जवाहर नगर विकास के दावे बनाम हकीकत: दर्जनों पत्र, करोड़ों के प्रस्ताव, फिर भी समस्याओं से जूझ रहा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का गांव

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जवाहर नगर: विकास के दावों पर बड़ा प्रश्नचिह्न

जवाहर नगर की कहानी उत्तराखंड में विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को उजागर करती है। पुस्तकालय, सड़क चौड़ीकरण, आंतरिक मार्ग, हाईमास्ट लाइट, गौशाला, स्वास्थ्य केंद्र और सिंचाई व्यवस्था जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए ग्राम पंचायत द्वारा वर्षों से अधिकारियों, विभागों, मंत्रियों और मुख्यमंत्री कार्यालय तक दर्जनों पत्र भेजे गए। कई मामलों में आश्वासन मिले, प्रस्ताव बने, करोड़ों रुपये के आगणन तैयार हुए, लेकिन अधिकांश योजनाएं आज भी फाइलों में कैद हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड

ऐसे में केवल सरकारी तंत्र ही नहीं, बल्कि क्षेत्र के विधायक, राज्य मंत्री और उत्तराखंड सरकार की जवाबदेही पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है। यदि जिला मुख्यालय और पंतनगर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र से सटे गांव की समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है, तो दूरस्थ गांवों की स्थिति कैसी होगी? विकास के दावे तभी सार्थक होंगे जब योजनाएं कागजों से निकलकर धरातल पर दिखाई दें। अन्यथा जनता के मन में यह सवाल लगातार गूंजता रहेगा कि आखिर जिम्मेदार कौन है—अधिकारी, जनप्रतिनिधि या पूरा शासन तंत्र?

रुद्रपुर। जिला मुख्यालय से सबसे कम दूरी पर स्थित ग्राम पंचायत जवाहर नगर आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है। यह वही गांव है जहां स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिवार रहते हैं, बड़ी संख्या में किसान निवास करते हैं और पंतनगर जैसे राष्ट्रीय महत्व के औद्योगिक एवं शैक्षणिक क्षेत्र की सीमा से सटा हुआ है। इतना ही नहीं, पंतनगर को अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के रूप में विकसित करने की योजनाएं भी चर्चा में हैं, लेकिन जवाहर नगर के लोगों का सवाल है कि जब विकास की इतनी बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं, तब गांव की सड़कें, पुस्तकालय, स्ट्रीट लाइट, गौशाला, स्वास्थ्य केंद्र और सिंचाई जैसी बुनियादी जरूरतें आज तक क्यों अधूरी हैं?
ग्राम प्रधान तारा पाण्डेय द्वारा वर्ष 2024 से 2026 के बीच विभिन्न विभागों, मंत्रियों और अधिकारियों को लगातार पत्र लिखे गए। इन पत्रों में गांव की समस्याओं का विस्तार से उल्लेख किया गया और समाधान की मांग की गई। अधिकांश मामलों में आश्वासन मिले, कुछ मामलों में फाइलें आगे बढ़ीं, लेकिन धरातल पर कार्य होते नहीं दिखाई दिए। यही कारण है कि अब ग्रामीणों के बीच यह चर्चा का विषय बन गया है कि आखिर जिम्मेदारी किसकी है?
पुस्तकालय भवन की मांग भी फाइलों में
24 फरवरी 2024 को ग्राम प्रधान तारा पाण्डेय ने अपर मुख्य अधिकारी, ऊधम सिंह नगर को पत्र भेजकर जवाहर नगर में पुस्तकालय भवन निर्माण की मांग की थी।
पत्र में उल्लेख किया गया कि जवाहर नगर विकास खंड रुद्रपुर की सबसे अधिक आबादी वाली ग्राम पंचायतों में शामिल है। यहां बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं अध्ययनरत हैं तथा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और सेना से सेवानिवृत्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों के परिवार भी निवास करते हैं। ऐसे में विद्यार्थियों के लिए आधुनिक पुस्तकालय की आवश्यकता महसूस की गई।
ग्राम पंचायत ने स्पष्ट रूप से कहा कि बच्चों को सामान्य ज्ञान, प्रतियोगी परीक्षाओं और शैक्षिक विकास के लिए पुस्तकालय की आवश्यकता है। लेकिन दो वर्ष से अधिक समय बीतने के बाद भी पुस्तकालय निर्माण की दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं दिखी।
ग्रामीणों का प्रश्न है कि यदि शिक्षा सरकार की प्राथमिकता है तो फिर यह प्रस्ताव अभी तक धरातल पर क्यों नहीं उतरा?
हाईमास्ट और स्ट्रीट लाइट का प्रस्ताव भी अधर में
ग्राम प्रधान ने वरिष्ठ परियोजना अधिकारी, उरेडा को पत्र लिखकर जवाहर नगर में हाईमास्ट लाइट और 15 नई स्ट्रीट लाइट लगाने की मांग की।
पत्र में बताया गया कि गांव के प्रवेश द्वार गोल गेट रेलवे क्रॉसिंग सहित विभिन्न सार्वजनिक स्थलों पर हाईमास्ट लाइटों की आवश्यकता है। ग्राम पंचायत बैठक में प्रस्ताव भी पारित किया गया।
आज भी कई क्षेत्रों में पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि अंधेरे के कारण दुर्घटनाओं और असामाजिक गतिविधियों की आशंका बनी रहती है।
सवाल यह है कि जब प्रस्ताव पारित होकर विभाग तक पहुंच गया था तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
गौशाला की मांग: किसानों की पीड़ा कौन सुनेगा?
ग्राम प्रधान द्वारा उत्तराखंड सरकार के पशुपालन, दुग्ध विकास एवं गन्ना विकास विभाग से जुड़े मंत्री को भेजे गए पत्र में आवारा गोवंश की गंभीर समस्या उठाई गई।
पत्र में कहा गया कि सड़कों पर घूम रहे गोवंश की वजह से लगातार दुर्घटनाएं हो रही हैं। किसानों की फसलें नष्ट हो रही हैं। कई परिवार सड़क हादसों में अपनों को खो चुके हैं।
ग्राम पंचायत ने बंजर भूमि पर बड़ी गौशाला स्थापित करने की मांग की ताकि आवारा गोवंश को संरक्षण मिल सके और किसानों की फसलें बच सकें।
लेकिन ग्रामीण पूछ रहे हैं कि आखिर इतनी गंभीर समस्या के बावजूद स्थायी समाधान क्यों नहीं निकाला गया?
आवारा जानवरों से तबाह किसान
6 जनवरी 2026 को अपर मुख्य अधिकारी, त्रिस्तरीय पंचायत, ऊधम सिंह नगर को भेजे गए पत्र में फिर से आवारा पशुओं की समस्या उठाई गई।
पत्र के अनुसार जवाहर नगर में लगभग 60 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। आवारा पशु किसानों की फसलें पूरी तरह नष्ट कर रहे हैं। किसान ठंड की रातों में खेतों की रखवाली करने को मजबूर हैं।
महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों पर पशुओं के हमलों की घटनाओं का भी उल्लेख किया गया। कोहरे के दौरान सड़क पर बैठे जानवर दुर्घटनाओं का कारण बन रहे हैं।
ग्रामीणों का सवाल है कि आखिर किसानों की इस समस्या का समाधान कब होगा?
सड़क चौड़ीकरण की मांग वर्षों से लंबित
10 नवंबर 2025 को लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता को भेजे गए पत्र में सड़क चौड़ीकरण की मांग की गई।
पत्र में बताया गया कि बढ़ती आबादी के कारण वर्तमान सड़क पर्याप्त नहीं है। सुबह और दोपहर के समय जाम की स्थिति बनती है। स्कूल जाने वाले बच्चों और आम लोगों को भारी परेशानी होती है।
ग्राम पंचायत ने सड़क चौड़ीकरण के साथ दोनों ओर नाली और फुटपाथ निर्माण की भी मांग की।
लेकिन क्या सड़क चौड़ीकरण के लिए कोई समयसीमा तय हुई? ग्रामीणों को इसका जवाब आज तक नहीं मिला।
मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंची शिकायत
ग्राम प्रधान तारा पाण्डेय ने मुख्यमंत्री कार्यालय तक भी अपनी बात पहुंचाई।
29 सितंबर 2025 को मुख्यमंत्री कार्यालय में भेजे गए प्रार्थना पत्र में जवाहर नगर में लगभग तीन किलोमीटर आंतरिक सड़कों के निर्माण की मांग की गई।
इसके बाद जिला विकास अधिकारी कार्यालय से 3 नवंबर 2025 को उप निदेशक (निर्माण), मंडी निदेशालय रुद्रपुर को पत्र भेजा गया।
यह दर्शाता है कि मामला केवल ग्राम पंचायत स्तर तक सीमित नहीं रहा बल्कि मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचा।
2.87 करोड़ रुपये का प्रस्ताव तैयार, फिर भी इंतजार
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उत्तराखंड कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड के उप महाप्रबंधक (तकनीकी) कार्यालय द्वारा स्थलीय निरीक्षण के बाद आंतरिक मार्गों के निर्माण का आगणन तैयार किया गया।
दस्तावेज के अनुसार:
ग्राम जवाहर नगर में आंतरिक मार्ग निर्माण की अनुमानित लागत – 287.93 लाख रुपये (लगभग 2.88 करोड़ रुपये)।
आगणन तैयार होने के बाद इसे प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति के लिए अग्रसारित भी किया गया।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि जब निरीक्षण हो चुका, प्रस्ताव बन चुका और लगभग 2.88 करोड़ रुपये का आगणन तैयार हो चुका, तो फिर निर्माण कार्य शुरू क्यों नहीं हुआ?
सिंचाई गूल और सड़क निर्माण का मुद्दा
19 मार्च 2026 को सिंचाई विभाग को भेजे गए पत्र में ग्राम पंचायत ने बताया कि खुली बैठक में वर्ष 2015 में ही निर्णय लिया गया था कि झिटरी के घर से शांतिपुरी नंबर-1 तक सिंचाई गूल का पक्का निर्माण किया जाए तथा उसके किनारे सड़क बनाई जाए।
पत्र में कहा गया कि पिछले लगभग 30 वर्षों में न तो गूल बनी और न सड़क।
ग्राम पंचायत ने बरसात से पहले निर्माण कराने की मांग की।
ग्रामीण पूछ रहे हैं कि आखिर तीन दशक तक यह कार्य लंबित क्यों रहा?
आयुष्मान आरोग्य मंदिर की मांग
18 मार्च 2026 को चिकित्सा अधिकारी को भेजे गए पत्र में ग्राम पंचायत ने आयुष्मान आरोग्य मंदिर निर्माण की मांग की।
ग्राम पंचायत का तर्क था कि बढ़ती आबादी को प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए स्वास्थ्य केंद्र आवश्यक है।
ग्रामीणों का कहना है कि छोटी-छोटी स्वास्थ्य समस्याओं के लिए भी उन्हें शहर की ओर जाना पड़ता है।
आंतरिक मार्गों के लिए फिर भेजा गया पत्र
18 मार्च 2026 को उत्तराखंड कृषि उत्पादन विपणन बोर्ड के अध्यक्ष को भेजे गए पत्र में ग्रामसभा के आंतरिक मार्गों के निर्माण की मांग दोहराई गई।
ग्राम पंचायत ने आग्रह किया कि सीसी रोड निर्माण छोटे-छोटे चरणों में किया जाए ताकि जल्द से जल्द काम शुरू हो सके।
यह दर्शाता है कि ग्राम पंचायत लगातार विभागों को याद दिला रही थी, लेकिन काम आगे नहीं बढ़ पा रहा था।
आखिर जिम्मेदार कौन?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब—
पुस्तकालय के लिए पत्र गया,
हाईमास्ट लाइट के लिए प्रस्ताव गया,
गौशाला की मांग उठी,
आवारा पशुओं की शिकायत हुई,
सड़क चौड़ीकरण की मांग हुई,
मुख्यमंत्री कार्यालय तक मामला पहुंचा,
2.88 करोड़ का आगणन तैयार हुआ,
सिंचाई गूल और सड़क का प्रस्ताव भेजा गया,
स्वास्थ्य केंद्र की मांग की गई,
तो फिर धरातल पर विकास कार्य क्यों नहीं दिखाई दे रहे?
क्या विभागों ने केवल पत्राचार तक ही अपनी जिम्मेदारी सीमित कर ली? क्या जनप्रतिनिधियों के आश्वासन केवल कागजों तक सीमित रहे? क्या मुख्यमंत्री कार्यालय से भेजे गए संदर्भों पर समयबद्ध कार्रवाई नहीं हुई?
ग्रामीणों की उम्मीदें अभी भी कायम
जवाहर नगर के लोग आज भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि वर्षों से लंबित योजनाएं किसी दिन धरातल पर उतरेंगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास केवल फाइलों, प्रस्तावों और आश्वासनों तक सीमित रहेगा या फिर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के इस गांव को वास्तव में उसकी जरूरतों के अनुरूप सुविधाएं मिलेंगी?
जब जिला मुख्यालय से सटे गांव की यह स्थिति है, तो दूरस्थ क्षेत्रों की स्थिति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। जवाहर नगर की जनता अब जवाब चाहती है—आखिर इतने पत्रों, प्रस्तावों और करोड़ों की योजनाओं के बावजूद विकास कार्य कब शुरू होंगे?


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