देहरादून। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से 2016 के एक प्रकरण में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत से संबंधित दस्तावेज मांगे जाने और पूछताछ के लिए बुलाए जाने के बाद उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर राजनीतिक संपत्तियों और जवाबदेही का मुद्दा चर्चा में है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
हरीश रावत ने अपनी फेसबुक पोस्ट के माध्यम से बताया कि उन्हें ED का नोटिस मिलने के बाद वह देहरादून स्थित ED कार्यालय पहुंचे हैं। उन्होंने पोस्ट में कहा कि उनसे पुराने आयकर रिटर्न, संपत्तियों तथा परिवार के सदस्यों से संबंधित दस्तावेज मांगे गए हैं। उनका कहना है कि विस्तृत परिवार के सभी दस्तावेज इतने कम समय में जुटाना कठिन है। रावत के अनुसार वह अपनी मां को साथ लेकर ED कार्यालय पहुंचे हैं।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स ED की कानूनी प्रक्रिया और जांच का समर्थन करता है। किसी भी व्यक्ति की संपत्ति, आय और आर्थिक लेन-देन को लेकर यदि जांच का वैधानिक आधार मौजूद है तो जांच एजेंसी को तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर जांच पूरी करने का अवसर मिलना चाहिए।
हालांकि जांच का अर्थ दोष सिद्ध होना नहीं है। अंतिम निष्कर्ष जांच में सामने आने वाले दस्तावेजों और सक्षम न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होना चाहिए।
साथ ही उत्तराखंड में बड़ा सवाल यह भी है कि जांच की कसौटी सभी राजनीतिक दलों और सत्ता में रहे लोगों के लिए समान होनी चाहिए। पूर्व मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक अथवा अन्य सार्वजनिक पदों पर रहे किसी भी व्यक्ति की संपत्ति को लेकर यदि प्रमाणित शिकायत या कानूनी आधार है तो संबंधित एजेंसियां कानून के अनुसार जांच करें।
ED की कार्रवाई को लेकर किसी को राजनीतिक हमदर्दी या विरोध के बजाय तथ्यों के सामने आने का इंतजार करना चाहिए। यदि जांच में अनियमितता प्रमाणित होती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो और यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते तो यह तथ्य भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होना चाहिए।
इसी संदर्भ में उत्तराखंड में प्रभावी लोकायुक्त और भ्रष्टाचार-रोधी संस्थागत व्यवस्था को लेकर भी सरकार से सवाल उठते रहे हैं। जनता चाहती है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई किसी दल विशेष तक सीमित न दिखाई दे, बल्कि सत्ता और विपक्ष—दोनों के लिए समान जवाबदेही की व्यवस्था हो।
HGT का स्पष्ट मत है—ED की जांच हो, निष्पक्ष हो, दस्तावेजों के आधार पर हो और परिणाम सामने आएं। उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई किसी व्यक्ति या दल के पक्ष-विपक्ष का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक जवाबदेही का विषय होना चाहिए।
