बालेन शाह ने यह कहकर मामले को नया रंग दे दिया कि लिपुलेख समेत सीमा विवाद का मामला ब्रिटेन के सामने भी उठाया जाएगा। उन्होंने तर्क दिया कि यह मुद्दा ब्रिटिश राज के समय से ही चला आ रहा है।
लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को लेकर नेपाल द्वारा समय-समय पर उठाए गए दावे भारत के लिए चिंता का विषय रहे हैं। भारत का स्पष्ट मत है कि 1816 की सुगौली संधि के अनुसार सीमा निर्धारण काली नदी के उद्गम के आधार पर किया गया था और ऐतिहासिक अभिलेख, प्रशासनिक नियंत्रण तथा राजस्व रिकॉर्ड इस क्षेत्र को भारत का अभिन्न हिस्सा सिद्ध करते हैं। दशकों से भारतीय सुरक्षा बलों की तैनाती, स्थानीय प्रशासन का संचालन और नागरिक सुविधाओं का विकास इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं।
कैलाश मानसरोवर यात्रा और भारत-चीन व्यापार के लिए लिपुलेख का विशेष रणनीतिक महत्व है। ऐसे में एकतरफा नक्शे जारी करना या संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से दावे मजबूत करने का प्रयास विवाद का समाधान नहीं है। भारत हमेशा वार्ता और कूटनीतिक संवाद के माध्यम से मतभेद सुलझाने का पक्षधर रहा है। पड़ोसी देशों के बीच विश्वास, ऐतिहासिक तथ्यों और जमीनी वास्तविकताओं के आधार पर ही स्थायी समाधान संभव है।
तनाव का नया दौर तब शुरू हुआ, जब भारत और चीन ने साल 2026 की कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए रजिस्ट्रेशन शुरू करने की घोषणा की। इस तीर्थयात्रा के लिए दो रास्तों का इस्तेमाल होता है, जिनमें एक उत्तराखंड में स्थित लिपुलेख दर्रा है। नेपाल ने इस दर्रे पर अधिकार जताया और कहा कि यह नेपाली क्षेत्र का हिस्सा है। नेपाल की बालेन शाह सरकार ने इसे लेकर भारत और चीन को आधिकारिक नोट भेजकर विरोध जताया।
210 साल से चला आ रहा मामला
इसकी जड़ें 1816 की सुगौली संधि में जुड़ी हुई हैं। 210 साल बीत जाने के बाद भी यह मामला दोनों इन दोनों पड़ोसी देशों के बीच विवाद का मुद्दा बना हुआ है। आइए जानते हैं कि ऐसा क्यों हैं, लेकिन उसके पहले लिपुलेख दर्रे के बारे में जान लेते हैं।
लिपुलेख दर्रा हिमालय में स्थित एक ऐसा दर्रा है, जो भारत, नेपाल और चीन के ट्राई-जंक्शन (जहां तीनों की सीमाएं मिलती हैं) पर स्थित है। यह दर्रा तिब्बत से होकर गुजरता है, लेकिन इस स्वायत्त क्षेत्र पर चीन का शासन होने के कारण इसे चीन का ही एक हिस्सा माना जाता है। यह दर्रा रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत और चीन के बीच में महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग है। इसके साथ ही यह कैलाश मानसरोवर जाने वाले यात्रियों के लिए प्रवेश द्वार है।
210 साल पुराने युद्ध से जुड़ी है कहानी
लिपुलेख विवाद सुगौली की संधि से जुड़ा है। यह संधि 1816 में एंग्लो-नेपाल युद्ध के बाद हुई थी, जिस पर ब्रिटिश भारत और नेपाल के बीच हस्ताक्षर किए गए थे। इस संधि के तहत काली नदी को दोनों पक्षों के बीच की सीमा के रूप में स्वीकार किया गया था। इस दर्रे को लेकर विवाद की मूल वजह काली नदी के उद्गम स्थल को लेकर है।
काली नदी को लेकर क्या है मतभेद?
भारत का कहना है कि यह नदी कालापानी के पास से निकलती है, जिससे कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा जैसे इलाके भारतीय सीमा के अंदर आते हैं। वहीं, नेपाल का तर्क है कि यह नदी उत्तर-पश्चिम में स्थित लिम्पियाधुरा की जलधारा से शुरू होती है। इस प्रकार कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख नदी के पूर्व में स्थित हैं और ये तीनों इलाके नेपाल के अंदर आ जाएंगे। दोनों की अलग-अलग व्याख्याओं के चलते आज भी यह विवाद बना हुआ है।
लिपुलेख को लेकर विवाद कैसे बढ़ा?
- साल 2015 में इस विवाद ने तनाव का रूप लिया जब भारत और चीन ने व्यापार बढ़ाने और कैलाश मानसरोवर यात्रा का आसान बनाने के लिए इस रास्ते पर सहमति जताई।
- नेपाल ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इलाके से जुड़े फैसले उसकी मर्जी के बिना लिए जा रहे हैं।
- बाद में 2020 में तनाव फिर बढ़ गया जब भारत ने उत्तराखंड के धारचूला को लिपुलेख से जोड़ने वाली एक सड़का का उद्घाटन किया।
- नेपाल ने इस कदम का जोरदार विरोध किया और बाद में एक कदम आगे बढ़ते हुए एक नया राजनीतिक नक्शा जारी किया। इसमें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपने इलाके का हिस्सा दिखाया गया था।
- भारत ने इस बदले नक्शे को मानने से इनकार कर दिया। नई दिल्ली ने इसे एकतरफा कदम बताया और कहा कि इससे जमीनी हकीकत नहीं बदलती।
- नेपाल ने विवाद को आगे बढ़ाते हुए इस हिस्से के लिए संविधान में भी अपडेट किया। बाद में नेपाल की ओली सरकार ने 100 रुपये का नया नोट छापने का फैसला किया, जिसमें नेपाल का अपडेटेड नक्शा दिखाया गया।
- भारत ने इन दावों को बार-बार खारिज किया है और एकतरफा गलत कार्रवाई के लिए नेपाल की आलोचना की है।
