पिथौरागढ़, 29 जून। उत्तराखंड की क्षेत्रीय राजनीति में सोमवार को उस समय नई हलचल देखने को मिली, जब उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) ने पिथौरागढ़ में अपनी “व्यवस्था परिवर्तन रैली” का आयोजन किया। पार्टी के अनुसार रैली में सीमांत क्षेत्र के विभिन्न इलाकों, जिनमें डीडीहाट, कनालीछीना तथा आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में कार्यकर्ता, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग शामिल हुए। रैली के दौरान वक्ताओं ने राज्य से जुड़े कई लंबे समय से उठाए जा रहे मुद्दों को प्रमुखता से रखा और भाजपा तथा कांग्रेस की नीतियों की आलोचना की।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
रैली को संबोधित करते हुए यूकेडी नेताओं ने कहा कि उत्तराखंड राज्य गठन के 26 वर्ष बाद भी बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा और स्थानीय रोजगार जैसी मूलभूत समस्याएं पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी हैं। नेताओं का आरोप था कि सत्ता में रही राष्ट्रीय पार्टियों ने राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों और पर्वतीय क्षेत्रों की वास्तविक आवश्यकताओं के अनुरूप नीतियां बनाने में अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई।
सभा के दौरान जल, जंगल और जमीन से जुड़े अधिकारों का मुद्दा सबसे प्रमुख रहा। वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड के प्राकृतिक संसाधनों पर पहला अधिकार स्थानीय जनता का होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य की भूमि बाहरी निवेशकों और भू-माफियाओं के हाथों में जाने की आशंका बढ़ रही है, जिसे रोकने के लिए सख्त भू-कानून लागू किया जाना आवश्यक है।
रैली में 1950 आधारित मूल निवास की मांग भी प्रमुखता से उठाई गई। यूकेडी नेताओं का कहना था कि राज्य के युवाओं को सरकारी एवं निजी क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर प्राथमिकता मिलनी चाहिए। पार्टी का दावा है कि इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, पलायन में कमी आएगी तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
यूकेडी के वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि उत्तराखंड की नीतियां केवल मैदानी क्षेत्रों को ध्यान में रखकर नहीं बनाई जानी चाहिए, बल्कि पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी, बागेश्वर और अन्य पर्वतीय जिलों की भौगोलिक चुनौतियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा व्यवस्था, सड़क, संचार और आपदा प्रबंधन को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
रैली के दौरान वरिष्ठ नेता काशी सिंह ऐरी का विशेष रूप से उल्लेख किया गया। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे ऐरी को पार्टी कार्यकर्ताओं ने क्षेत्रीय राजनीति के अनुभवी और सम्मानित नेताओं में से एक बताया। वक्ताओं ने कहा कि राज्य आंदोलन में उनके योगदान और सार्वजनिक जीवन की सादगी के कारण वे आज भी बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच सम्मानित हैं। हालांकि वर्तमान संगठनात्मक जिम्मेदारियां पार्टी के अन्य पदाधिकारियों के पास हैं, लेकिन यूकेडी के भीतर उनके अनुभव और मार्गदर्शन को महत्वपूर्ण माना जाता है।
सभा में युवा नेतृत्व की भूमिका भी चर्चा का विषय रही। पार्टी नेताओं ने कहा कि युवाओं को संगठन से जोड़ने के लिए डिजिटल अभियान और जनसंपर्क कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। पार्टी के अनुसार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर रैली से जुड़े वीडियो, लाइव प्रसारण और रील्स को बड़ी संख्या में लोगों ने देखा तथा साझा किया। यूकेडी समर्थकों ने विभिन्न सोशल मीडिया मंचों पर कई हैशटैग भी चलाए। हालांकि इन हैशटैग के ट्रेंड, व्यूज अथवा उनकी वास्तविक पहुंच के संबंध में स्वतंत्र रूप से सत्यापित आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
रैली में वक्ताओं ने युवाओं से गांव-गांव जाकर संगठन को मजबूत करने और स्थानीय मुद्दों पर जनजागरण अभियान चलाने का आह्वान किया। पार्टी का कहना है कि क्षेत्रीय राजनीति को मजबूत किए बिना उत्तराखंड की मूल समस्याओं का समाधान संभव नहीं है। नेताओं ने कार्यकर्ताओं से आगामी चुनावों तक लगातार जनसंपर्क बनाए रखने का भी आह्वान किया।
यूकेडी ने अपने संबोधन में राज्य सरकार पर भ्रष्टाचार, रोजगार, कानून-व्यवस्था, पलायन और विकास के मुद्दों पर भी सवाल उठाए। साथ ही यह भी कहा कि राज्य के संसाधनों के संरक्षण तथा स्थानीय लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए व्यापक नीति परिवर्तन की आवश्यकता है। दूसरी ओर, भाजपा और कांग्रेस की ओर से इन आरोपों पर समय-समय पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दी जाती रही हैं और दोनों दल अपने शासनकाल में किए गए विकास कार्यों का दावा करते रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तराखंड में क्षेत्रीय दलों की सक्रियता स्थानीय मुद्दों को चुनावी बहस के केंद्र में लाने का काम करती है। भू-कानून, मूल निवास, पलायन, रोजगार और पर्वतीय विकास जैसे विषय लंबे समय से राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐसे में यूकेडी जैसी क्षेत्रीय पार्टी इन मुद्दों को लगातार उठाकर अपनी राजनीतिक मौजूदगी मजबूत करने का प्रयास कर रही है।
हालांकि विश्लेषकों का यह भी कहना है कि किसी एक रैली या जनसभा के आधार पर व्यापक जनसमर्थन या आगामी विधानसभा चुनावों के परिणामों का अनुमान लगाना उचित नहीं होगा। किसी भी राजनीतिक दल की वास्तविक ताकत का आकलन स्वतंत्र सर्वेक्षणों, जनमत और चुनाव परिणामों से ही किया जा सकता है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि पिथौरागढ़ की परिवर्तन रैली ने उत्तराखंड की राजनीति में क्षेत्रीय पहचान, स्थानीय अधिकार, रोजगार, पलायन और भू-कानून जैसे मुद्दों को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आगामी महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यूकेडी इन जनसभाओं और अभियानों को कितनी प्रभावी ढंग से संगठनात्मक विस्तार और चुनावी समर्थन में बदल पाती है। वहीं भाजपा, कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दल भी इन मुद्दों पर अपनी रणनीति किस प्रकार तैयार करते हैं, इस पर प्रदेश की राजनीति की आगामी दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी।
