1975: 25 जून, 1975 की वो रात जब भारत के लाखों नागरिक सो रहे थे, तब देश की सत्ता ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने स्वतंत्र भारत के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया। अगली सुबह जब लोग जागे तो उन्हें पता चला कि उनके मौलिक अधिकार छिन लिए गए हैं।

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अखबारों की प्रेस पर ताला लग गया था। विपक्ष के नेता जेल में थे। और देश का संविधान जिस पर करोड़ों भारतीयों को गर्व था उसे रौंदा जा रहा था। आज हम इसी काले अध्याय की पूरी कहानी जानेंगे- कैसे हुई इसकी शुरुआत, क्या थे इसके कारण, और इसने भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर क्या असर डाला।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

भारत की राजनीतिक जमीन हिल रही थी

1970 के दशक की शुरुआत में भारत की राजनीतिक जमीन हिल रही थी। एक तरफ बिहार और गुजरात में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्र आंदोलन उग्र होते जा रहे थे। बेरोज़गारी, महंगाई, और भ्रष्टाचार से आम जनता त्रस्त थी। दूसरी तरफ एक अदालती लड़ाई चल रही थी जो सत्ता की नींव हिला देने वाली थी।12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस जगमोहनलाल सिन्हा ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। उन्होंने पाया कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1971 के लोकसभा चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया था। इस आधार पर उन्हें जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत दोषी पाया गया और छह साल के लिए किसी भी निर्वाचित पद पर रहने से अयोग्य घोषित कर दिया गया।

इंदिरा गांधी पर बढ़ता जा रहा था राजनीतिक दबाव

यह मामला राज नारायण ने दायर किया था वही समाजवादी नेता जो रायबरेली सीट से इंदिरा गांधी से हारे थे। सुप्रीम कोर्ट ने एक सशर्त स्थगन दिया – इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी रह सकती थीं, संसद में जा सकती थीं, लेकिन मतदान का अधिकार उनका नहीं था। राजनीतिक दबाव बढ़ता जा रहा था। चारों तरफ से इस्तीफे की मांग उठ रही थी। और तब आया वो फैसला जिसने इतिहास की दिशा बदल दी। 25 जून 1975 की आधी रात। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की उद्घोषणा पर हस्ताक्षर कर दिए। आधार बताया गया – ‘आंतरिक अशांति’ से देश को खतरा।

जयप्रकाश नारायण पर लगा भड़काने का आरोप

सरकार ने एक प्रेस नोट जारी किया जिसमें जयप्रकाश नारायण सहित कई नेताओं पर पुलिस और सेना को भड़काने का आरोप लगाया गया। यह भारत के इतिहास का तीसरा आपातकाल था लेकिन पहला शांतिकाल में लगाया गया आपातकाल। इससे पहले चीन के साथ 1962 में और पाकिस्तान के साथ 1971 में युद्ध के दौरान आपातकाल लगाया गया था। उस वक्त अनुच्छेद 352 में तीन आधार थे – युद्ध, बाहरी आक्रमण, या आंतरिक अशांति। आपातकाल लागू होते ही केंद्र सरकार को असीमित अधिकार मिल गए। राज्य सरकारें केंद्र के अधीन हो गईं। जैसा कि बाद में वरिष्ठ विधिवेत्ता हरीश साल्वे ने कहा-‘यह आपातकाल हमारे संविधान पर सबसे बड़ा हमला था।’

संविधान के अनुच्छेद 358 और 359 लागू कर दिए गए

आपातकाल की घोषणा के मात्र दो दिन बाद 27 जून 1975 को संविधान के अनुच्छेद 358 और 359 लागू कर दिए गए। अनुच्छेद 358 ने अनुच्छेद 19 के तहत मिले अधिकारों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सभा करने का अधिकार, और आवागमन का अधिकार को निलंबित कर दिया। अनुच्छेद 359 ने नागरिकों को अनुच्छेद 14, 21 और 22 के अंतर्गत अधिकार यानी कानून के सामने समानता, जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार, और नजरबंदी से सुरक्षा लागू कराने के लिए अदालत जाने से रोक दिया। सरल भाषा में कहें तो नागरिक अब अपने अधिकारों के लिए कोर्ट नहीं जा सकते थे।

विपक्षी नेताओं को बिना मुकदमे के जेल में डाल दिया गया

मीसा (MISA) यानी मेंटिनेंस ऑफ इंटर्नल सेक्युरिटी एक्ट का जमकर दुरुपयोग हुआ। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी जैसे विपक्षी नेताओं को बिना मुकदमे के जेल में डाल दिया गया। शाह आयोग की रिपोर्ट के अनुसार आपातकाल के दौरान करीब 35,000 लोगों को बिना मुकदमे के हिरासत में लिया गया। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया पर भी ताला लगा दिया गया।26 जून 1975 से सभी अखबारों पर प्री-सेंसरशिप लागू हो गई। कोई भी खबर, संपादकीय या तस्वीर बिना सरकारी मंजूरी के छापी नहीं जा सकती थी। एक राष्ट्रीय सेंसर और क्षेत्रीय सेंसर नियुक्त किए गए। विदेशी पत्रकारों के टेलेक्स संदेशों पर भी पाबंदी लग गई।

अखबार दफ्तरों की बिजली काट दी गई

1 फरवरी 1976 को सरकार ने चार प्रमुख समाचार एजेंसियों PTI, UNI, समाचार भारती और हिंदुस्थान समाचार को मिलाकर एकमात्र सरकारी एजेंसी ‘समाचार’ बना दी। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया जो प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षक संस्था थी उसे भंग कर दिया गया। दिल्ली में कुछ अखबार दफ्तरों की बिजली काट दी गई ताकि वे छप न सकें। शाह आयोग ने पाया कि अखबारों को ‘मित्र’, ‘तटस्थ’ या ‘शत्रु’ की श्रेणी में रखा जाता था। आपातकाल के दौरान संसद को कठपुतली की तरह इस्तेमाल किया गया। 38वें संविधान संशोधन से अदालतों को राष्ट्रपति के आपातकाल संबंधी फैसले पर सवाल उठाने से रोक दिया गया। 39वें संशोधन ने प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव को न्यायिक जांच से बाहर कर दिया। 42वां संशोधन जिसे ‘मिनी संविधान’ भी कहा जाता है सबसे व्यापक था। इसने मौलिक अधिकारों के ऊपर नीति निदेशक तत्वों को तरजीह दी, संवैधानिक संशोधनों की न्यायिक समीक्षा बंद कर दी, और लोकसभा व विधानसभाओं का कार्यकाल पांच से बढ़ाकर छह साल कर दिया। आपातकाल का एक और काला पन्ना है -जबरन नसबंदी अभियान।

दो वर्षों में कुल 1.07 करोड़ नसबंदियां हुईं

1975-76 में 26.42 लाख और 1976-77 में 81.32 लाख नसबंदियां की गईं। दो वर्षों में कुल 1.07 करोड़ नसबंदियां हुईं। कई राज्यों में लोगों को राशन, आवास, नौकरी और कर्ज़ जैसी बुनियादी सुविधाएं इस शर्त पर मिलती थीं कि वे नसबंदी करवाएं। शाह आयोग को 548 शिकायतें ऐसी मिलीं जिनमें अविवाहित व्यक्तियों की नसबंदी हुई, और 1,774 मौतें इन प्रक्रियाओं से जुड़ी बताई गईं। लेकिन लोकतंत्र की जड़ें इतनी गहरी थीं कि उन्हें उखाड़ा नहीं जा सका। 21 मार्च 1977 को आपातकाल हटाया गया। 16 से 20 मार्च 1977 के बीच लोकसभा चुनाव हुए। जनता ने अपना जवाब मतपेटी से दिया – कांग्रेस को करारी हार मिली और जनता पार्टी सत्ता में आई। मई 1977 में जस्टिस जे.सी. शाह की अध्यक्षता में शाह जांच आयोग का गठन हुआ। इसका काम था आपातकाल के दौरान हुए अत्याचारों की जांच करना।

आयोग के मुख्य निष्कर्ष:

  • 1 जनवरी 1975 को भारत की जेलों में 2,20,146 कैदी थे – क्षमता से ज़्यादा।
  • 25,962 सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों को समय से पहले सेवानिवृत्त किया गया।
  • संसदीय और न्यायिक कार्यवाहियों पर भी सेंसरशिप लगी।

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे अंधेरा दौर

1978 में 44वां संविधान संशोधन हुआ जिसने ‘आंतरिक अशांति’ की जगह ‘सशस्त्र विद्रोह’ शब्द रखा और भविष्य में आपातकाल के दुरुपयोग पर कानूनी रोक लगाई। जून 1975 से मार्च 1977 तक का यह काल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे अंधेरा दौर था। लेकिन इसी अंधेरे ने हमें सिखाया -कि संविधान सिर्फ एक दस्तावेज नहीं, यह करोड़ों नागरिकों का जीवित संकल्प है। कि न्यायपालिका, प्रेस और नागरिक समाज -ये लोकतंत्र के असली रक्षक हैं। और कि जनता की आवाज चाहे कितनी भी दबाई जाए एक दिन जरूर फूटती है। जैसा कि जयप्रकाश नारायण ने कहा था ‘लोकतंत्र तभी सुरक्षित है जब सत्ता की लगाम सीधे जनता के हाथ में हो।’ आपातकाल के 51 साल बाद – आज भी यह याद दिलाना जरूरी है कि स्वतंत्रता कभी स्वयंसिद्ध नहीं होती। उसे हर पीढ़ी को फिर से अर्जित करना पड़ता है।


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