट्रेकिंग रूट्स पर जाने के लिए संबंधित विभाग से परमिट लेना अनिवार्य होता है. यह प्रक्रिया सुरक्षा के लिहाज से बेहद जरूरी मानी जाती है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में ट्रेकर्स की जानकारी प्रशासन के पास उपलब्ध रहे और समय पर मदद पहुंचाई जा सके. लेकिन इस मामले में एजेंसी ने इन जरूरी नियमों को नजरअंदाज किया, जिससे अब उनकी कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं.
इसके अलावा यह भी सामने आया है कि बबीता के लापता होने की सूचना पुलिस को समय पर नहीं दी गई. सूचना देने में हुई देरी के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू करने में भी देर हुई, जिससे स्थिति और अधिक गंभीर हो गई. इसे भी एजेंसी और संबंधित लोगों की बड़ी लापरवाही माना जा रहा है.
प्रशासन ने ट्रेकिंग एजेंसियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के दिए आदेश
इस घटना के बाद प्रशासन ने सख्त रुख अपनाते हुए ट्रेकिंग एजेंसियों के खिलाफ कार्रवाई के संकेत दिए हैं. अधिकारियों का कहना है कि बिना परमिट ट्रेक कराने वाली एजेंसियों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा. साथ ही भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए निगरानी व्यवस्था को और मजबूत किया जाएगा.
यह पूरा मामला उत्तराखंड में तेजी से बढ़ रहे एडवेंचर टूरिज्म के बीच सुरक्षा मानकों की अनदेखी को उजागर करता है. दयारा बुग्याल जैसे खूबसूरत लेकिन जोखिम भरे ट्रेकिंग क्षेत्रों में नियमों का पालन बेहद जरूरी है. एक छोटी सी चूक भी किसी की जान के लिए खतरा बन सकती है. फिलहाल प्रशासन का मुख्य उद्देश्य बबीता पांडे को सुरक्षित ढूंढ निकालना है. साथ ही इस पूरे मामले में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है.
