हरिद्वार में नगर निगम के लिए कूड़ा डंपिंग के लिए 15 करोड़ की जमीन को 54 करोड़ में खरीदकर महा घोटाला करने वाले आईएएस और पूर्व नगर आयुक्त वरुण चौधरी को भाजपा सरकार ने बर्खास्त करने की संस्तुति कर दी है।

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जमीन के इस घपले में सिर्फ आईएएस चौधरी ही नहीं तत्कालीन डीएम कमेंद्र सिंह के खिलाफ भी मेजर पनिशमेंट की कार्रवाई का निर्णय लिया गया है। उन पर भी बर्खास्तगी की तलवार लटक रही है। साथ ही हरिद्वार के तत्कालीन एसडीएम अजयवीर सिंह के विरुद्ध परनिंदा प्रविष्टि दर्ज करते तीन वेतन वृद्धियां रोकने के आदेश जारी हुए हैं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड।

नगर निगम के बहुचर्चित सराय भूमि खरीद घोटाले में शामिल अधिकारी, कर्मचारी और जमीन बेचने वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाएगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने राज्य सतर्कता समिति की संस्तुति पर 10 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की अनुमति दे दी है।

कौन हैं आईएएस वरुण चौधरी

आईएएस वरुण चौधरी भारतीय प्रशासनिक सेवा के 2017 बैच के अधिकारी हैं और उत्तराखंड कैडर में कार्यरत हैं। 21 नवंबर 2023 तक वे हरिद्वार में नगर मजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत रहे। जांच में सामने आए दस्तावेजों के अनुसार जिस दिन भूमि का धारा-143 के तहत कृषि से व्यावसायिक उपयोग में परिवर्तन हुआ, उसी दिन नगर निगम के साथ खरीद का एग्रीमेंट भी कर लिया गया, और जमीन की वैल्यू 54 करोड़ हो गई। पूरे घटनाक्रम की यही असाधारण तेजी अब जांच एजेंसियों और शासन के लिए सबसे अहम बिंदु बनी हुई है।

यह है मामला

हरिद्वार में नगर निगम के कूड़ा भंडार के स्थान यानि गार्बेज डंपिंग यार्ड के लिए जमीन खरीदी जानी थी। इसमें अधिकारियों ने मिलीभगत कर 2.3070 हेक्टेयर जमीन जो महज 15 करोड़ रुपये की थी, उसे 54 करोड़ रुपये में खरीदा। इस जमीन को खरीदने में कई मानकों का उल्लंघन किया गया था। इस मामले की जांच में आरोप साबित होने पर तीन जून 2025 को मुख्यमंत्री धामी ने तत्कालीन डीएम, नगर आयुक्त और एसडीएम समेत सात लोगों को सस्पेंड कर दिया था।

किसानों को किसने दिया ऐसा आइडिया

हालांकि, एक साल बाद भी सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि आखिर करीब 15 करोड़ रुपये की कृषि भूमि को 54 करोड़ रुपये की व्यावसायिक भूमि बनाने का आइडिया किसने किसानों को दिया था। किसान अपनी जमीन 15 करोड़ में ही बेचना चाहते थे और उन्होंने 15 करोड़ के हिसाब से ही अपना आवेदन किया था।

सिर्फ सात दिन में कृषि को व्यावसायिक भूमि में बदला

सूत्रों के अनुसार जमीन बेचने वालों ने प्रारंभिक स्तर पर 15 करोड़ रुपये मांगे थे। उस समय भूमि कृषि श्रेणी में थी। लेकिन धारा-143 की कार्रवाई पूरी होते ही भूमि का स्वरूप व्यावसायिक हो गया और उसकी कीमत बढ़कर लगभग 54 करोड़ रुपये आंकी गई। इसके बाद नगर निगम ने करीब 54 करोड़ रुपये का भुगतान करते हुए भूमि खरीद ली। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इतनी कम अवधि में भूमि का मूल्य कई गुना बढ़ाने की अवधारणा किस स्तर पर तैयार हुई और इसका लाभ किसे मिला। मामले की जांच के दौरान शासन ने तत्कालीन जिलाधिकारी, नगर आयुक्त और एसडीएम समेत 12 अधिकारियों और कर्मचारियों पर विभागीय कार्रवाई की। अब तत्कालीन नगर आयुक्त वरुण चौधरी को बर्खास्त करने का निर्णय लिया गया है।

यह पाए गए दोषी

इस पूरे मामले में भारतीय न्याय संहिता एवं भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई होगी। मामले में ये दोषी पाए गए लोगों मेंतत्कालीन नगर आयुक्त वरुण चौधरी, तत्कालीन सहायक नगर आयुक्त रविन्द्र कुमार दयाल, तत्कालीन कर अधीक्षक लक्ष्मीकांत भट्ट, तत्कालीन सहायक अभियन्ता एवं प्रभारी अधिशासी अभियन्ता आनन्द सिंह मिश्राण, तत्कालीन संपत्ति लिपिक वेदपाल, तत्कालीन मानचित्रकार दिनेश कांडपाल और जमीन बेचने वाली सुमन देवी, जितेन्द्र कुमार, अभिषेक यादव, सुजीत कुमार सिंह शामिल हैं।

पुराने डीएम धीरज गर्ब्याल ने कर दिया था इनकार

जमीन खरीदने का मामला ऐसा नहीं की इन अधिकारियों के सामने आया हो इससे पहले भी इसी जमीन को खरीदने का प्रस्ताव आ चुका था लेकिन तब के जिलाधिकारी और नगर निगम के प्रशासक धीरज सिंह गर्ब्याल ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। उन्होंने जमीन खरीदने से मना कर दिया था।


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