नई दिल्ली। NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के विरोध में शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब राजनीतिक विमर्श का प्रमुख मुद्दा बन गया है। शुरुआत में यह आंदोलन परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, निष्पक्ष जांच और छात्रों के भविष्य की सुरक्षा तक सीमित था, लेकिन समय के साथ विपक्षी दलों ने इसे बेरोजगारी, युवाओं के भविष्य और सरकार की जवाबदेही से जोड़कर बड़े राजनीतिक मुद्दे के रूप में पेश करना शुरू कर दिया।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने आंदोलन को युवाओं की नाराजगी का प्रतीक बताते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साधा। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बार-बार आरोप लगाया कि परीक्षा प्रणाली में लगातार हो रही गड़बड़ियां लाखों मेहनती छात्रों के भविष्य के साथ अन्याय हैं। अन्य विपक्षी दलों ने भी इसे रोजगार और शिक्षा व्यवस्था से जोड़ते हुए सरकार को घेरने की रणनीति अपनाई।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि देश में बड़ी संख्या में मौजूद Gen-Z और प्रथम बार मतदान करने वाले युवाओं को प्रभावित करने के लिए यह मुद्दा विपक्ष के लिए प्रभावी राजनीतिक नैरेटिव बन गया है। शिक्षा, रोजगार और पारदर्शिता जैसे विषय युवाओं के बीच पहले से ही संवेदनशील रहे हैं, इसलिए विपक्ष इन्हें आगामी चुनावी राजनीति में प्रमुख मुद्दा बनाने का प्रयास कर रहा है।
हालांकि आंदोलन से जुड़े कई छात्र संगठनों और अभ्यर्थियों ने लगातार यह कहा है कि उनका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल का समर्थन करना नहीं, बल्कि परीक्षा प्रणाली में सुधार, निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित कराना है। उनका कहना है कि आंदोलन की मूल भावना छात्रों के अधिकारों और शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बहाल करने की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि छात्र आंदोलन अपनी मूल मांगों पर केंद्रित रहता है और किसी भी राजनीतिक दल के प्रभाव से दूरी बनाए रखता है, तो उसकी विश्वसनीयता और जनसमर्थन अधिक मजबूत रहेगा। वहीं राजनीतिक दलों के लिए यह मुद्दा आने वाले समय में युवा मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
