उत्तराखंड में हिमालय के नीचे पृथ्वी की आंतरिक संरचना को लेकर हुए एक महत्वपूर्ण अध्ययन ने संकेत दिया है कि राज्य मौजूद मेन हिमालयन थ्रस्ट (एमएचटी) में लगातार तनाव (स्ट्रेस) जमा हो रहा है।

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यही वह भूगर्भीय क्षेत्र है, जहां भविष्य के मध्यम से बड़े भूकंप पैदा होने की सबसे अधिक संभावना मानी जाती है। यह निष्कर्ष जर्नल आफ एशियन अर्थ साइंसेस में प्रकाशित शोधपत्र में सामने आया है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

एनजीआरआइ के विज्ञानी डा प्रतीक मंडल के शोध के अनुसार, उत्तराखंड के नीचे पृथ्वी की लगभग 180 किलोमीटर गहराई तक की संरचना का अध्ययन किया।

इसके लिए सीएसआइआर-नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनजीआरआइ) की ओर से वर्ष 2017 से स्थापित 76 ब्राडबैंड भूकंप मापन केंद्रों से प्राप्त हजारों भूकंपीय संकेतों का विश्लेषण किया गया। इनमें लगभग 700 दूरस्थ (टेलिसेस्मिक) भूकंपों के आंकड़े शामिल थे।

आठ से 20 किलोमीटर नीचे मिला कम गति वाला क्षेत्र

विज्ञानियों ने पाया कि आठ से 20 किलोमीटर की गहराई पर चट्टानों के भीतर भूकंपीय तरंगों की गति सामान्य से 10-20 प्रतिशत कम है।

साथ ही वीपी/वीएस अनुपात 10-15 प्रतिशत अधिक मिला। विज्ञानियों के अनुसार, भूकंपीय तरंगें कठोर चट्टानों में तेज चलती हैं, जबकि जहां पानी, गर्म द्रव फ्लूड्स) या कमजोर चट्टानें हों, वहां उनकी गति धीमी हो जाती है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि इस गहराई पर पानी और रूपांतरित चट्टानों से निकले द्रव मौजूद हैं। ये द्रव चट्टानों को कमजोर बनाते हैं और फाल्ट पर फिसलन बढ़ा सकते हैं। इससे तनाव जमा होने और बाद में बड़े भूकंप आने की संभावना बढ़ सकती है।

माना जाता है सिस्मिक गैप, लंबे समय से बड़ा भूकंप नहीं

उत्तराखंड सेंट्रल हिमालयन सिस्मिक गैप का हिस्सा माना जाता है। यह वह क्षेत्र है, जहां लंबे समय से बहुत बड़ा भूकंप नहीं आया, जबकि भूगर्भीय तनाव लगातार जमा हो रहा है।

अध्ययन के अनुसार, जिस क्षेत्र के ऊपर अब तक 6.5 मैग्निट्यूट या उससे अधिक तीव्रता के भूकंप आए हैं, उसके नीचे एमएचटी पर तनाव जमा होने के स्पष्ट संकेत मिलते हैं। इससे भविष्य के भूकंप जोखिम को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी।

यह है मेन हिमालयन थ्रस्ट

सरल भाषा में समझें तो हिमालय के नीचे एक विशाल फिसलन वाली भूगर्भीय सतह है, जहां भारतीय प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट के नीचे धंस रही है। यही सतह एमएचटी कहलाती है।

इसी पर करोड़ों टन चट्टानों का दबाव जमा होता रहता है। जब यह दबाव अचानक टूटता है तो भूकंप आता है। उत्तराखंड में आए वर्ष 1803 का गढ़वाल भूकंप, वर्ष 1991 का उत्तरकाशी और वर्ष 1999 का चमोली भूकंप इसी भूगर्भीय व्यवस्था से जुड़े माने जाते हैं।

यह है मोहो

पृथ्वी के ऊपर की ठोस परत को भूपर्पटी (क्रस्ट) कहते हैं। इसके नीचे मेंटल (मेंटल) शुरू होता है। दोनों के बीच की सीमा को मोहो कहा जाता है।

अध्ययन में उत्तराखंड के नीचे मोहो की गहराई 30 से 55 किलोमीटर के बीच पाई गई।

इसका अर्थ है कि हिमालय के नीचे पृथ्वी की ऊपरी परत सामान्य क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक मोटी है। यही मोटी परत हिमालय जैसे ऊंचे पर्वतों को सहारा देती है।

लिथोस्फीयर और एस्थेनोस्फीयर की सीमा भी मिली

शोध में वैज्ञानियों ने लिथोस्फीयर-एस्थेनोस्फीयर बाउंड्री (एलएबी) की भी पहचान की। लिथोस्फीयर पृथ्वी की कठोर बाहरी परत है।

इसके नीचे अपेक्षाकृत नरम और गर्म एस्थेनोस्फीयर होती है, जिस पर टेक्टोनिक प्लेटें धीरे-धीरे खिसकती रहती हैं।

उत्तराखंड के नीचे यह सीमा लगभग 130 से 180 किलोमीटर की गहराई पर मिली। इससे पता चलता है कि भारतीय प्लेट यहां काफी मोटी और मजबूत है तथा लगातार उत्तर दिशा की ओर बढ़ रही है।

”डबल मोहो” का भी मिला संकेत

शोधकर्ताओं ने कुछ स्थानों पर डबल मोहो जैसी संरचना के संकेत भी देखे। वैज्ञानियों का मानना है कि करोड़ों वर्ष पहले भारतीय और यूरेशियन प्लेटों की टक्कर के दौरान पृथ्वी की परतें आपस में इस तरह उलझ गईं।

जिससे दो अलग-अलग सीमाएं बनने जैसी स्थिति दिखाई देती है। हालांकि इस विषय पर अभी और शोध की आवश्यकता है।


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