भारत में प्‍लास्टिक के नोट चलने की अटकलें तेज हो गई हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) पॉलीमर करेंसी नोट लाने पर एक बार फिर विचार कर रहा है। यह प्रस्ताव पटना और मुंबई में हाल ही में हुई बोर्ड की बैठकों के दौरान सामने आया।

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पॉलीमर करेंसी की ओर यह कदम डेटा के एक साफ ट्रेंड से प्रेरित है। यह बताता है कि भारत में नोट छापने की लागत ज्‍यादा बनी हुई है। नोटों के खराब होने की समस्या भी है। आरबीआई की सालाना रिपोर्ट के डेटा से इसका पता चलता है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
 

प्‍लास्टिक नोट क्या हैं?

  • पेपर करेंसी के उलट पॉलीमर या प्‍लास्टिक नोट ज्‍यादा टिकाऊ होते हैं।
  • उन पर गंदगी और नमी का असर कम होता है।
  • ये ऐसे फैक्‍टर हैं जो भारत की जलवायु और इस्तेमाल की स्थितियों को देखते हुए खास तौर पर अहम हैं।
  • इनकी ज्‍यादा लंबी उम्र की वजह से बार-बार नोट छापने की जरूरत कम हो जाती है।
  • इससे शुरुआती प्रोडक्‍शन एक्‍सपेंस ज्‍यादा होने के बावजूद समय के साथ कुल लागत कम हो सकती है।

करेंसी छापने की कॉस्‍टभारत में करेंसी छापने की लागत ऊंची बनी हुई है। भले ही इसमें साल-दर-साल कुछ उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। आरबीआई के ताजा डेटा से पता चलता है कि करेंसी नोट छापने पर होने वाला खर्च वित्त वर्ष 2024-25 में बढ़कर 6,372 करोड़ रुपये के टॉप पर पहुंच गया था। इसके बाद वित्त वर्ष 2025-26 में यह घटकर 4,875 करोड़ रुपये रह गया।

इससे पहले, वित्त वर्ष 2016-17 में यह कॉस्‍ट बढ़कर 7,965 करोड़ रुपये तक पहुंच गई थी। यह एक अपवाद था जो नोटबंदी और नए करेंसी नोटों को जारी करने की वजह से हुआ था।

पेपर करेंसी के साथ सबसे बड़ी समस्‍यालेकिन, नोट छापना तो सिर्फ एक समस्या है। इससे भी बड़ी परेशानी उन खराब और गंदे नोटों की भारी मात्रा से पैदा होती है जिन्हें लगातार बदलने की जरूरत पड़ती है। नोटों को नष्ट करने यानी डिस्‍पोजल से जुड़ा आरबीआई का डेटा इस बात पर रोशनी डालता है कि ज्‍यादा चलन वाले नोटों की वजह से यह साइकिल किस तरह चलता रहता है।

ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में चलन से हटाए गए कुल नोटों में से ज्‍यादातर हिस्सा 500 रुपये के नोटों (598.3 करोड़ नोट) और 100 रुपये के नोटों (581.1 करोड़ नोट) का था।

इन देशों में चलते हैं प्‍लास्टिक नोटग्‍लोबल स्तर पर यह बदलाव पहले से ही चल रहा है। अभी 60 से ज्‍यादा देश प्‍लास्टिक बैंकनोट का इस्‍तेमाल करते हैं। ऑस्ट्रेलिया इन्हें पेश करने वाला पहला देश था। पॉलीमर करेंसी का इस्‍तेमाल करने वाली अन्य अर्थव्यवस्थाओं में कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया और रोमानिया शामिल हैं।

ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और ब्रिटेन जैसे देश पूरी तरह से पॉलीमर करेंसी अपना चुके हैं। वहीं, कई अन्य देशों ने इसे आंशिक रूप से अपनाया है। हालांकि, भारत सहित दुनिया के एक बड़े हिस्से में अभी भी मुख्य रूप से पेपर करेंसी यानी कागजी नोटों का ही इस्तेमाल होता है।

भारत ने 2012 में पॉलीमर नोटों का किया था टेस्टभारत ने इससे पहले 2012 में पॉलीमर नोटों का टेस्‍ट किया था। लेकिन, यह पहल पायलट स्‍टेज से आगे नहीं बढ़ पाई थी। अब आरबीआई इस प्रस्ताव की फिर से सक्रियता से समीक्षा कर रहा है। डेटा लगातार कॉस्‍ट और ड्यूरेबिलिटी से जुड़ी चुनौतियों की ओर इशारा कर रहा है।

ऐसे में पॉलीमर करेंसी अपनाने का पक्ष और भी मजबूत हो गया है। भारत के लिए अब सवाल सिर्फ ज्‍यादा करेंसी छापने का नहीं है। इसके बजाय यह है कि उसे ज्‍यादा समय तक कैसे चलाया जाए और उसके रखरखाव की लागत को कैसे कम किया जाए।


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